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लेख
दो गड्ढे - पैसा और वासना || आचार्य प्रशांत
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, मेरा प्रश्न है कि भगत सिंह की तरह हम कोई क्रांति लाने के बारे में क्यों नहीं सोच पाते?

आचार्य प्रशांत: तुम जिस ज़िंदगी की ओर बढ़ रहे हो वो भगत सिंह की है या चुन्नीलाल की? जल्दी बोलो! ये तो अजीब बात है! किताबों में भगत सिंह को पढ़ रहे हो। जब चुन्नीलाल जैसी ज़िंदगी जीनी थी, तो किताबों में भी चुन्नीलाल को ही पढ़ा होता! तो ये तो हो गया न अब बड़ा पाखंड हो गया। और ये तय सबने कर रखा होता है और माँ-बाप ने तो पूरा ही तय कर रखा होता है। माँ-बाप को पता चल जाए कि लड़का भगत सिंह की तरफ़ जा रहा है, तुरन्त छाती पीटने लगेंगे।

दुनिया में इतनी मूर्खता फैली हुई है, इतना अन्याय है, इतना अत्याचार है, पागलों ने आग लगा दी है दुनिया में! तुम बस किसी मजबूरी तले अपनेआप को दबा मत लेना। विद्रोह तो कर ही दोगे। क्योंकि जो सब चल रहा है दुनिया में वो एकदम प्रत्यक्ष और स्पष्ट है। विद्रोह तो कर ही दोगे। पर कोई करता नहीं। क्यों? क्योंकि सब अपनेआप को मजबूरियों तले दबा लेते हैं। एक बार दब गये तो अब क्या विद्रोह करोगे! वो मत करना बस!

दस-दस साल सरकारी नौकरी की तैयारी चल रही है। ये आदमी कौनसी महानता हासिल करेगा, बताओ। कि करेगा? जिन रास्तों से कोई लेना-देना नहीं उन पर चल पड़े हैं। कहीं भी वेकेन्सी (भर्ती) निकल रही है खट से उसका फॉर्म भरे दे रहे हैं। मछली-पालन में फॉर्म भर दिया, मुर्गी-पालन में फॉर्म भर दिया। सरकारी नौकरियाँ इन सब की भी निकलती हैं — मत्स्य-पालन और कुक्कुट-पालन।

या प्राइवेट (निजी) में चले गये। वहाँ कुछ भी है — जाओ, क्रेडिट कार्ड बेचो! वो बेच रहे हैं। तब एक पल को याद नहीं आता कि जिन लोगों की कहानियाँ बचपन में पढ़ी थीं क्या उन्होंने ये रास्ते चुने थे? बोलो! और कुछ नहीं तो पचास-सौ महान लोगों को तो तुम सभी जानते होगे। ठीक? उन्होंने क्या ये रास्ते चुने थे जो सब टिंकूलाल चुनते हैं?

तो जब जीवन में चुनाव का क्षण आता है, तो टिंकूलाल क्यों याद रह जाता है और बुद्ध क्यों बिसरा जाते हैं?

प्र: सर, आसान है टिंकूलाल होना।

आचार्य: यही है बस। आसान भी नहीं है, कुछ भी नहीं करना। आसान तो वो हो जिसमें कुछ करना हो। टिंकूलाल तो एक बेहोशी के प्रवाह का नाम है। कुछ नहीं भी करो तो टिंकूलाल बन जाओगे। हैं ही! जैसे माँ के गर्भ से टिंकूलाल ही जन्म लेता है।

तो टिंकूलाल माने अपना पड़े रहो, समय जो करा रहा है वो होता जाए। एक उम्र आएगी, माँ-बाप तुम्हारी कुंडलियाँ इधर-उधर मिलाना शुरू कर देंगे। जाति और गोत्र वग़ैरा देखना शुरू कर देंगे। तुम्हारी ही जाति की कोई कन्या या वर पकड़ लिया जाएगा। बाक़ायदा दहेज वग़ैरा तय किया जाएगा।

ये जो पूरा विश्व है, मानवता है, ये वैसे भी एक सामूहिक आत्महत्या की ओर सब बढ़ रहे हैं; आत्महत्या भी और सर्वविनाश भी। अपनी हत्या चलो कर लो। कर लो! जितनी प्रजातियाँ हैं पृथ्वी पर, मानवता सबकी हत्या करने की ओर बहुत तेज़ी से बढ़ रही है। और कर ही रही है। महाविनाश के बिलकुल हम बीचों-बीच हैं। ये भी नहीं कि कल शुरू होगा, शुरू हो गया और उसके हम एकदम बीचों-बीच हैं। ऐसे मूर्खों की भीड़ में शामिल होकर के तुम्हें क्या मिलेगा?

