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लेख
छाती पर चोट खाना सीखो || आचार्य प्रशांत (2022)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
14 मिनट
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी, आपने एक बात कही थी कि सत्य की ओर बढ़ने के लिए समझ सबसे ज़्यादा ज़रूरी होती है, प्रयत्न भी उसके बाद आता है। मेरा सवाल इसी से जुड़ा है।

मुझे कभी-कभी ऐसा लगता है कि मुझे समझ आ रहा है, तो मैं कई बार दावा भी करता हूँ कि हाँ, आज मुझे थोड़ा-बहुत समझ आ रहा है। और दूसरी तरफ़ आप अपनी शिक्षाओं में कहते हैं कि इस बात को थोड़ा ग़ौर से समझो, और श्रीकृष्ण भी अर्जुन को बार-बार गीता में कह रहे हैं कि अर्जुन समझो। तो मेरा प्रश्न ये है कि मैं अपनी सीमित समझ से उस समझ की जिस समझ की आप बात करते हैं, जहाँ श्रीकृष्ण कह रहे हैं, उस समझ तक कैसे बढ़ूँ? क्योंकि जीवन वैसा ही है मेरा, संघर्ष है, ठहराव नहीं है। तो उस समझ तक कैसे बढ़ूँ जहाँ आप कह रहे हैं?

आचार्य प्रशांत: देखिए, हमारे सामने जब कोई बात आती है, जिसको हमें समझने को कहा जाता है तो हमारे भीतर क्या प्रक्रिया चलती है, वहाँ से शुरुआत करते हैं। आपको समझने को कुछ कहा ही क्यों जा रहा है? इसलिए नहीं कि आप नासमझ हैं, इसलिए कि आपके पास कुछ धारणाएँ हैं, कुछ उल्टा-पुल्टा ज्ञान है, कुछ मान्यताएँ हैं, जिनको आप सत्य समझ करके पकड़े हैं। ठीक? अगर वो नहीं होतीं तो क्या पड़ी थी किसी को कि आपको कहे, समझो, समझो। कोई ज़रूरत नहीं है न फिर? आत्मज्ञानी को तो भगवद्गीता की भी ज़रूरत नहीं है।

जो सर्वज्ञ हो गया, वो क्या करेगा कुछ पढ़कर के, या कुछ समझ करके? तो अगर आपसे कोई कह रहा है समझो तो इससे सबसे पहले सिद्ध क्या होता है? इससे यह सिद्ध होता है कि आप ज्ञानी हैं, आप अपनी तरह के ज्ञानी हैं।

हममें से कोई भी अज्ञानी नहीं होता, हम कुज्ञानी होते हैं। अज्ञान का मतलब होता है ज्ञान का अभाव। नहीं, ज्ञान का अभाव नहीं होता, हमारे पास बहुत व्यर्थ तरह का, बहुत घातक तरह का, बहुत झूठा ज्ञान होता है और हमारे हिसाब से वही सच होता है। तो अब आपके पास वैसा ज्ञान पहले से मौजूद था, और आपकी दृष्टि में वो ज्ञान क्या था?

प्र: वो सत्य था।

आचार्य: वो सत्य था। अब आपके सामने श्रीकृष्ण आ गये मान लीजिए और श्रीकृष्ण कह रहे हैं, ‘समझो, बात को समझो।’ तो ये समझने का अर्थ क्या हुआ? आपके पास पहले से कुछ ज्ञान है और वो ज्ञान गड़बड़ है, और श्रीकृष्ण आ गये हैं और कह रहे हैं — देखो, तुम्हें कुछ बता रहा हूँ मैं, उस बात को समझो। तो वाक़ई आपसे श्रीकृष्ण कह क्या रहे हैं? वो कह रहे हैं कि जो तुमने पकड़ रखा है देखो कि वो कितना ग़लत है। यही तो कह रहे है न? समझने की प्रक्रिया घट ही नहीं सकती बिना चोट खाये, बिना एक तरह का आंतरिक अपमान स्वीकार करे। किस बात का अपमान?

