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कौन है गीता का अधिकारी? || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्। कृपया परयाविष्टो विषीदन्निदमब्रवीत् ॥27॥

अर्जुन उवाच।

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्।

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ॥28॥

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ॥29॥

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्त्वक्चै व परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥

“जब कुन्तिपुत्र अर्जुन ने अपने बंधु बान्धवों को वहाँ देखा तब उसका मन अत्यधिक करुणा से भर गया और फिर गहन शोक के साथ उसने निम्न वचन कहे। अर्जुन कहते हैं, ‘हे कृष्ण! इन युद्धाभिलाषी अवस्थित स्वजनों को देखकर मेरे सारे अंग शिथिल हो रहे हैं, मुख सूख रहा है, शरीर में कंपन और रोमांच हो रहे हैं, हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है, अंग जल रहे हैं। मेरा मन उलझ रहा है और मुझे घबराहट हो रही है। अब मैं यहाँ और अधिक खड़ा रहने में समर्थ नहीं हूँ’।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक २७–३०, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य प्रशांत: ये एकाएक नहीं हो गया, अचानक नहीं हो गया, अर्जुन ऐसे हैं ही। ये होना ही था इसीलिए अर्जुन ने कहा था, “बीचों-बीच ले चलो।” अर्जुन को भी पता था ये होना है, कृष्ण को भी पता था ये होना है। दोनों ने होने दिया। ऐसी आफ़तों, ऐसी आपदाओं का स्वागत करते हैं। पता है दिक़्क़त खड़ी होने जा रही है, होने दो; पता है अब फँसेंगे, फँसने दो; पता है वहाँ पहुँच गए अगर तो मुँह सूखेगा-ही-सूखेगा, धनुष छूटेगा-ही-छूटेगा, छूटने दो। कुछ भी हो जाए वो होना ज़रूरी है।

सब आपदाएँ और विपत्तियाँ स्वीकार हैं। दिख भी रहा हो कि आ रही हैं, तो भी उन्हें रोक मत देना। गीता सुख और सुविधा पर सवार होकर नहीं आती, आपके जीवन में गीता जब भी आएगी विपत्तियों, आपदाओं, युद्ध, संघर्ष, रक्तधार के साथ आएगी। इन सबसे यदि आपको भय लगता हो तो गीता फिर आपके लिए नहीं है। गीता ना तो किसी निर्जन वन में, किसी वटवृक्ष की शांत छाया में बोली गई है, ना किसी राजमहल में सब सुख-सुविधाओं के मध्य उतरी है। गीता तो मौत के खतरे, युद्ध के तुमुलनाद के बीचों-बीच ही उतरती है। जो जीवन में निष्कंटक शांति के इच्छुक हों, गीता उनके लिए नहीं है। उनके लिए और पुस्तकें हैं। किसी आश्रम से नहीं उठी है गीता, हिमालय के गंगा तट की शांति से नहीं उठी है गीता, ना ही किसी बड़े राजा और उसके राजगुरु के महल की सभा में संवाद है गीता।

गीता उसके लिए है जिसे अगले ही पल अपने जीवन का भी पता ना हो, गीता उसके लिए है जिसे ये अभी समझ ही ना आ रहा हो कि मर जाना ज़्यादा बुरा है या मार देना। गीता समागम के दौरान मैं आपको लगातार याद दिलाता रहूँगा कि आपको गीता के योग्य बनना होगा। गीता कोई मिठाई नहीं कि जो चाहे मूल्य चुकाए और खा ले। गीता आहुति माँगती है। दो रुपए की चीज़ नहीं है, कोई पुस्तक नहीं है कि आप बाज़ार गए, कुछ रुपए दिए और खरीद कर घर ले आए। ज्ञान भर नहीं है कि पढ़ लिया, स्मृतिस्थित, कंठस्थ कर लिया और आप सुविज्ञ हो जाएँगे। जीवन के आतप-अंधड़ जिन्होंने नहीं झेले, वो क्या समझेंगे कि अभी क्या चल रहा है अर्जुन के साथ! ना वनवास झेला है, ना अज्ञातवास झेला है, ना द्यूत, ना लाक्षागृह। युद्धों से सदा कतराते रहे, अब क्या समझोगे गीता को!

