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लेख
भूखे मर जाना, गुलामी की रोटी मत खाना || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
13 मिनट
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प्रश्न: आचार्य जी, युवा लोगों को सबसे पहले अपने करियर (व्यवसाय) पर ध्यान देना चाहिए, या मुक्ति पर ध्यान देना चाहिए? जब अंतिम लक्ष्य मुक्ति है तो क्या उसके बारे में प्रयत्न करते रहना चाहिए या नहीं?

आचार्य प्रशांत: दोनों अलग-अलग आयाम की बातें हैं, बेटा।

शरीर है न तुम्हारे पास? शरीर है तो खाते भी होगे। तो जीविका कहीं से तो कमानी पड़ेगी न? इसीलिए जीविका का प्रश्न हल्के में नहीं लिया जा सकता। और जिस युग में तुम जी रहे हो, उसमें मात्र तुम्हें खाने को दो रोटी ही नहीं चाहिए, तुम्हें थोड़ा-बहुत और भी कुछ चाहिए। सड़क पर नहीं जी पाओगे। जंगल आदमी ने सब काट दिए, तो जंगल भी कैसे जाओगे? पहले तो था कि जंगल जाएँगे, नदी में नहाएँगे। अब नदी तो नाला बन गई है। नहाओगे भी कैसे अगर पैसा नहीं है? बताओ, कब नहाओगे? या इंतज़ार करोगे कि अभी अप्रैल चल रहा है और मानसून आने ही वाले हैं दो महीने में! और उसमें भी अब एसिड रेन (अम्लीय वर्षा) होती है; गये थे नहाने, छाले लेकर आ गए।

तो सिर्फ़ जीने के लिए ही सही, कुछ तो कमाना पड़ेगा न?

तो बात ये नहीं है कि, “'मुक्ति' पर ध्यान दें या 'करियर' पर ध्यान दें?” शरीर लिए हो तो आजीविका के प्रश्न का उत्तर तो तुम्हें देना पड़ेगा। हाँ, आजीविका तुम इस तरह से चलाओ कि वो मुक्ति में सहायक रहे, वो मुक्ति की तरफ़  उन्मुख रहे, कि आजीविका भी चल रही है लेकिन रोटी ऐसे नहीं कमा रहे कि राम की ख़िलाफ़त करनी पड़ रही है। दोनों काम एक साथ हो रहे हैं: खाना भी चल रहा है, और ख़िदमत भी चल रही है। खा भी रहे हैं और ख़िदमत भी कर रहे हैं।

जो ग़ुलामी की रोटी खा रहा हो, उसे परम मुक्ति की बातें शोभा ही नहीं देतीं। परमात्मा भी मुस्कुरा कर पूछेगा कि —"रोटी तक तो तू ग़ुलामी की खाता है, और बातें करता है मुक्ति की!"

(एक श्रोता की ओर इंगित करते हैं) समझ रही हैं?

ये बाजू क्यों दिए गए हैं? ये किसलिए हैं शरीर में? श्रम करने के लिए हैं न? तो जिसने पेट में आँत दी है, जहाँ भूख उठती है, उसी ने हाथ में माँसपेशियाँ भी दी हैं, जो खाना अर्जित कर सकती हैं। अब खाना अर्जित करो-न-करो, बाजुओं का इस्तेमाल करो-न-करो, आँतों का इस्तेमाल तो रोज़ करते हो, कि नहीं करते? या तो ये कह दो कि हम काम नहीं करते और भोजन भी नहीं करते। पर नहीं साहब, आँत का इस्तेमाल तो रोज़ करते हो, और बाजू का इस्तेमाल करते हुए कहते हो, "क्यों करें? जीवन का लक्ष्य तो मुक्ति है, तो श्रम क्यों करें?" मत करो श्रम, खाओ भी मत!