प्र: कि जो पहले समझा है वो ग़लत है।

आचार्य: जो पहले मैंने आज तक माना था वो ग़लत है। अब अपमान सहना अच्छा लगता है? अच्छा तो नहीं लगता, अच्छा तो लगता नहीं। तो भीतर जो बैठा हुआ है हमारे ‘मैं', अहंकार, वो एक अद्भुत चाल चलता है। वो कहता है, ‘मैं समझ गया।’ ‘मैं समझ गया' से वो अर्थ क्या कर रहा है? वो कह रहा है, ‘मुझे जो बात कही जा रही है वो लगभग वही बात है जो मैं पहले से मानता हूँ। तो मुझे कोई तकलीफ़ ही नहीं है, मैं समझ गया। मैं स्वीकार कर लेता हूँ, मैं समझ गया।’

जबकि अगर कभी भी ऐसा होगा कि कोई श्रीकृष्ण आकर आपको कुछ समझाएँगे, तो निरपवाद रूप से निश्चित ही वो बात आपको चोट देगी, घायल करेगी, आपको एक आंतरिक अपमान, एक ह्यूमिलेशन बर्दाश्त करना पड़ेगा। वो हम बर्दाश्त करना चाहते नहीं। तो हम क्या करते हैं कि जो बात हमारी ओर आ रही होती है, हम उस बात को ही तोड़-मरोड़ देते हैं। हम उस बात को बिलकुल वो ही बना देते हैं, जिस बात में हम पहले से?

प्र: यक़ीन करते हैं।

आचार्य: विश्वास करते हैं। तो आप किसी बात पर विश्वास करते हैं, श्रीकृष्ण आपसे कुछ कह रहे हैं, श्रीकृष्ण के विरुद्ध आप किसी तरह की अमर्यादा या गुस्ताख़ी कर नहीं सकते। आप ये तो कह नहीं सकते कि श्रीकृष्ण ने जो कहा वह ग़लत कहा, झूठ कहा। तो आप क्या करते हैं कि आप श्रीकृष्ण का श्लोक लेते हैं और आप उसका कुछ विकृत अर्थ कर लेंगे। और आप कहेंगे, ‘हाँ, बात बिल्कुल सही है, मैं तो हमेशा से इसी बात को मानता हूँ।' और आप तत्काल दोनों हाथ उठाकर कह देंगे, ‘मैं इस बात को समझ गया। अरे समझ क्या गया! मैं तो इस बात को सदा से समझे हुए ही था।’

प्र: हाँ।

आचार्य: बस मैं समझ गया। देखते नहीं हैं आपके सामने बहुत लोग होते हैं इस प्रकार के, वो आएँगे, आप उन्हें कुछ समझाएँगे, आपका वाक्य पूरा होने से पहले ही वो कहेंगे, 'हाँ, हाँ हम बिलकुल समझ गये, बिलकुल समझ गये।' और फिर वो वापस जाएँगे और बिल्कुल वही ग़लती करेंगे जो करके वो पहली बार आपके पास आये थे।

पहली बार आपके पास आये कुछ ग़लती करके, आपने समझाया, वो कहेंगे, बिलकुल, बिलकुल, बिलकुल। आप बिलकुल चकित रह जाएँगे कि ये इतनी जल्दी समझ गया। बड़ी प्रखर इसकी प्रतिभा है, एकदम समझ जाता है, तुरंत। और वो लौटकर के जाएगा और फिर वैसा ही रहेगा जैसा पहले था, वही ग़लती दोहराएगा। क्यों? क्योंकि उसे चोट खाना बर्दाश्त नहीं था। समझने की प्रक्रिया हमेशा विनम्रता की प्रक्रिया होती है। विनम्रता के बिना बोध नहीं हो सकता।