जो साधारण मानवीय कमज़ोरियों से ऊपर वरीयता देता हो किसी और चीज़ को, उसके लिए कुछ आशा है। जो जीवन भर पशुवत नोचता-खसोटता ही रहा है, कभी ये पाने, कभी वो कमाने के लिए इधर-उधर भागता रहा है, डर और लालच के सामने घुटने टेकता रहा है, प्रेम का जिसको कुछ पता नहीं, उसके लिए नहीं है गीता।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ॥30॥

निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥31॥

“केशव! मैं तो खड़े रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ, मेरा मन घूम-सा रहा है और मैं न जाने कितने विपरीत लक्षण (माने अपशगुन) आदि देख रहा हूँ। युद्ध में अपने वंश के बंधु बान्धवों का वध करने में मुझे कोई अच्छाई नहीं दिखाई देती है और उन्हें मारकर मैं कैसे सुख पा सकता हूँ?”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३० का उत्तरार्ध व श्लोक ३१, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: जीवन का आधार ही हिल रहा है, हमारे जीवन का आधार हिलता ही नहीं, हम बड़े ढीठ लोग हैं। न जाने किस ईंट-पत्थर से बना है हमारे अहंकार का किला, ढहना तो दूर है, वो कभी काँपता नहीं। स्थितियाँ हों, संयोग हों, गुरु हों, ज्ञान हो, कोई कितना भी चोट कर ले हमारे अहंकार पर, हमारे अज्ञान की इमारत काँपती तक नहीं। हम खड़े रहते हैं ढिठाई से। अर्जुन काँप रहे हैं, बड़ा अंतर है। सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर काँप रहा है, और काँप बस शरीर से नहीं रहा, मन कंपित है और बस मन ही नहीं कंपित है, मन का केंद्र कंपित है।

हमारा केंद्र कभी काँपता नहीं, हमें पूरी आश्वस्ति है कि हम जैसे हैं हम ही ठीक हैं, अपने हिसाब से चलेंगे। अर्जुन का सब हिसाब-किताब अभी गड़बड़ा गया है। हमारा हिसाब-किताब अडिग रहता है, “मैं ठीक हूँ, मैं अपने हिसाब से चलूँगा।“ हमारे जीवन में वो एक खास पल आता ही नहीं कि जब लगे कि पाँव तले ज़मीन खिसक गई, आधारहीन हो गए। हमारा आधार अहंकार ही होता है न? हमारे जीवन में वो पल ही नहीं आने पाता कि जब हम आधारहीन हो जाएँ, ऐसा लगे कि जैसे दम घुट रहा हो, जीवन छिन रहा हो। वो घड़ी हम आने ही नहीं देते; कुछ हो जाए हमें कोई अंतर नहीं पड़ता। ना हमारे पास शौर्य है, ना लाज है। हमारे पास ना प्रेम है, ना दुःख है। हमारे पास बस एक ढीठ बेहोशी है जिसमें हमें कुछ पता ही नहीं चलता। उस बेहोशी को ही हम बनाए रहते हैं क्योंकि उस बेहोशी में ही हमारे लिए सुख हैं। बेहोशी उतरेगी, बड़ा गहरा दुःख लगेगा। (व्यंग करते हुए) उस दुःख की अपेक्षा में बेहोशी बेहतर है, बेहोशी में सुख है।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे ॥31॥

