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लेख
आत्मा तुम्हारी नियति है और गुरु उसका प्रदर्शक || आचार्य प्रशांत, गुरु नानक पर (2014)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।

~ नितनेम (अनंदु साहिब)

बाइ गुरुज़ ग्रेस द लॉर्ड अबाइड्स विदिन द माइंड, एंड वंस प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी इज़ फ़ुलफ़िल्ड।

“गुरु के अनुग्रह से ईश्वर मन में बसता है, और व्यक्ति पूर्वनिर्धारित नियति को प्राप्त कर लेता है।”

प्रश्नकर्ता: ग्रेस (अनुग्रह) और प्री-ऑर्डेंड डेस्टिनी (पूर्वनिर्धारित भाग्य) एक साथ कैसे?

आचार्य प्रशांत: “गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।” बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं।

श्रोता: प्री-ऑर्डेंड क्या है?

आचार्य: प्री-डेस्टिन्ड, प्री-फ़िक्स्ड, प्री-डिटरमिन्ड — पूर्वनिर्धारित। “पूरबि लिखिआ” — जो पहले से लिखा हुआ है।

श्रोता: जैसे आपने पहले ही बोला था कि मनुष्य का जन्म इसलिए होता है कि वो ब्राह्मण बन जाए।

आचार्य: हाँ, ब्रह्म को जान सके।

श्रोता: ब्रह्म को जान सके। प्री-डेस्टिन्ड मतलब ब्रह्म को जानोगे?

आचार्य: बस, पकड़ लिया। बहुत बढ़िया! बहुत बढ़िया! “गुर परसादी हरि मंनि वसिआ।” एक-एक शब्द क़ीमती है, एक-एक शब्द पर ध्यान देंगे। “गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।” ‘गुरु’ यात्रा पर ले चलने वाली शक्ति है, गुरु अन्तर्गमन की यात्रा को प्रेरित करने वाली शक्ति है। अन्तर्गमन मन करेगा नहीं, क्योंकि मन लालची है और मन उसी दिशा में जाता है जिस दिशा में उसे कुछ आकर्षित कर रहा हो, जिस दिशा में उसे कुछ लाभ दिखाई देता हो।

गुरु की शक्ति निहित ही इसमें है कि वो दिखा देता है कि जिन दिशाओं में तुम जा रहे हो, उनमें तुम्हारा कोई लाभ नहीं। ये पहला काम होता है जो गुरु को करना होता है कि वो तुम्हें दिखा देता है कि जिन अन्धी दौड़ों को तुम दौड़ रहे हो, उनमें तुम्हें सिर्फ़ कष्ट मिलना है और मिल रहा है।

इतना काफ़ी नहीं होता — बाहर की दौड़ रुक जाए तो एक सूनापन आ जाता है मन में, एक खालीपन — क्योंकि मन तो चाहता है कुछ करना, मन की बेचैनी तो क़ायम है और दौड़ रुक भी गयी तो देर-सवेर वो कोई दूसरी दौड़ पकड़ लेगा।

उसे तो दौड़ना है, दौड़ने में ही उसका होना है। कितना भी उसे दिखा दो कि तुम्हारी दौड़ें अन्धी हैं कि तुम्हारे ठिकाने झूठे हैं कि तुम्हारे लक्ष्य मूढ़ता के हैं कि तुम्हारे रास्ते काँटों से भरे हैं, वो (मन) फिर भी उन्हीं पर चलेगा जब तक तुम उसे कोई नयी राह और कोई नयी मंज़िल न दिखा दो।

क्योंकि मन सिर्फ़ चलना जानता है, मन का अर्थ ही है वो जो निरन्तर चलायमान है। मन की मृत्यु है रुक जाने में — मृत्यु उसे स्वीकार नहीं, उसे तो चलना है। जिन दिशाओं में वो चल रहा है, उन दिशाओं को तो तुम झूठा स्थापितसाबित कर दोगे, मन को ये एहसास भी करा दोगे कि सिर्फ़ कष्ट ही मिल रहा है और तुम सोचोगे कि शायद काम हो गया कि बोध उतर आया।

न! तुम्हें अचम्भा होगा कि कुछ समय बाद उन्हीं राहों पर मन दोबारा चलने लग जाएगा। तुम उससे पूछोगे कि तू ये क्या कर रहा है, जब मैं पिछली दफ़ा तुझसे मिला था तो तुझे खूब स्पष्ट हो गया था कि ये रास्ते तो अन्धे रास्ते हैं, इतना स्पष्ट होने के बाद भी तू इन पर चल रहा है! मन कहेगा, ‘क्या करूँ? ऐसा ही हूँ, मुझे तो चलना है! वही मेरी प्रकृति है।’