ह्युमिलिटी (विनम्रता) के बिना लर्निंग नहीं हो सकती। वो हममें होती नहीं है। हमको बुरा और लग जाता है जब ये सिद्ध होता है कि हम ग़लत हैं। और आपके ऊपर इससे बड़ा एहसान कोई नहीं कर सकता कि वो आपको साबित कर दे कि आप ग़लत हो। लेकिन एहसान मानना तो दूर छोड़िए, हमारे भीतर से उठता है विरोध। हमको लगता है हम पर आक्रमण हुआ है, तो फिर हम प्रतिकार करते हैं, हम प्रतिघात करते हैं। हम समझाने वाले को चोट ही पहुँचा देना चाहते हैं। और अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो फिर हम उसको बड़े परोक्ष तरीक़े से चोट पहुँचाते हैं। जैसे कि हमने श्रीकृष्ण तक को चोट पहुँचाने की कोशिश करी है। कैसे? हम उसकी बात को विकृत कर देते हैं; हम कहते हैं, ‘हम तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकते, कोई बात नहीं, हम दूसरे तरीक़े से तुमसे बदला निकालेंगे। हम तुम्हारी बात को ही भ्रष्ट कर देंगे, विकृत कर देंगे।’

तो आपको जब भी लगे कि आप कोई बात समझ गये, तो अपनेआप से पूछिएगा, ‘अगर मैं वाक़ई कोई नयी बात समझा हूँ तो मेरे भीतर की कौनसी पुरानी बात ग़लत साबित हुई? सौ में से निन्यानवे मौक़ों पर आपको उत्तर आएगा कि नहीं, बात तो समझ ली, लेकिन कोई पुरानी बात तो भीतर की ग़लत साबित हुई ही नहीं। अगर जो आप नयी बात समझ रहे हैं, वो आपके भीतर की किसी पुरानी बात को ग़लत साबित नहीं कर रहा तो आपने कुछ समझा नहीं। क्योंकि समझने की प्रक्रिया ही आंतरिक तोड़-फोड़ की है।

जो भी नई बात आपके मन में आ रही है, वो नया ज्ञान बनकर बैठने नहीं आ रही। वो भीतर आपने जो कचरा जमा कर रखा है, उसकी सफ़ाई करने आ रही है। वास्तविक ज्ञान बुलडोजर की तरह है, वो भीतर आएगा और जो पुराने ढाँचे होंगे, पैटर्न्स (ढाँचे), उनको ध्वस्त करेगा। तो अपनेआप से पूछिए, कुछ ध्वस्त भी हुआ। अरे, चोट लगी कि नहीं? चोट नहीं लगी तो समझे कहाँ? बिना चोट खाये समझना सम्भव ही नहीं, और हम सब समझ जाते हैं बिना चोट खाये। बड़े ताज्जुब की बात है!

तुम्हें चोट लगी नहीं, तुम समझ कैसे गये? अपमान का कड़वा घूँट तुमने पिया नहीं, तुम समझ कैसे गये? इसीलिए समझने में सबसे ज़्यादा तकलीफ़ उन बेचारों को आती है, जिन्होंने अपनेआप को प्रशिक्षण नहीं दिया होता अपमान झेलने का। जिनके लिए बहुत बड़ी बात यही होती है कि कोई हमें ग़लत न बोल दे, कोई हमे बुरा न बोल दे, कोई हमें कड़वा न बोल दे, उनके लिए सर्वथा असम्भव हो जाता है कुछ भी सीखना।

क्योंकि इसको एक नियम की तरह याद कर लो। तुम कुछ सीख नहीं सकते अगर जो तुम सीख रहे हो, भीतर कुछ तोड़ नहीं रहा। और हम भीतर कुछ टूटने देते नहीं क्योंकि टूट देती है चोट। और ये हो नहीं पाएगा कि तुम भीतर का अपना ढाँचा यथावत रखो और साथ ही साथ कह दो कि मैंने कुछ नया सीख लिया; ऐसा नहीं होता बाबा। हम चाहते यही हैं कि पुराना भी सब बना रहे और नया भी कुछ मिल जाए। पर ऐसा हो नहीं पाता, नियम है।