न काळे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।

“हे कृष्ण! युद्ध में अपनों का, स्वजनों का वध करके मैं कोई मंगल नहीं देखता। मैं युद्ध में जय-लाभ की, जीत की आकांक्षा नहीं रखता, न राज्य या सुख-भोग की ही कामना करता हूँ।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३१ का उत्तरार्ध व श्लोक ३२ का पूर्वार्द्ध, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: ये देखना आसान है कि अर्जुन मोहग्रस्त है, उससे पहले ये देखिए कि अर्जुन को सत्ता का और विजय का कोई मोह या लोभ नहीं है। यदि अर्जुन को लोभ इस वक़्त है भी तो स्वजनों की प्राण रक्षा का। और इतिहास गवाह है कि महल और सत्ता और धन में ऐसा नशा होता है कि लोगों ने स्वजनों की हत्या करने में भी संकोच नहीं करा है। सिंहासन के लिए भाई ने भाई को और बेटे ने बाप को मारा है। पर यहाँ पर तो अर्जुन के पास वैध, समुचित, नैतिक कारण है दुर्योधन के खिलाफ़ युद्ध करने का। लेकिन फिर भी सत्ता और प्रतिशोध से ऊपर मूल्य दे रहे हैं अर्जुन किसी और चीज़ को, वो बात महत्त्व रखती है।

“हे कृष्ण! युद्ध में स्वजनों का वध करके मैं कोई मंगल नहीं देखता।” सत्ता तो ठीक है, स्वजनों को मारकर सत्ता? सत्ता के प्रति एक निर्मोह है वो भी देखिए। स्वजनों के प्राणों के प्रति मोह है ये तो दिख रहा है पर सत्ता के प्रति एक अनासक्ति भी है, एक निर्मोहता भी है, वो भी देखिए। वही अर्जुन को अधिकारी बनाती है गीता का।

देखिए गीताएँ संयोग नहीं होतीं, कोई गीता कभी संयोग नहीं होती और कोई गीता कभी अनुपलब्ध भी नहीं होती। आपकी तैयारी हो जाए तो गीता आपको अभी उपलब्ध हो जाए। हमारी तैयारी नहीं होती और तैयारियाँ कोई संयोग की बात नहीं होती, तैयारियाँ चुनाव की बात होती हैं। चैतन्य चयन करना पड़ता है गीता का। तो पहली बात, आप की ओर से एक चैतन्य तैयारी, एक होशपूर्वक किया गया चुनाव हो और दूसरी बात, कृष्ण की ओर से कोई विलंब या अवरोध नहीं है, जिस क्षण आपकी तैयारी पूरी हो गई, जिस क्षण आपका चुनाव निर्दोष हो गया, गीता जैसे तैयार खड़ी है, आपको मिल जाएगी। कहाँ से आएगी, कैसे आएगी, वो छोड़िए, आपको पूछना ये चाहिए कि आपकी तैयारी कैसे होगी। तैयारी अभी हुई नहीं और पहले उत्सुकता है कि ‘बताइए तैयारी के बाद गीता कहाँ से आएगी?’ जहाँ से आपकी तैयारी आएगी वहीं से गीता आएगी, आप तैयारी करिए। और तैयारी आपकी नहीं है तो आप जीवन भर पाठ करते रहिए गीता का, आपको कुछ नहीं मिलेगा। अधिकांश लोगों को कुछ नहीं मिलता। एक-से-एक गीताशास्त्री बैठे हैं, जीवन उनका धूल-धूसरित ही रहता है। कोई चमक नहीं, कोई निर्मलता नहीं।