और मैं नहीं कह रहा हूँ कि पूँजीवादी हो जाओ, धन्ना सेठ हो जाओ, लाखों-करोड़ों कमाओ, पर इतना तो कमाओ कि रोटी मात्र के लिए तुम्हें सिर न झुकाना पड़े। इतना तो कमाओ कम-से-कम। लालचवश मत कमाओ, धर्मवश कमाओ; दोनों में अंतर है। एक आदमी लालच के लिए कमाता है; बहुत हैं ऐसे जो लालच के मारे और भय के मारे कमाते हैं। वैसे मत हो जाओ। पर कमाया ही नहीं और इसलिए अधर्म के सामने झुकना पड़ा, तो गड़बड़ हो जाएगी न? इसलिए धर्मवश कमाओ। और धर्मवश कुछ कहा नहीं जा सकता कितना कमाना है। हो सकता है बहुत कम में काम चल जाए, और कभी-कभी धर्म की माँग होती है कि बहुत चाहिए, तो बहुत भी लाओ।

प्रश्नकर्ता (प्र १): आपने जो अभी बात कही, मैं उसपर अपने विचार व्यक्त करना चाहता हूँ। जैसे उन्होंने (दूसरे प्रश्नकर्ता) ने कहा कि "मोक्ष अंतिम लक्ष्य है" और हम जानते हैं अंदर से कि मोक्ष अंतिम लक्ष्य है, उससे ऊपर नहीं है कुछ। तो अगर संन्यास भी ले लिया जाए तो उसमें क्या हर्ज है? क्योंकि मेहनत तो उस समय भी आदमी कर रहा है, ऐसा नहीं है कि वो संन्यास लेकर वेला है। वो एक मार्ग पर चल रहा है, वो अपनी साधना कर रहा है। इसपर थोड़ा-सा आप प्रकाश डालिए।

आचार्य प्रशांत: संन्यास माने क्या?

प्रश्नकर्ता (प्र २): जैसे संन्यासी संन्यास लेते हैं। संन्यास माने वो संन्यास लेकर अपनी साधना कर रहा है, लेकिन रोटी नहीं कमा रहा।

आचार्य प्रशांत: तुम रोटी नहीं कमा रहे हो तो कहीं से तो लाओगे रोटी?

प्रश्नकर्ता (प्र २): माँग के लाओगे फिर।

आचार्य प्रशांत: कोई मुफ़्त में देगा? कितने दिन मुफ़्त में देगा?

प्रश्नकर्ता (प्र 2): भारतीय परंपरा भी कई बार कुछ मदद कर देती है।

आचार्य प्रशांत: भारतीय परंपरा ये भी कहती है कि जो बोलो, सोच-समझ के बोलो।

ऐसे नहीं होता कि तुम्हें जीवन भर हट्टा-कट्टा जवान आदमी देखकर भी कोई रोटी ही दिए जाए। दूसरी बात, तुम अभी साधक हो, सिद्ध तो हो नहीं गए। जो सिद्ध नहीं हो गया, उसकी इच्छाएँ क्या मात्र रोटी तक सीमित रहेंगी? तुम मुक्ति की कामना रख रहे हो, मुक्त तो हो नहीं गए। जब मुक्त हो नहीं गए, तो तुम्हारी इच्छा क्या रोटी तक ही रुक जाएगी? रोटी भी मुफ़्त नहीं मिलती तो आगे की चीज़ें क्या मुक्त मिलेंगीं, भाई? जो तुम्हें देगा, वो फिर तुम्हारे गले में पट्टा भी बाँधकर रखेगा।

साधक के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता परम आवश्यक है। इस बारे में किसी को कोई गलतफ़हमी न रहे। जो रोटी के लिए भी परतंत्र है, वो आत्मिक तौर पर स्वतंत्र नहीं हो सकता।

और इसका मतलब ये नहीं है, फिर दोहरा रहा हूँ, कि तुम्हें लाखों-करोड़ों कमाने चाहिए। पर कम-से-कम इतना कमाओ कि कोई तुम्हारी साधना में व्यवधान न डाल सके, जगत की कोई ताक़त तुमसे आकर ये न कह सके कि हमारा खाते हो तो हमारे अनुसार जिओ।