कुछ अगर सीखोगे, ऊपर को उठोगे तो जो निचली चीज़ें तुमने पकड़ रखी थीं, उनकी व्यर्थता को स्वीकार करके ही उठोगे। जिसमें ये साहस नहीं, जिसमें ये सत्यनिष्ठा नहीं कि वो अपनी पुरानी व्यर्थताओं को व्यर्थ जाने, ईमानदारी से स्वीकारे और साहस के साथ फिर त्यागे, वो जिस निचले तल पर पड़ा है उसी पर पड़ा रह जाएगा, कुछ सीखकर कभी ऊपर नहीं उठ पाएगा।

तो तत्काल मत दावा कर दिया करिए कि मैं कुछ सीख गया; क्या सीख गये? कुछ नहीं। सीखे होते तो भीतर हलचल मचती। और ज़्यादा सीखा होता तो भीतर भूचाल आ जाता। सीखना कोई बच्चों का खेल थोड़ी है कि सीख लिया। सीखने के लिए पुरुष चाहिए, वयस्कता चाहिए, मर्द चाहिए। छाती पर चोट लगती है तब इंसान कुछ सीखता है। हमें चोट खाना गवारा नहीं, तो क्या सीखोगे।

हमारे लिए यही बहुत बड़ी बात है: हमारा क्षुद्र मान-अपमान। सिखाने वाला भी हमसे मुस्कुराकर ही बात करे। सिखाने वाला भी हमारे अनुसार ही हमसे व्यवहार करे। मुझे सिखाओ पर मेरे तरीक़े से सिखाओ; कुछ नहीं सीख सकते तुम। ये ऐसी सी ही बात है कि तुम बुलडोज़र से कहो कि बेटा, इमारत पर गुलाब जल छिड़कना पहले। और तुम्हें जो भी कुछ करना है गुलाब जल छिड़क-छिड़ककर ही करना। वो गुलाब जल छिड़कते ही रह जाएगा तो फिर काम कर चुका अपना।

समझ में आ रही है बात?

ये पहली बात बतायी, अभी और भी है। फिर जब लगे कि समझ गये तो भी सतर्क रहिए भीतरी माया से। क्योंकि उसका पहला उद्देश्य होता है आत्म संरक्षण, सेल्फ़ प्रिज़र्वेशन। वो आपको बहुत ज़ल्दी ये धोखा दे देती है कि आप जानकार हो गये, समझदार हो गये। क्योंकि अगर उसने आपको ये नहीं कहा कि तुम समझ गये, तो तुम अभी समझने की कोशिश फिर करते ही रहोगे। और समझने की कोशिश अहंकार के लिए घातक होती है। अहंकार तो नासमझी में ही, अंधेरे में ही पलता-बढ़ता है न? तो बहुत ज़ल्दी तुम्हें ये विश्वास दिला देना चाहता है कि तुम समझ गये। तो अब हम क्या करेंगे? हम जाँचेंगे, हम कैसे जाँचेंगे?

आप गणित पढ़ते थे, तो पहले उसमें थ्योरी आती थी, वो बहुत आसान होती थी — या भौतिकी में, फ़िज़िक्स में — लगता था ठीक है, चार-पाँच पन्ने की थ्योरी है। उसके बाद कैसे जाँचते थे, कुछ समझे कि नहीं समझे? उसके बाद आते थे न्यूमेरिकल , धाएँ ! उसका क्या मतलब होता है? उसका मतलब होता है प्रयोग, ऐप्लिकेशन। कुछ अगर वाक़ई सीखा है तो उसका प्रयोग भी तो देखो कर पा रहे हो कि नहीं, प्रयोग कुछ हो रहा है। और प्रयोग की भी जो फिर स्थितियाँ होती हैं, वो वास्तविक जीवन में अति-जटिल होती हैं।

वहाँ फिर इतना ही कह देने से काम नहीं चल जाता कि पेंडुलम का टाइम पीरियड होता है 2π √L/g। वहाँ फिर तुम्हें ऐसा सवाल दे दिया जाएगा कि एक पृथ्वी है तुम्हारी, पृथ्वी को उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक उसमें एक सुरंग खोद दी गयी है और सुरंग में एक गेंद डाल दी गयी है। अब बताओ सुरंग में क्या करेगी गेंद? क्या करेगी गेंद? सिंपल हार्मोनिक मोशन (सरल आवर्त गति) करेगी गेंद, चलो उसका टाइम पीरियड निकालो। ये क्या हो गया, ये क्या हो गया?