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेनवा ॥32॥

“हे गोविंद! हम लोगों को राज्य से क्या प्रयोजन है? हमें विषय-भोगों से या जीवन से भी क्या लेना है?”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३२ का उत्तरार्ध, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: यह योद्धा के नहीं, यह एक सन्यासी के वचन प्रतीत हो रहे हैं। कृष्ण समझ रहे हैं कि उनकी मुस्कुराहट व्यर्थ नहीं जाने वाली। कृष्ण को दिख रहा है कि पल न सिर्फ़ संभावित है, बल्कि अति निकट है अब। “हे गोविंद! हम लोगों को राज्य से क्या प्रयोजन है?" "गोविंद, मैं आपके जैसा हूँ मैं उनके जैसा नहीं हूँ, मैं राज्य लेकर क्या करूँगा? मेरे लिए आप काफ़ी हैं। हमें जीवन से भी क्या लेना है?” एक योद्धा कई बार ये कहता मिलेगा कि क्या लेना-देना है जीवन से। पर वो ऐसा कहता है जब उसे शत्रुओं के तीर झेलने होते हैं, वो कहता है कि ‘जो मुझे चाहिए उसके लिए मैं मर भी जाऊँ तो मरना स्वीकार है पर जिस चीज़ पर मेरी दृष्टि है, जिस वस्तु का मुझे लोभ है, जहाँ मैंने लक्ष्य बनाया है वो तो मुझे चाहिए ही, भले ही उसके लिए जीवन गँवा दूँ।‘ अर्जुन की हालत बिलकुल उल्टी, अर्जुन कह रहे हैं, “उनको नहीं मारूँगा, वो भले ही मुझे मार दें तो भी स्वीकार है। जीवन बचाने के लिए भी किसी का जीवन नहीं लूँगा। अपना जीवन बचाने के लिए भी किसी का जीवन नहीं लूँगा, भले ही वो दुर्योधन क्यों न हो, भले ही वो कितना भी दुष्ट क्यों न हो, दंड मैं नहीं दूँगा।”

येषामर्थे काक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।॥33॥

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।

मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥34॥

“जिन लोगों के लिए हमें राज्य, विषय-भोग और सुख आकांक्षित हैं; जिन लोगों के लिए हम आकांक्षा करते हैं कि हमें राज्य मिले, सुखभोग मिलें, वे सभी आचार्य, पितृव्य, पुत्र, पितामह, मातुर्य, ससुर, पौत्र, साले, कुटुम्बी आदि अपने-अपने जीवन की आशा तथा धन-संपत्ति छोड़कर इस युद्ध में खड़े हुए हैं।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३३–३४, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: हम जो भी पाना चाहते हैं किन्हीं लोगों के लिए पाना चाहते हैं। कम-से-कम अर्जुन जैसे लोग अपने लिए कुछ बहुत चाहते नहीं, वो यदि कुछ जीत कर लाते हैं, कुछ कमा कर लाते हैं, तो भी उनकी इच्छा ये होती है कि दूसरों में बाँट दें। अपनों के लिए वो लाते हैं, बाँटने के लिए वो कमाते हैं। सबकी नहीं, अर्जुनों की बात कर रहा हूँ। तो अर्जुन कह रहे हैं कि "मैं कहीं कुछ जीत कर लाता तो मैं इनके चरणों में अर्पित करता। ये मेरे सब गुरु लोग हैं, सब आचार्य हैं, ये मेरे पितामाह हैं, मेरे संबंधी हैं, कुछ मुझसे बड़े हैं, कुछ मुझसे छोटे हैं। मैंने जीवन में जो भी उपलब्धियाँ करी होती वो तो मैं सब इनको अर्पित करता न, इन्हीं के लिए मैं उपलब्धियाँ करता, अब इनको मारकर जो मुझे उपलब्धि मिलेगी वो किसके लिए होगी, बताओ? जिसके लिए मैं युद्ध जीतता, उसको मार कर मैं युद्ध जीतूँ तो क्या लाभ, बताओ केशव?"

येषामर्थे काक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च।॥33॥

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः।

मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ॥34॥

एतान्न हन्तुमिच्छामि नतोऽपि मधुसूदन।

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ॥35॥

“हे गोविंद! हम लोगों को राज्य-भोगों से क्या प्रयोजन है, हमें विषय-भोगों या जीवन से भी क्या लेना है, जिन लोगों के लिए हमें राज्य, विषय-भोग और सुख आकांक्षित हैं वो सभी आचार्य, पितृव्य, पुत्र, मातुर्य, ससुर, पौत्र, साले, कुटुम्बी सब अपने-अपने जीवन की आशा, धन-संपत्ति छोड़कर इस युद्ध में खड़े हुए हैं। मधुसूदन, मुझे मारने पर भी अथवा स्वर्ग, मर्त्य और पाताल इन तीन लोकों का राज्य पाने के लिए भी मैं इन लोगों की हत्या नहीं करना चाहता।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३३–३५, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: ‘ये मुझे मार भी दें, चाहे मुझे इनको मारने से स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक सब मिलता हो, मैं तब भी इनकी हत्या नहीं करना चाहता, फिर पृथ्वी के एक छोटे से भूखंड को पाने के लिए मैं इनको मारूँ, ये क्यों करूँ मैं? मुझे तीन लोक मिलते हों, मैं तो भी नहीं मारूँ इन्हें, तो एक राज्य के लिए इनको काहे को मार दूँ? मुझे मार भी रहे हों ये, मैं तब भी इनको नहीं मारना चाहता।‘