तुम्हारा तो धर्म है अपनेआप को अलग कर देना। भीड़ से अलग हुए हैं तो ये नहीं है कि कहीं जाकर छुप गये हैं, कोने-कतरे में मुँह छुपाये बैठे हैं। अलग हैं और हुंकार के साथ अलग हैं। तो ये जो तुम्हारा स्वास्थ्य होता है, तुम्हारा जो अपना आनंद होता है, इसी को देखकर के और लोगों को प्रेरणा मिलती है कि भीड़ से अलग हो पाएँ।

कई बार होगा तुम देखोगे भीड़ अपना उत्सव मना रही है, तुम कहोगे, ‘मैं ही चूक गया। मैं भी उनके साथ होता तो मुझे भी मज़े आ रहे होते।’ लेकिन सही होने का, सच्चा होने का, शुद्ध होने का जो आनंद है वो किसी भी दूसरी चीज़ से बहुत ऊपर है। और वो जैसे-जैसे मिलता जाता है वैसे-वैसे फिर तुम्हें पक्का होता जाता है कि कुछ छूट जाए, ज़िंदगी छूट जाए, मौत आ जाए, इस आनंद को, इस शुद्धता को, इसको तो नहीं छोड़ना।

जानने वालों ने गाया — “हीरा पायो गाँठ गठियायो” — और बहुत अब बोलने को कुछ बचा नहीं है, हीरा मिल गया है और गाँठ बाँध ली है। अपना हीरा हमारे पास है। वही हमारे आनंद की चीज़ है। जीवन में मूल्य आ गया है।

देखो, ऊपरी-ऊपरी बातें सब एक तरफ़, एकदम ज़मीनी बात समझो। जिन दो चीज़ों पर हर इंसान बिक जाता है, मैं उनकी बात तुमसे कर रहा हूँ। ठीक है? और ये दो चीज़ें अगर संभाल लोगे तो कोई बहुत बड़ी बात नहीं है कि क्रांति के लिए बड़ी क़ुर्बानी देनी पड़ेगी। ये सब हो गया, वो सब बहुत बड़ी बात नहीं है। क्रांति वग़ैरा अपनेआप हो जाएँगे। एक सही ज़िंदगी अपनेआप जीने लगोगे।

ये दो चीज़ें हैं — एक पैसा, जो कि अधिकांशतः मानसिक कामना होती है। जब हमें पैसा चाहिए होता है न, तो वो हमें चाहिए होता है सत्तर प्रतिशत मन को संतुष्ट रखने के लिए और तीस प्रतिशत तन को संतुष्ट रखने के लिए।

आपको जो पैसा मिलता है, किसी भी आम आदमी को देख लो, तो उसका वो बीस-तीस प्रतिशत ही उपयोग तन के लिए करता है। तन के लिए पैसे का क्या उपयोग होता है — खाना, कपड़ा, छत। यही सब होता है। तुम्हारे पैसे का बीस-तीस प्रतिशत ही। और अगर आप अमीर हों, तो आप अपने पैसे का दो-चार प्रतिशत ही उपयोग करते हो तन के लिए। बाक़ी जितना पैसा होता है, उसका उपयोग किसके लिए होता है? मन के लिए।

मन के लिए कैसे उपयोग होता है? मन को पता है कि मेरे बैंक अकाउंट में दस करोड़ हैं। अब वो काम कहीं नहीं आ रहा पर मन प्रसन्न है; और अब सुरक्षित अनुभव कर रहा है न। वो सुरक्षा काल्पनिक है। पर मन सोचता है कि मेरे बैंक में इतना पैसा है!