वास्तविक जीवन, रियल लाइफ ऐसे ही जटिल होती है, उसमें कई तरह की चीज़ें एकसाथ समाविष्ट हो जाती हैं। अब तुम्हें थ्योरी ऑफ ग्रैविटेशन भी पता होनी चाहिए और तुमको सिंपल हार्मोनिक मोशन भी पता होना चाहिए। कई तरह की बातें हैं जो समरस हो रही हैं, जो एकसाथ आ रही हैं। तुम अगर पाओ कि तुम्हारा ज्ञान इन सब जटिलताओं के मध्य तुम्हें समाधान तक पहुँचने में मदद कर रहा है तो मानना कि समझे।

नहीं तो ये बहुत सस्ती समझ है कि किसी समझाने वाले के सामने बैठ गये, उसने कुछ शब्द दे दिए, और तुमने कहा, ये जो शब्द बोले गये हैं, क्या मैं इन शब्दों को जानता हूँ? जानता हूँ से माने मैं क्या इनका अनुवाद कर ले रहा हूँ अपनी भाषा में? हाँ, अगर मैं अनुवाद कर ले रहा हूँ तो मैं कह दूँगा, दावा करूँगा कि मैं समझ गया। ऐसे नहीं होता न?

आपने सांख्ययोग के पैंतालिसवें श्लोक की बात करी है। तो श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि वेद सब प्रकृति के तीन गुणों की ही बात करते रह जाते हैं, और अर्जुन तुम्हें निस्त्रैगुणय हो जाना है, प्रकृति के गुणों के आगे निकल जाना है। अब ये जो बात कह रहे हैं, इस बात में जितने शब्द हैं उन सब शब्दों के आप भाषाई अर्थ तो जानते ही हैं। तो अगर आपको अपनेआप को यही प्रमाणित करना है कि मैं समझ गया, तो आप बखूबी कर सकते हैं। बड़ी आसानी से आप कहेंगे, मैं प्रकृति का भी अर्थ जानता हूँ, मैं तीन गुणों का भी अर्थ जानता हूँ, मैं जानता हूँ वेद क्या होते हैं, और मैं ये भी जान रहा हूँ कि कह रहे हैं कि प्रकृति के तीन गुणों से आगे निकल जाओ, अर्जुन! मैं समझ गया। ये लीजिए आपने अपनेआप को प्रमाण पत्र दे दिया। समझे क्या, कुछ भी नहीं।

और लोगों ने ग्रन्थों के साथ यही ग़लती या कहिए कि यही बेईमानी हमेशा से करी है। पूछते ही नहीं हैं कि ये जो बात कही गयी है, इस बात ने मेरे भीतर कुछ ध्वस्त करा भी या नहीं करा? कुछ भी ध्वस्त करा क्या? ध्वस्त कुछ हुआ नहीं, दावा ये है कि समझ गये। जो बात कही गयी है, उसका जीवन के यथार्थ में प्रयोग कर पा रहे नहीं, लेकिन दावा यही है कि समझ गये।

तो ये मैंने आपको दो बातें कही हैं। पहली ये है कि जाँचिए कि चोट लगी कि नहीं लगी, कुछ टूटा कि नहीं टूटा। और दूसरा मैंने कहा कि देखिए कि जो भी चीज़ आप कह रहे हैं समझ गये, उसको आप जीवन में प्रयोग भी कर पा रहे हैं।

प्र: जी, ऐप्लिकेशन्स (अनुप्रयोग)।

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