देहभाव से कहीं आगे खड़े हुए हैं अर्जुन इस समय। ना उन्हें अपनी देह की रक्षा करनी है, ना उन्हें अपने स्वार्थ की रक्षा करनी है। तैयारी बिलकुल पूरी है, बार-बार कह रहे हैं, “वो मुझे मार भी दें तो भी मुझे मारना नहीं है।” ये देहाभिमानी नहीं कह सकता, जो अपनी देह से आसक्त हो, वह ऐसा नहीं कह सकता और जो अभी मन की वासनाओं से संतप्त हो, मन का बंधक हो, वो भी ऐसा नहीं कह पाएगा कि ‘राज्य के लिए मैं युद्ध और हत्या क्यों करूँ?‘ तन और मन दोनों से एक कदम आगे खड़े हो गए हैं अर्जुन इस पल में। ये पल विशेष है।

निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः॥36॥

“हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों का वध करके हम लोगों को क्या सुख मिलेगा? इन आतताइयों की हत्या करके हमें पापी ही बनना पड़ेगा।”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३६, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: एक तरफ़ से कह रहे हैं कि ‘वो आततायी हैं सब’, दूसरी ओर कह रहे हैं कि ‘इन्हें मार कर क्या सुख मिलेगा, हम ही पापी हो जाएँगे।‘ अंधे नहीं हो गए हैं मोह में? दिख रहा है कि दुर्योधन दुष्ट है, दिख रहा है कि सामने जितने हैं सब विधर्मी हैं लेकिन फिर भी कह रहे हैं कि ‘इनको क्या मारना, कौनसा सुख रखा है इनको मारने में। नहीं कह रहा हूँ कि ये श्रेष्ठ हैं इसलिए इनको मत मारो, मैं तो कह रहा हूँ कि मेरा कोई स्वार्थ नहीं बचा इनको मारने में।‘ अब ये बड़ा विशेष बिंदु है, ‘नि:स्वार्थ हो गया हूँ मैं। मैं पहले तीर चलाता था स्वार्थ के लिए, हर योद्धा ने आज तक तीर चलाया है स्वार्थ के लिए, मेरे पास स्वार्थ तो अब नहीं बचा, तो स्वार्थवश इनको नहीं मार सकता मैं।‘ कृष्ण कह रहे हैं, “अब मैं तुम्हें स्वार्थ और नि:स्वार्थ से ऊपर एक और कारण देने वाला हूँ, अर्जुन, तीर चलाने का, बस कुछ पल प्रतीक्षा करो।”

