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लेख
ChatGPT क्या नहीं कर सकता? || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2023)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
15 मिनट
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आजकल आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस , ए.आई. (कृत्रिम बौद्धिक क्षमता) का बड़ा बोलबाला है, तो हाल ही में एक चैट जीपीटी नाम का कन्वर्सेशनल ए.आई. रिलीज़ हुआ था। और इस ए.आई. के बारे में ख़ास बात है कि आप उससे कोई भी सवाल पूछ सकते हो, उससे बात कर सकते हो, उससे आप कोई कहानी भी लिखवा सकते हो, कोडिंग भी करवा सकते हो।

तो दुनिया भर में ख़बर में तो ये आया है, और लोगों में डर आ गया है कि कहीं ये उनकी नौकरी न ले जाए, इस तरह का *ए.आई.*। यहाँ तक कि सुनने में आया है कि गूगल में भी एक इंटर्नल मेमो चला था इस ए.आई. को लेकर के।

आचार्य जी, क्या ऐसा कोई काम बचा है जो ए.आई. नहीं कर सकता?

आचार्य प्रशांत: प्यार नहीं कर सकता! या वो भी उससे करवाओगे? ‘*चैट जीपीटी, गो लव माय गर्लफ़्रेंड*।'

(श्रोतागण हँसते हैं)

यही है, यही जवाब है। और बहुत अच्छी बात है कि ए.आई. से उन सब लोगों के लिए ख़तरा हो रहा है जो सिर्फ़ ढर्राबद्ध काम किया करते थे। तुम क्यों करते थे ढर्राबद्ध काम? तुम ऐसे काम क्यों करते थे जो बस पैटर्न बेस्ड थे, यंत्रवत् थे? क्यों करते थे? नाउ रेज़ योर गेम (अब अपना स्तर उठाओ), अब कुछ ऐसा करो जिसमें सृजनात्मकता हो।

ए.आई. क्रिएटिव (सृजनात्मक) नहीं हो सकती। वो जो कुछ भी कर रही है, वो दिखती भी हो भले, कि नया जवाब दे दिया, कहानी लिख दी; वो क्रिएटिव नहीं है, है तो रिपिटेटिव (दोहराया गया) ही। हाँ, वो स्मार्टली रिपिटेटिव है, तो इसलिए आपको क्रिएटिव लग सकती है, पर वो वास्तव में क्रिएटिव नहीं होती। कोई मशीन (यंत्र) कभी क्रिएटिव नहीं हो सकती; आज की बात नहीं, आज से दस हज़ार साल बाद की बात भी बोल रहा हूँ।

समझ पाना, साक्षी हो पाना, प्रेमपूर्ण हो पाना, करुण हो पाना न किसी मशीन के लिए संभव है, न ए.आई. के लिए संभव है; किसी तरह की आर्टिफ़िशियालिटी (कृत्रिमता) के लिए वो संभव नहीं है।

मतलब समझ रहे हो?

मनुष्यों में जितने आध्यात्मिक मूल्य होते हैं, सिर्फ़ वही हैं जिनको मशीन कभी नहीं पकड़ सकती। मनुष्य जितने काम करते हैं, मशीन सब करके दिखा देगी, तो मनुष्य के लिए सिर्फ़ क्या बचेगा फिर करने को? अध्यात्म; तो वही है जो मशीन कभी नहीं कर सकती।

तो अच्छी बात है न, ये चैट जीपीटी वगैरह आ रहे हैं। तुम्हारे लिए अब ये चुनौती है, क्योंकि अगर अब अध्यात्मिक नहीं बनोगे तो तुमसे बेहतर तो मशीन है। न भूख लगती है उसको, न उसको मूड स्विंग्स होते हैं, न वो ये कहेगी कि अभी तो खाना खाया है, अभी सोना है थोड़ी देर को; उसको कुछ नहीं!‌