इसीलिए शिवसूत्र में वशुगुप्त हैं, उन्होंने गुरु की सबसे संक्षिप्त और सबसे सारगर्भित परिभाषा दी है। क्या? कि गुरु उपाय है। गुरु कौन? जो उपाय जानता है। गुरु वो जो जानता है मन के तरीक़ों को और इसी वजह से मन की यात्रा की दिशा बदल सकता है — जो बहिर्गमन की यात्रा थी उसे अन्तर्गमन की यात्रा में तब्दील कर सकता है — यात्रा तो रहेगी, मन का मतलब ही है चलते जाना।

जब कहते हैं उपनिषद् कि “चरैवेति-चरैवेति”, तो वो और किसी से नहीं, वो मन से ही कहते हैं कि बेटा तुम तो चलो! गुरु वो जो उस चलने को सीध दे सके, जो मन के भटकने को दिशा दे सके। मन तो चलेगा, मन के चलने का नाम ही जीवन है, मन के चलने का नाम ही विचार है और कर्म है, वो (मन) क्षण भर को भी नहीं रुकेगा।

गुरु वो जो मन को बता सके कि न सिर्फ़ बाहर सब झूठा है बल्कि कुछ सच्चा भी है जो तेरे ही भीतर विराजमान है। याद रखना सिर्फ़ “नेति-नेति” से काम नहीं चलता, ‘जग झूठा’ — ये कहने भर से काम नहीं चलेगा; “ब्रह्म सत्य है” — ये भी प्रतिष्ठापित करना पड़ेगा। जो इतने पर रुक गया कि सब झूठा, सब झूठा, वो सिर्फ़ बेचैनी को जन्म देगा। ‘सब झूठा, सब झूठा तो जियें क्यों? फिर जीने में क्या रखा है? जीवन भी झूठा, यदि सब झूठा!’

यदि सब झूठा तो एक झूठी दुनिया में झूठा जीवन जीना ही क्यों? जीने के लिए तो कुछ प्यारा, कुछ सच्चा, कुछ खूबसूरत होना चाहिए, तभी जीने में मज़ा है।

गुरु वो जो उस सच्चे को, उस सौन्दर्यपूर्ण को तुम्हें दिखा सके, एक झलक दे सके कि तुम्हारे मन में जो लगातार संसार-संसार ही सुन्दर प्रतीत होता है — उसकी जगह गुरु हरि की एक सुन्दर प्रतिमा बैठा दे — न सिर्फ़ इतना करे कि संसार नकली है बल्कि ये भी दिखा दे कि सत्य बहुत सुन्दर है और प्राप्य भी है, मिल भी सकता है — तुम क़दम बढ़ाओ, मिलेगा!

कहा जा रहा है, “गुर परसादी हरि मंनि वसिआ।” गुरु का प्रसाद ही यही है कि उसने मेरे मन में हरि को बैठा दिया। गुरु के प्रसाद से हरि मेरे मन में बैठ गया है — जिस मन में दुनिया भर का कूड़ा-कचरा बैठा रहता था, दुनिया भर की और झंझटें बैठी रहती थीं — जिस मन में संसार की और संसार के तरीक़ों की बड़ी क़ीमत थी, उस मन ने अब हरि को क़ीमत देना शुरू कर दिया है। और सन्त ने बड़ा सुन्दर शब्द चुना है ‘हरि’। गुरु वो जो हरने वाले को तुम्हारे भीतर बैठा दे — बाक़ी सबकुछ हर लिया, बस हरि को छोड़ दिया — हरि का अर्थ ही वही है जो हर ले, हरण कर ले।

गुरु सबकुछ हर लेता है, बस हरि को छोड़ देता है, वही रह जाता है भीतर। और फिर तुम्हें समझ में आता है कि उससे ज़्यादा प्यारा, उससे ज़्यादा आकर्षक और कुछ नहीं। तुम कहाँ ये भीड़ में भटक रहे थे, कहाँ इधर-उधर खोजते फिर रहे थे! घर-घर भीख माँगते थे, दुकान-दुकान तलाशते थे, जो ही चेहरा मिल जाता था उसी चेहरे में खोजते थे कि कहीं यही तो नहीं है, जिसकी मुझे तलाश है!