एक तीर चलता है स्वार्थ से, वो तीर नहीं चलता जब तुम नि:स्वार्थ हो जाते हो। तुम कहते हो, “स्वार्थ में मैं लड़ता था, भिड़ता था, हत्याएँ करता था, स्वार्थ का काम था, मैं निःस्वार्थ हो गया, मैं तीर कैसे चलाऊँ?" निःस्वार्थ हो जाते हो तीर रुक जाता है, गति रुक जाती है। कृष्ण कह रहे हैं, “ना! जब तुम वास्तविक रूप से नि:स्वार्थ होते हो तब तीर दोबारा चलता है और तब उसकी धार और गति अलग होती है। वो तुम अभी जानते नहीं अर्जुन, वो मैं तुम्हें अभी सिखाऊँगा। तुमने आज तक सारे युद्ध करे हैं स्वार्थवश, आज मैं तुम्हें सिखाने जा रहा हूँ नि:स्वार्थ होकर कैसे युद्ध किया जाता है। क्योंकि तुमने आज तक सब स्वार्थवश ही युद्ध करे हैं इसलिए थोड़ा-सा नि:स्वार्थता का स्वाद पाते ही तुम्हें लग रहा है कि ‘अब युद्ध कैसे करूँ’। क्योंकि स्वार्थ ही तुम्हारी ऊर्जा, तुम्हारा ईंधन था; स्वार्थ हट गया अब तो धनुष भी गिरा जा रहा है। पर नहीं, ऐसा नहीं है कि जो नि:स्वार्थ हो जाते हैं उनका बल कम हो जाता है, उनके हाथ काँपने लगते हैं; नि:स्वार्थ होने के बाद तो व्यक्ति और घोर युद्ध करता है। वो युद्ध अब मैं तुमसे करवाऊँगा पार्थ! बस कुछ पल।” महाकाव्य अब शुरू ही होने जा रहा है। महागीत बस ज़रा सी दूर है अब। समझ में आ रही है बात?

दुनिया के लोग इसी में पगलाए रहते हैं, कहते हैं कि ‘अगर स्वार्थ मिट गया तो कोई कुछ करेगा क्यों?’ जब स्वार्थ मिट जाता है तब तुम कौरवजयी अर्जुन हो जाते हो। स्वार्थ मिटने से युद्ध रुकता नहीं है, जब स्वार्थ मिट जाता है तब वास्तविक युद्ध शुरू होता है, जब तक स्वार्थ रहता है तब तक तो तुम छोटे युद्धों में ही उलझे रहते हो; स्वार्थ छोटी चीज़ है न, उसको बचाने के लिए बहुत सारे छोटे-छोटे युद्ध करने पड़ते हैं।

जैसे सड़क पर दो छोटे मवाली आपस में भिड़ गए हों, उसको तुम महाभारत का महायुद्ध थोड़े ही कहोगे। स्वार्थवश आदमी बस उतनी ही बड़ी लड़ाइयाँ करता है, नुक्कड़ वाली झड़पें। महाभारत जीतने के लिए तो नि:स्वार्थ ही होना पड़ता है और नि:स्वार्थ हो भी फिर वही पाते हैं जो महाभारत का चयन करते हैं; दोनों बातें एक साथ। जिनके जीवन में छोटे मुद्दों और छोटी झड़पों से बड़ा कुछ नहीं है, मैं उनसे पूछा करता हूँ, “तुम्हें गीता मिल भी गई, तुम उसका करोगे क्या?” तुम्हारी ज़रूरत कुल इतनी सी है, तुम्हारी ज़रूरत बस ये है कि तुम्हें पड़ोस के गुड्डू से हिसाब बराबर करना है, कल वो तुम्हारी सिगरेट चुरा कर भाग गया था। तुम्हारी कुल इतनी सी ज़रूरत है, तुम्हें कौन-सी बड़ी लड़ाई लड़नी है, तुम्हें इसमें गीता की ज़रूरत ही नहीं है।

मच्छर मारने के लिए क्रूज़ मिसाइल थोड़े ही चाहिए होती है। और गीता क्या है? गीता क्रूज़ मिसाइल नहीं है – कहते हैं दुनिया का आज तक का जो सबसे बड़ा बम बना है उसका नाम था — ज़ार बोम्बा। सौ मेगाटन की उसकी यील्ड थी; गीता वो है, और वो भी बहुत छोटी चीज़ है गीता के आगे। उसका आकार छोटा करना पड़ा, जानते हो क्यों? वो इतना वज़नी था कि मिसाइल पर उसको भेज नहीं सकते थे और तेज़-से-तेज़ फाइटर भी — फाइटर माने हवाई जहाज़, युद्धक हवाई जहाज़ — इतना तेज़ नहीं था कि उस बम को गिराने के बाद उसके प्रभाव क्षेत्र से निकल सके। वो बम ऐसा था कि जो जहाज़ उस बम को गिराता, वो जहाज़ स्वयं भी निश्चित रूप से ख़त्म हो जाता क्योंकि वो कितनी भी तेज़ी से भागता और कितनी भी ऊँचाई से गिराता, बम इतना बड़ा था कि उस जहाज़ को भी खा जाता। और आपको मारने हैं मच्छर, आप ज़ार बोम्बा का करोगे क्या? उतना बड़ा बम क्यों चाहिए? आपके लिए तो सेल्फ़हेल्प के ऑलआउट ही काफ़ी हैं। वो बहुत सारी किताबों की दूकानों में मिलते हैं — सेल्फ़हेल्प सेल्फ़हेल्प, वो सब यही हैं, मच्छर मारने के ऑलआउट। समझ में आ रही है बात?