तो इंसानों को रिडंडेंट बना रही है टेक्नोलॉजी (तकनीक), और ये बहुत अच्छी बात है। रिडंडेंट माने गैरज़रूरी, अनावश्यक। इंसानों को टेक्नोलॉजी अनावश्यक बना रही है, और ये बहुत अच्छी बात है। अब इंसान को मजबूर होकर कुछ ऐसा करना पड़ेगा जो मशीन नहीं कर सकती; नहीं तो न नौकरी रहेगी, न रिश्ते रहेंगे, न समाज में आपके लिए कोई जगह रहेगी। आपके हर काम के लिए मशीन तैयार खड़ी है, तो आपकी कहाँ कोई जगह है, आपको कोई क्यों पूछेगा? तो मैं तो शुभ ही मानता हूँ।

बिलकुल कहानी लिख सकती है। आप उसको बोलेंगे कि एक कहानी लिखो जिसमें गाय हो और चूहा हो, वो लिख देगी। पर वो कहानी वैसी ही होगी जैसी हमारी फ़िल्मों की स्क्रिप्ट (पटकथा) होती हैं, कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा और भानुमति ने कुनबा जोड़ा; और कैसे वो लिखेगा, वो तो ऐसे ही लिख रहा है।

आपने उसको एक लगभग इनफायनाइट डेटाबेस फ़ीड करा है, जिसमें चूहों को लेकर लाखों कहानियाँ हैं और गाय को लेकर भी लाखों कहानियाँ हैं, तो वो बहुत स्मार्टली कुछ कहानी इधर से, कुछ उधर से लेकर लिख देता है। ठीक वैसे जैसे हमारे लिरिसिस्ट (गीतकार) गाने लिखते हैं, कि कुछ यहाँ से लो, कुछ वहाँ से लो। ऐसे ही तो लिखे जाते हैं गाने? उसमें कौनसी ऑरिजनलिटी (मौलिकता) होती है।

तो ये बड़ा अच्छा शब्द है - मौलिकता, ऑरिजनलिटी ; बस यही वो चीज़ है जो मशीन के पास नहीं हो सकती, वो पूरी तरह आश्रित होती है अपने डेटाबेस पर। आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस को पैना करने के लिए, आप जानते ही होंगे, ज़रूरी होता है कि पहले उसको खूब डेटा (आँकड़े) खिलाया जाये। आप उसको जितना डेटा खिलाते हो, वो उतनी पैनी होती जाती है, और इसीलिए आज डेटा का इतना मूल्य है।

समझ रहे हो?

और इसीलिए डेटा प्राइवेसी (आँकड़ों की निजता), डेटा थेफ़्ट (आँकड़ों की चोरी) वगैरह आज इतने बड़े मुद्दे हैं। हमारा ही डेटा जब मशीन को खिलाया जाता है, लाखों-करोड़ों लोगों का डेटा , तब वो उस डेटा में पैटर्न डिटेक्ट कर पाती है; जितना ज़्यादा डेटा खिलाओगे, उतनी शार्पली वो पैटर्न डिटेक्ट कर पाएगी। और वो डेटा रीयल (वास्तविक) होना चाहिए, *रीयल डेटा*। तो हमारा-आपका डेटा इसीलिए इन कंपनियों को बेच दिया जाता है, जो हमारी-आपकी जो जानकारी होती है वो।

और पश्चिम में तो प्राइवेसी (निजता) एक बड़ा संवेदनशील मुद्दा है, और वहाँ उसको लेकर उनके पास कड़े कानून भी हैं, भारत में प्राइवेसी जैसा कुछ होता ही नहीं। यहाँ क्या प्राइवेसी जैसा है, यहाँ तो ऐसे होता है - ‘थोड़ा एडजस्ट (समायोजित) करिएगा।’ बिलकुल! मियाँ–बीवी भी बैठे हों ट्रेन में, तो एक आकर कहेगा, ‘थोड़ा बीच में हमें जगह दे दीजिए। एडजस्ट करिएगा, हमें भी तो पहुँचना है। देखिए हम छात्र लोग हैं, युवा शक्ति से पंगे न लें।’