ये बड़ा रूमानी सपना रहता है कि, "हम संन्यासी हो जाएँगे, और जैसे बुद्ध के चेले थे, बोलेंगे, 'भिक्षाम देहि', और द्वार से सुंदरी प्रकट होगी पात्र लेकर के, दाल-चावल, और हमारी अंजुली में डाल देगी, और हम बिल्कुल नयन नीचे करे, मुक्त पुरुष की तरह खड़े रहेंगे।" बेटा, वो घर तो अब होते नहीं। अब तो सोसाइटी हैं, और वहाँ गार्ड (चौकीदार) हैं बाहर। वहाँ बोलोगे, "भिक्षाम देहि", बहुत मारेगा!

तो कमाना सीखो।

पहले की बात दूसरी थी—खेत थे, उपवन थे, बाग थे—किसी को कुछ नहीं मिला तो फल-फूल पर ही निर्वाह कर सकता था। तुम बताना, यहाँ कहाँ तुम्हें आम और लीची के भरे हुए वृक्ष मिल रहे हैं, कि भिक्षा नहीं मिली तो कोई बात नहीं, आज एक आम ही सही? एक बढ़िया आम कितने रुपए का आता है? अब तो आम बाज़ार में ही मिलेगा। और बाग में मिलेगा तो उसके आसपास कुत्ते घूम रहे होते हैं। वो गिरा हुआ आम भी किसी दूसरे जानवर को न खाने दें, पेड़ वाला आम तो छोड़ दो! किसान अपने फलों पर रसायन मल के रखते हैं कि चिड़िया भी उसको न खाए, नहीं तो तोते वगैरह आकर के चोट मारते हैं तो किसान उसपर मल देते हैं चीज़ें। और भी अगर बड़ा और मूल्यवान फल होता है तो उसको बाँध देते हैं। अब वो ज़माना थोड़े ही है कि संन्यासी होकर निकले तो—गंगा का किनारा और फलदार वृक्ष, और चाहिए ही क्या? जाओ ऋषिकेश, गंगा के किनारे लेटो, पुलिसवाला दो डंडा लगाएगा। जाओ लेट के दिखाओ।

तो कमाओ!

भारत के सपूतों, मुक्ति की बात बाद में करना, पहले कमाओ!

प्रश्नकर्ता (प्र ३): आचार्य जी, सरकारी नौकरी में भी कुछ नौकरी ऐसी रहती हैं कि न जाएँ महीने भर ऑफिस और तनख़्वाह आ रही है। तो वो आदमी क्या करे?

अन्य प्रश्नकर्ता: इसी के ख़्वाब में तो सभी हैं...

प्रश्नकर्ता (प्र ३): यह बहुत ख़राब ख़्वाब है। जो लोग इस स्थिति में हैं कि तनख़्वाह आ जाती है, और लगता है कि पैसा तो आ ही जाता है महीने का, वो बिल्कुल अकर्मण्य हो गए हैं। और अकर्मण्य हो गए, तब भी पैसा आ रहा है। वो लोग कैसे अपने जीवन को दिशा दें?

आचार्य प्रशांत: उनके जीवन का तो बड़ा अनुपम उद्देश्य है। उनके जीवन को देखकर के हज़ारों लोगों को चेतावनी मिलनी चाहिए कि ऐसा नहीं हो जाना है। वो तो अंधेरे में लाइट हाउस (प्रकाश स्तम्भ) हैं, कि इनको देखो और ऐसा बिल्कुल नहीं होना है। इनको गौर से देखो कि ये कैसे हैं; कुछ नहीं करते और फिर भी महीने के अंत में बैंक में पैसा आ जाता है।

मर जाना पर ऐसे मत हो जाना; भूखे मर जाना पर मुफ़्त की रोटी मत खाना!