तो एक तो ये चीज़ होती है जिसमें जाकर फँसते हो — पैसा। और पैसा माने, हमने कहा, सत्तर प्रतिशत मन और तीस प्रतिशत तन। एक यहाँ फँसोगे और सब फँसते हैं। इन्हीं दो चीज़ों से अगर बच लोगे तो ज़िंदगी में कहीं बहुत फँसना नहीं पड़ेगा।

दूसरा इंसान फँसता है जाकर के वासना में। और वासना में होता है सत्तर प्रतिशत तन और तीस प्रतिशत मन। सत्तर प्रतिशत वहाँ तन का खेल होता है और तीस प्रतिशत जिसको तुम भावनाएँ कह देते हो कि मेरी फ़ीलिंग्ज़ (भावनाएँ), मेरे इमोशंस (संवेदनाएँ) वग़ैरा ये सब।

लेकिन चाहे पैसा हो और चाहे वासना, दोनों में खेल तन और मन का ही है। सच्चाई दोनों में कहीं नहीं है। तन और मन का खेल है। यही दो गड्ढे होते हैं जीवन में। यही दो, सिर्फ़ दो, और इन्हीं में जाकर हर इंसान गिर जाता है।

रामकृष्ण परमहंस कहते थे, “एक कंचन में गिरोगे” — कंचन माने सोना, पैसा — “और दूसरा कामिनी में गिरोगे” — कामिनी माने वासना। इन दो से बचे रहो तो हो गयी क्रांति; और कुछ नहीं करना है। इन दो गड्ढों में जाकर के न गिर जाना, बस।

पैसा! पूछो अपनेआप से कि तुम्हें तन के लिए कितना चाहिए और मन के लिए कितना चाहिए। तन के लिए जो चाहिए वो आमतौर पर वाजिब ही होता है। कोई आपसे कहे कि आप उतना भी मत कमाओ कि शरीर पर अच्छे कपड़े भी न आ सकें — अच्छे से मेरा आशय है उचित — तो ये ग़लत बात होगी। इतना पैसा तो होना चाहिए कि खाने को बढ़िया मिले, कपड़े-लत्ते का हिसाब रहे। आप कहीं रहने जा रहे हों तो वहाँ पर कमरा आपका ठीक-ठाक रहे। इतना पैसा तो ज़िंदगी में होना ही चाहिए।

पर ये पैसा तो तन की ज़रूरत है। ज़्यादातर हमारा पैसा किसकी सेवा में लग जाता है? वो पैसा बेकार ही होता है। उसके पीछे मत भागना। जितनी ज़रूरत तन को हो उतना अगर कमा रहे हो तो तृप्त रहना। और वो बहुत ज़्यादा होता नहीं। तन को कितना खिला लोगे? और मन को खिलाने की कोई सीमा नहीं।

तन एक सीमा से ज़्यादा नहीं खा सकता। खिला के देखो तन को! बहुत सारा खाना खा के देखो, खा सकते हो क्या? बहुत सारे कपड़े पहनकर देखो! पहन सकते हो क्या? सौ घरों में एक साथ रह सकते हो क्या? कितने ऊँचे बिस्तर पर सोओगे? कितना मोटा गद्दा लगा लोगे? सीमा होती है उसके आगे नहीं जा सकते। नहीं जा सकते न?

लेकिन मन, मन के पास अभी दस लाख हैं, तो मन क्या बोलेगा? बीस हों। फिर क्या बोलेगा? एक करोड़ हों। फिर क्या बोलेगा? दस करोड़ हों। फिर क्या बोलेगा? तो मन में कोई सीमा नहीं होती। मन के लिए मत कमाने लग जाना।

समझ में आ रही है बात?

और सबके ऊपर ये एक बहुत बड़ा फ़ितूर होता है कि अगर बिकेंगे नहीं तो जिएँगे कैसे, पैसा कहाँ से आएगा। जितना तुमको चाहिए सचमुच उतना आ जाएगा। और अनाप-शनाप पैसा चाहने की कोई सीमा होती नहीं है। वो तो फिर तुम कितना भी कमा लो, तब भी संतुष्टि नहीं है।

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