तो भारत ही है वो जगह जहाँ से मशीनों को और ज़्यादा, ज़्यादा डेटा फ़ीड किया जा रहा है; भारत और बाकी सब जो विकासशील और ग़रीब मुल्क़ हैं, वहाँ से जा रहा है *डेटा*। पश्चिम में अगर ये पता चल जाए कि आपका डेटा , आपका पर्सनल डेटा इधर-उधर हुआ है, तो तुरंत जेल होती है; भारत में क्या फर्क़ पड़ता है!

एक मुद्दा चल रहा है बल्कि अब, ‘*राइट टु बी फॉरगाटन*’ (भुला दिए जाने का अधिकार); जानते हैं? पश्चिम में इस पर ज़्यादा बात हो रही है। कोई कह रहा है, ‘आपकी फ़ोटो खींच ली गयी है, वो तो हमेशा के लिए हो जाती है, और उसमें कहीं लिखा नहीं होता कि वो किन स्थितियों में खींची थी, कब खींची थी, उसका पूरा कॉन्टेक्स्ट (संदर्भ) क्या था। वो बस एक पल है, उस एक पल के आगे क्या है, पीछे क्या है, कुछ पता नहीं। पर वो फ़ोटो अमर हो जाती है, और आपका कभी अगर इतिहास लिखा जाएगा तो इतिहास में भी वो फ़ोटो चिपक जाएगी।‘

तो कह रहे हैं कि ये नहीं होना चाहिए न, एवरीबडी शुड हेव राइट टू बी फॉरगॉटेन (प्रत्येक व्यक्ति के पास भुला दिए जाने का अधिकार होना चाहिए)। तो खै़र वो थोड़ा अलग मुद्दा हो गया।

बहुत अच्छी बात है। जो पूरा इंडस्ट्रियलाइजेशन (औद्योगीकरण) हुआ था, उसके पक्ष में जो एक महत्वपूर्ण तर्क दिया जाता था वो यही था - ‘ दिस विल लीव ह्यूमन बीइंग्स विथ ग्रेटर लेशर टाइम , मशीन इंसान का काम कर देगी तो इंसान को लेशर (खाली समय) मिलेगा।‘ और वह लेशर क्यों चाहिए? ताकि इंसान क्रिएटिव हो पाए।

देखिए कुछ काम ऐसे होते हैं जो जल्दबाज़ी में नहीं किए जाते। मैं आपसे बोल दूँ कि पंद्रह मिनट के भीतर एक गीत लिख दीजिए, तो वो पता नहीं क्या होगा। सृजक लोगों को, क्रिएटिव लोगों को बहुत देर तक और कई बार अनिश्चित अवधि तक चुप बैठना पड़ता है, अकेले होना पड़ता है, प्रयोग करना पड़ता है, तब जाकर के कोई बात निकलती है।

और इसमें मैं सिर्फ़ कलाकारों की नहीं बात कर रहा, वैज्ञानिक भी। वैज्ञानिकों से आप पूछें कि बताइएगा कि कितने महीने के अंदर-अंदर आपकी नई खोज या नया अविष्कार आ जाएगा; वो कुछ नहीं बता पाएँगे। वो कहेंगे, ‘चुपचाप हमें काम करने दो। दो महीना भी लग सकता है, बीस साल भी लग सकते हैं।‘

दस हज़ार प्रयोग लगे थे, किसके?