ये बात अच्छे से समझ लो। मेहनत ज़्यादा करो और कम फल मिले, चलेगा, कि बहुत मेहनत करते हैं, पैसा थोड़ा-सा मिलता है; चलेगा। पर मेहनत इतनी-सी कर रहे हो और पा इतना (ज़्यादा) रहे हो, ये बिल्कुल नहीं ठीक है। ये तुम्हें बर्बाद कर देगा। और ऐसी चीज़ों के बड़े घातक दुष्परिणाम देखने पड़ते हैं।

जहाँ कहीं भी अनर्जित धन होता है, वेल्थ विदाउट वर्क (बिना काम के धन), वहाँ बड़ी बीमारियाँ फैलती हैं। सबसे पहले तो उस घर के बच्चे बर्बाद होते हैं। जहाँ कहीं भी अनअर्नड (बिना मेहनत का धन), इल्ल गोटन (ग़लत तरीक़ों से कमाया गया), या तो ऐसी तनख़्वाह आ रही है जिसके लिए तुमने मेहनत नहीं करी या ऊपरी कमाई, घूस, रिश्वत, काला धन इत्यादि आ रहा है, उस घर में बड़ा नर्क उतरता है। मैंने कहा सबसे पहले तो ऐसे घरों के बच्चे बर्बाद होते हैं। घर में हर तरह का कलह-क्लेश फैलता है। वो भले ही ये सोचते रहें कि, "देखो, हम कितने चालाक हैं, हम कुछ करते नहीं और फिर भी इतना सारा पैसा आ जाता है," उनको पता ही नहीं है कि उनकी चालाकी कितनी बड़ी मूर्खता है। उन्हें नहीं पता कि उनकी चालाकी कितनी भारी पड़ रही है उनको।

उन्हें पता ही होता तो वो ये चालाकी करते ही क्यों?

प्रश्नकर्ता (प्र ३): उनको तो ये लगता है कि चालाकी न करें तो मूर्ख हैं। और जो कर रहे हैं, लगता है कि वही होशियार हैं।

आचार्य प्रशांत: और वो लोग जो बीच के बिच्छू हैं, फेंस सिटर्स (बाड़ पर बैठे हुए)) हैं, वो ऐसों को देखकर अक्सर प्रभावित हो जाते हैं, और कहते हैं, "ऐसा ही जीवन हमें भी चाहिए। करना कुछ नहीं है और माल पूरा है।" तो ऐसे कुछ लोग पूरे समाज के लिए बड़ा रुग्ण उदाहरण बनते हैं। मोहल्ले में अगर ऐसा एक हो, तो पूरा मोहल्ला तबाह हो जाता है।

संतों ने समझाया है, जिस रोटी पर तुम्हारा हक़ है, उसको भले छोड़ दो। छोड़ दो! कभी ऐसी नौबत आ जाए कि किसी को देनी पड़े, दे दो। कभी ऐसी नौबत आ जाए कि कोई तुम्हें ठग गया, सहर्ष ठगे जाओ, छोड़ दो! लेकिन ये कभी मत करना कि जिस रोटी पर तुम्हारा हक़ नहीं, उसको तुमने खा लिया।

कहानी सुनी है न: एक फ़क़ीर के सामने रोटी लाई गई थी, एक धनाढ्य सेठ के द्वारा। बोला, "नहीं खाऊँगा"। सेठ बोला, "क्या बात है? क्या बात है?” तो कहानी कहती है कि उसने (फ़क़ीर ने) रोटी ली और यूँ निचोड़ दिया। उसमें से ख़ून गिरा।