अपने जीवन को देखो, अभी बीते हुए दिन को ही देख लो, तुमने कौनसी बड़ी चुनौती उठायी, गीता तुमको क्यों मिले भाई? आज का ये जो दिन बीत रहा है, मुझे बताओ इस दिन तुम्हारे सामने बड़े-से-बड़ा मुद्दा क्या था? तुम रसोई में गए, तुम्हारी दाल कोई और खा गया, आज दाल नहीं मिली, है इससे बड़ा कुछ? किसी को बेवकूफ़ बनाना चाहते थे उसने पकड़ लिया। आज की बड़ी खबर बस यही है — बेवकूफ़ बना रहे थे, धरे गए। तुम्हारी इस ज़िंदगी में गीता आकर के करेगी क्या? वो बहुत बड़ी चीज़ है, तुम्हें छोटी चीज़ें चाहिए। तुम बाज़ार जाओ, जमालगोटा लेकर आओ। इस तल की हमारी ज़रूरतें हैं; गीता उसके लिए है जिसको उसकी ज़रूरत हो।

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ॥37॥

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।

कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥38॥

कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मानिवर्तितुम्।

कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥39॥

“इसलिए हमें धृतराष्ट्र के पुत्रों की हत्या नहीं करनी चाहिए क्योंकि हे माधव! अपने ही संबंधियों की हत्या करके हम सुखी कैसे रहेंगे? यद्यपि ये धृतराष्ट्र पुत्र लोभ से अंधे होने के कारण कुलनाशकारी दोष तथा बंधुओं को मारने से उत्पन्न पाप को नहीं देखते। मुझे पता है ये कैसे हैं, ये कुलनाशकारी हैं, तो भी हे जनार्दन! कुलक्षय से होने वाले दोष को देख सुनकर भी हम लोगों को इस पाप से निवृत होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?”

~ श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोक ३७-३९, अध्याय १, अर्जुन विषाद योग

आचार्य: ‘वो जैसे हैं तो हैं, हम उनके जैसे क्यों बन जाएँ? वो दुष्ट हैं, पतित हैं, वो हमें मारने से पीछे नहीं हटेंगे, हम भी उन्हें मार दें यदि, तो हममें उनमें अंतर क्या?’

उदात्त विचार। कृष्ण कह रहे हैं, “ठीक है, शुरुआत ठीक है, अंत मैं करूँगा। इसी शुरुआत की तलाश थी मुझे, क्योंकि एक चीज़ है जिसका अंत करना बहुत आवश्यक है। पर उसका अंत मैं स्वयं नहीं कर सकता, मैं भी जैसे पराश्रित हूँ, मुझे भी कोई चाहिए होता है जो मुझे एक शुरुआत दे दे। तुम मुझे वो शुरुआत बस दे दो, आगे का काम मेरा है।“ वो शुरुआत है तो शुरुआत भर ही, पर मिलती नहीं, बड़ी विरली चीज़ है, करोड़ों में कोई एक वो शुरुआत दे पाता है। अंत आसान है, वो तो कृष्ण कर देते हैं, आरंभ कठिन है क्योंकि वो अर्जुन को करना है। आरंभ हमेशा शिष्य करता है इसीलिए सबसे बड़ी बाधा आरंभ ही है, अंत गुरु के हाथों होता है, वो हो जाता है।

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