श्रोता: बल्ब के।

आचार्य: तो हमें नहीं पता होता।

लेकिन जब आपको सारे मशीनी काम करने पड़ते हैं, इंसानों को, तो उसमें तो हमेशा एक समय-सीमा बँधी होती है न? ‘इतनी दर से उत्पादन करो, इतना काम करो, एक दिन में इतना तो करके दिखाना ही है।‘ तो उसका नतीजा होता है कि फिर जीवन में रस नहीं रहता, सौंदर्य नहीं रहता; क्वांटिटी (मात्रा) तो रहती है, क्वालिटी (गुण) नहीं रहती, क्योंकि मशीन क्वांटिटी पैदा करवा देती है।

आप इंसान को मशीन बना देंगे तो आप उसे कहेंगे कि दिन में तुम्हारा प्रोडक्टिविटी रेट इतना होना चाहिए, वो बना देगा; लेकिन वो ऐसी चीज़ें नहीं बना पाएगा जिनमें एक गहरी आर्टिस्टिक क्वालिटी , एक एस्थेटिक सेंसिबिलिटी हो।

तो जब मशीन आयी थी और जब पहले भाप से पावर आयी, तो यही कहा गया कि अब दुनिया में क्रिएटिविटी का एक नया दौर शुरू होगा। उल्टा हो गया! आज आप देखिए पोएट्री (कविता) मर चुकी है। आप कितने समसामयिक कवियों के नाम जानते हैं, बताइए, किसी भी भाषा में? आप कवियों के नाम ज़रूर जानते होंगे, वो सब पचास-सौ साल पहले के होंगे। ये किया है हमारी वर्तमान आर्थिक व्यवस्था, सामाजिक व्यवस्था ने। तो बहुत अच्छा है कि ए.आई. आ रही है।

आप जानते हैं, ब्रिटेन में सर्वे (सर्वेक्षण) हुआ, वहाँ पर तीन-चौथाई से ज़्यादा लोगों ने कहा, कामकाजी लोगों ने, पेशेवर लोगों ने, ‘वो हमें पता है कि हम जो काम कर रहे हैं वो नहीं भी करा जाए तो कुछ नहीं होगा। हमारा जो काम है वो वर्थलेस (मूल्यहीन) है, पर कर रहे हैं। जो काम है, इससे किसी का कुछ आता-जाता नहीं, पर हम कर रहे हैं।’

और उसका क्या नतीजा होता है? उसका नतीजा होता है लो सेल्फ़-एस्टीम , डिप्रेशन (अवसाद)। एक बंदा दिनभर जो कर रहा है, उसको पता है वो काम ही फ़िज़ूल है; भले ही उससे उसको पैसा मिलता हो, लेकिन उससे उसको आंतरिक पूर्णता तो नहीं मिलती न। तो ये सारे काम चले जाना चाहिए मशीनों के पास, टेक्नोलॉजी के पास, ए.आई. के पास, ये करें।

जो कुछ भी प्रोग्रामेबल है, वो करने दो न किसी प्रोग्राम्ड मशीन को; भारी चुनौती आएगी उन लोगों के सामने, जो सिर्फ़ प्रोग्रामिंग पर ही चल सकते हैं। उनका दम घुटने लगेगा, क्योंकि अब उनको कहा जाएगा कि अब तुम खुले हो, हम तुमको कोई दिशा-निर्देश नहीं दे सकते। क्योंकि दिशा-निर्देश सारे किसको दिए जाते हैं? मशीनों को।

‘अगर हमें गाइडेंस ही देनी है, अगर हमें नियम ही बताने हैं, तो वो सारे नियम बता देंगे हम किसी मशीन को, और रूल बेस्ड (नियमबद्ध) काम तो मशीन बहुत अच्छे से कर लेगी। अब बेटा तुम कुछ ऐसा करके दिखाओ जो रूल बेस्ड नहीं है, उसी बात के तुमको पैसे मिलेंगे, उसी बात की तुमको इज़्ज़त मिलेगी।‘