उस रोटी में ख़ून है! और मैं नहीं कह रहा हूँ कि तुमने दूसरे का हक़ मारा क्योंकि ये बात तुम्हें कभी समझ में नहीं आएगी कि जो रोटी तुम मुफ़्त की पा रहे हो, वो तुमने किसी का हक़ मारा है। अर्थव्यवस्था भी इतनी जटिल हो गई है कि हमें साफ़-साफ़ दिखाई नहीं देता कि हमारे पास जो आ रहा है वो किसी दूसरे का है। पुराने समय में बात सीधी होती थी। पुराने समय में दिख जाता था कि तुमने किसी की पोटली छीन ली, तो ये बात निर्विवाद होती थी कि तुमने किसी का हक़ मारा है।

आज मान लो तुम करते हो कोई नौकरी, मान लो सरकारी नौकरी, और तुम मुफ़्त की खा रहे हो, काम नहीं करते, तनख़्वाह लिए जा रहे हो, तो तुम्हें ये साफ़-साफ़ नहीं दिखाई पड़ता कि तुम्हारी रोटी में ख़ून है। जब तुम किसी से रोटी छीनते हो तो तुम्हें दिखता है न कि देखो मैंने इस आदमी की रोटी छीन ली, तो साफ़ हो जाता है कि वो आदमी था मैंने उसका पैसा छीना, तो मैंने पाप किया। आज तुम बिना कुछ करे अगर तनख्वाह उठाते हो, तो तुम्हें उस टैक्सपेयर, उस करदाता का चेहरा पता थोड़े ही है जिसके दिए हुए टैक्स से तुम्हारी तनख़्वाह आई थी, पर उस करदाता का ख़ून है तुम्हारी रोटी में, अगर तुमने बिना मेहनत करे तनख़्वाह उठाई है।

आज पाप इसीलिए आसान हो गया है क्योंकि कुछ दिखाई नहीं देता। पहले तुम्हें किसी को मारना होता था तो बंदूक थी, तलवार थी, गर्दन कटती थी, तो दिखाई देता था कि ख़ून बहा। आज तो हत्या बटन दबाकर होती है न! अमेरिका में बैठकर बटन दबाओ, दस हज़ार किलोमीटर दूर बैठा कोई उड़ जाएगा। पता ही नहीं चलता कि हमने मार दिया, एहसास ही नहीं होता कि हमने पाप करा है।

पहले पशु का वध करते थे तो अपने सामने करते थे, दिखता था कि वो देखो अब उसकी आँखों से प्राण जा रहे हैं, तड़प रहा है, मर रहा है। अब तो डब्बा-बंद मीट आता है, ऑनलाइन ऑर्डर करो, कंप्यूटर पर ऑर्डर करा और डब्बे में मीट घर पर आ जाएगा, तो पता ही नहीं चलेगा कि पाप हुआ। इसी तरीक़े से जब तुम तनख़्वाह ले लेते हो और तुमने मेहनत नहीं करी होती है, तो तुम्हें पता नहीं चलता कि ये तुमने पाप करा है, ये तुमने किसी का हक़ मारा है। तुम्हारी रोटी में ख़ून है!

भई, वो जो तुम्हारे घर में तनख़्वाह आई है, वो पैसा कहीं से तो आया होगा न? सरकार ख़ुद तो पैसे बनाती नहीं। सरकार तो इतना ही करती है कि इधर का पैसा इधर; किसी से टैक्स लिया और उस टैक्स से किसी को तनख़्वाह दे दी। सरकार तो यही करती है। तो तुम्हारे पास जो पैसा आया है तुम्हारे घर में, वो किसी के गाढ़े- ख़ून पसीने की कमाई से आया है, जो तुम मुफ़्त घर ले गए। पाप तो लगेगा न! अंजाम तो भोगना पड़ेगा! और अंजाम भोगते ही हैं।

ये जो बड़े प्रख्यात, भ्रष्ट अधिकारी होते हैं, ख्यातिमान, जिनका पता ही है सार्वजनिक तौर पर कि इनके हाथ में ज़बरदस्त खुजली है, इनके घर जाकर देखो, नब्बे-पिच्यान्वे प्रतिशत यही पाओगे कि घर तबाह है।

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