तो जितने लोग हैं जो सिर्फ़ रूल बेस्ड काम ही कर सकते हैं, प्रोग्राम्ड टास्क ही कर सकते हैं, वो बेरोज़गार तो होंगे-ही-होंगे, जीना मुश्किल हो जाएगा उनका। यहाँ तक कि, अब सुनिए ख़तरनाक बात, जो रूल बेस्ड रिश्ते होते हैं उनका भी कोई भविष्य नहीं है, क्योंकि वो काम मशीन कर देगी।

(श्रोतागण हँसते हैं)

हाँ भाई! भई आपके और आपके साथी के रिश्ते में चेतना है ही नहीं, कुछ नियम-भर हैं। क्या नियम हैं? ‘मैं घंटी बजाऊँगा, तू चाय बनाएगी।‘ तो ये तो एक ह्यूमन लाइक मशीन कर सकती है न? और आप उसको बिलकुल एक स्त्री की देहाकृति में बना सकते हैं, वो भीतर से रोबो है और बाहर से महिला जैसी दिखती है, पूरी महिला। सारे उसके अंग, यहाँ तक कि आंतरिक अंग भी उसके महिला के ही हैं, और प्रोग्राम्ड हैं, यहाँ (सिर की ओर इशारा करते हुए) उसके लगी हुई है *चिप*। यहाँ चिप लगी हुई है और पूरी महिला है, और जितनी चीज़ें एक आम महिला करती है या कर सकती है, वो सब कर सकती है।

और ज़्यादातर पुरुष, ज़्यादातर महिलाएँ एक एल्गोरिदम की तरह ही तो जीते हैं न? बिलकुल एल्गोरिदम की तरह। भई सुबह इतने बजे उठना है, उठ जाते हैं, बीच–बीच में ये दिखाना है कि हम रूठे हुए हैं, वो मशीन भी रूठेगी बीच–बीच में। भई ये सब तय है, पहले से तय है। पुरुष उससे सेक्स की माँग कर सकता है, मशीन कह सकती है, ‘नहीं, मूड नहीं है।‘ हर तीसरे महीने मशीन बोल सकती है कि मुझे घुमाने ले चलो। अब क्या करोगे? दफ़्तर से भी गये, घर से भी गये।

इसी तरीके से महिलाओं की सेवा के लिए ए.आई. पुरुषों का निर्माण किया जा सकता है, वो भी बिलकुल वैसा ही व्यवहार करेंगे, वो भी दाढ़ी बना रहा है खड़ा होकर के। आप सोचो न, टेक्नॉलाजी वहाँ तक पहुँच गयी है कि आप उससे कहो कि गाना लिख दो, वो गाना लिख सकती है, तो वो पुरुषों जैसा व्यवहार क्यों नहीं कर सकती, वो करेगी। और कोई भी पुरुष अपनी ज़िंदगी में किसी नए तरह का व्यवहार तो करता नहीं न, सब प्रिडिक्टेबल होते हैं, सब प्रोग्राम्ड-सा जीवन जीते हैं।

अब कैसे जियोगे? आप जो कुछ कर रहे हो, आप से बेहतर एक?

श्रोता: मशीन कर रही है।

आचार्य: आपके दोस्तों के लिए भी आप से बेहतर एक?

श्रोता: मशीन है।

आचार्य: तो आपकी जगह मशीन ले आ देते हैं और आपके दोस्त की जगह मशीन ले आ देते हैं, तो दोस्ती भी मशीन और मशीन में करा देते हैं, तो आप और आपका दोस्त क्या करेंगे? अब आपके लिए एक काम बचा कि आप पता करें कि वास्तव में मित्रता कहते किसको हैं। तो मनुष्य के लिए बस यही काम बचेगा कि भगवद्गीता पढ़ो।

(श्रोतागण हँसते हैं)

हँसने की बात नहीं है, वही बात है, वही एक काम है जो मशीन नहीं कर सकती। मशीन तत्काल भगवद्गीता का डेढ़-सौ भाषाओं में अनुवाद कर देगी, पर कभी गीता पढ़कर आह्लादित नहीं हो पाएगी। कोई मशीन ऐसी नहीं हो सकती कि जो गीता पढ़े और उसकी आँख से आँसू निकल आएँ।

कोई मशीन ऐसी नहीं हो सकती जो कहे कि मुझे अपने अहंकार का खात्मा चाहिए, क्योंकि मशीन के पास कोई ‘*आई*’ (अहम्) होगा ही नहीं। होगा, बिलकुल होगा, वो ऊपर–ऊपर से बोलेगी कि आई ऐम दिस (मैं यह हूँ), हाउ कैन आई सर्व (मैं कैसे सेवा कर सकती हूँ); जो भी है पूरा, एकदम मनुष्यों की तरह। उसके ' आई ' के पास मुक्ति की आकांक्षा नहीं होगी, क्योंकि वो एक मशीन का अहम् है, इसीलिए वो जैसा है बस वैसा है। वो ये नहीं बोलेगा कि मुझे लिबरेशन चाहिए, कोई मशीन नहीं बोलेगी, ‘मुझे मुक्ति दो,’ एकदम नहीं!

न प्रेम करेगी, न मुक्ति माँगेगी, और कोई मशीन ये नहीं कहेगी कि बगल की मशीन को बचाने के लिए मैं जान भी दे सकती हूँ। तो उसमें करुणा नहीं होगी, मैत्री नहीं होगी, समर्पण नहीं होगा, यही सब है जो मशीन में हो नहीं सकता। जिस हद तक आप प्रोग्राम करके इस प्रकार का व्यवहार दर्शाना चाहते हैं, वो हो जाएगा, तो मशीन प्रेमपूर्ण व्यवहार दर्शा देगी, पर प्रेम नहीं कर पाएगी।

प्रेम जैसा व्यवहार दिखा देगी, कि भाई वैलेंटाइंस डे आया है तो वो टेडी लेकर आ गयी। क्योंकि आपने फ़ीड कर रखा है कि प्रेम का मतलब होता है टेडी बियर , तो मशीन कहेगी, ‘ठीक है, प्रेम माने टेडी बियर , तो मैं भी कर देती हूँ *टेडी बियर*।’ या प्रेम का मतलब होता है कि आवाज़ को इस तरह से माड्युलेट कर लो कि दूसरों से एक आवाज़ में बात करनी है और जो अपना सगा है उससे अलग तरह से बात करनी है; वो मशीन वो भी कर देगी, पर मशीन ये नहीं कर पाएगी कि जिससे प्रेम है उसके लिए जान ही दे दी।

सत्य की आकांक्षा किसी मशीन में नहीं होगी, आत्म‌-आहुति कोई मशीन नहीं दे पाएगी। तो अगर आप ये सब कर सकते हैं, तब तो आपके लिए अब दुनिया में जगह रहेगी, कि साहब हम प्रेम जानते हैं, मौलिकता जानते हैं हम, सृजनात्मकता जानते हैं हम, हम अपनी आहुति देना जानते हैं; तब तो हमारे लिए दुनिया में कोई जगह रहेगी। नहीं तो चैट जीपीटी आ गया और ये बहुत तेज़ी से मामला आगे बढ़ रहा है, करेंगे क्या आप? कुछ भी नहीं!

गाड़ी चलाने वाला भी ऑटोमेटेड है, गाड़ी भी ऑटोमैटिक है, और उसमें जो बैठ रहा है वो भी ऑटोमेटन है। सब यही ऑटोमैटिक–ऑटोमैटिक काम चल रहा है, इंसान ऐसे (गाल पर हाथ रखते हुए) बैठकर देख रहा है - ‘इस पूरी व्यवस्था में मेरा रोल (भूमिका) क्या है?’

भाई, तुम्हारे लिए कोई रोल नहीं है अब, एक ही रोल है - जाओ गीता पढ़ो!

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