होता है कि नहीं होता है हमारे साथ? कोई भी अनजाना चेहरा आता है, मन एक क्षण को तलाशता है कि कहीं तुम वही तो नहीं। जवान लोगों के साथ ही नहीं, सबके साथ यही होता है — क्षण भर को आँखें तलाशती हैं, बहुत छोटा सा क्षण होता है वो — ध्यान देंगे तो ही पकड़ पाएँगे। क्योंकि सूनापन है ही न भीतर? भिखारी हैं, तलाश रहे हैं।

गुरु वो जो बता दे कि ग़लत जगह तलाश रहे हो, वहाँ नहीं मिलेगा! गुरु वो जो तुम्हारे सारे बहानों को और सारे झूठों को हर ले। तुम्हारे सारे झूठ ख़त्म कर दिये, कोई बहाना अब चलता ही नहीं। सारे झूठ ख़त्म कर दिये और सत्य का आश्वासन बनकर स्वयं तुम्हारे सामने खड़ा हो गया कि देखो! सत्य सम्भव है और प्रमाण हूँ मैं — अगर मैं हो सकता हूँ तो तुम क्यों नहीं हो सकते? मेरा होना गवाही है! मुझे मिला है तो तुम्हें क्यों नहीं मिलेगा, हम दोनों एक हैं — जो मेरा स्वभाव है, वही तुम्हारा स्वभाव है और देखो मुझे — तुम्हें तुम्हारे स्वभाव की याद आएगी।

गुरु का प्रसाद ही यही है कि वो मन में बस एक सुन्दर मूर्ति को स्थापित कर देता है, बाक़ी सब हटा देता है।

“गुर परसादी हरि मंनि वसिआ पूरबि लिखिआ पाइआ।।”

यही तो नियति है तुम्हारी और कौनसी नियति है? समय की नियति ही यही है कि वो रुक जाए। संसार की नियति ही यही है कि वो मिट जाए। तुम हो ही इसीलिए कि घुल जाओ। “पूरबि लिखिआ पाइआ।” जो होना ही था, गुरु वही कराने के लिए आता है — कुछ नया नहीं, जो तुम्हारा स्वभाव ही है, वही तुम्हें देने के लिए आता है — कुछ बाहरी नहीं।

“पूरबि लिखिआ पाइआ।” हरि को पाना ही तुम्हारी तक़दीर है तुम उससे बचकर भाग सकते नहीं। कहाँ जाओगे? गुरु इस रूप में नहीं तो उस रूप में मिल जाएगा! परम स्वयं गुरु बनकर आता है, बहुरूपिया है। एक शरीर से, एक पुस्तक से, एक वस्तु से भागोगे, किसी और रूप में आ जाएगा, कहीं और पकड़ लेगा। पर तक़दीर से कोई भाग सका है आज तक?

उस दिन अभिषेक (स्वयंसेवक) गा रहा था — “उससे मिलना ही मेरी ज़िन्दगी का मक़सद है, वो अगर मिलता है मरकर, तो मर जाने दो! उससे मिलना ही मेरी ज़िन्दगी का मक़सद है।” इसके अलावा कोई मक़सद है नहीं — और मक़सद भी छोटा शब्द है क्योंकि मक़सद तुम्हारा होता है, यहाँ तो बात नियति की है — तुम मक़सद न भी बनाओ तो भी होकर रहेगा। तुम न बनाओ मक़सद, तुम कह दो, ‘मुझे नहीं चाहिए’ — कुछ साल पहले जब मैं बोलता था तो कुन्दन (स्वयंसेवक) ने कहा था, ‘मुझे चाहिए ही नहीं, आप ज़बरदस्ती मेरा निर्वाण करा रहे हैं!’ बीज की नियति है मिट जाना। कैसे मिटता है वो? पेड़ बनकर पल्लवित होता है और फिर पुष्पित हो जाता है, ऐसे मिटता है।

तुम्हें चाहिए हो कि न चाहिए हो ये तो मिलेगा, ज़बरदस्ती ही है। तक़दीर से बड़ी ज़बरदस्ती कोई होती है? क़िस्मत ही ऐसी लिखाकर आये हो, क्या हो सकता है!

“पूरबि लिखिआ पाइआ।” अरे! कह रहे हैं कि पहले से लिखा हुआ है, किसी और ने नहीं लिखा। “पूरबि लिखिआ पाइआ।” जो लिखा हुआ था वही हो रहा है। और कुछ नहीं लिखा हुआ है। ठीक? क्या रास्ते होंगे? तुम चुनो! कब पहुँचना है? तुम्हारी मर्ज़ी! किस वाहन पर बैठकर पहुँचना है? तुम जानो! अकेले आना है या दो-चार को बाँधकर लाना है? तुम चुनो! हँसी-ख़ुशी पहुँचना है या घुट-घुटकर घसीटते हुए तुम्हें लाया जाए? तुम बता दो! लेकिन एक बात पक्की है, जाना वहीं है बाक़ी सब तुम चुन लो, पूरी छूट है!

श्रोता: क्या जो हमारे साथ हो रहा है वही हमारी नियति है?

आचार्य: न! ये तो तुम्हारा कर्मफल है, ये तो चुनाव है तुम्हारा — नियति तो सिर्फ़ एक है — मिट जाना। ऐसा होता है, एक बार तुम्हारे ही जैसे किसी को कुछ कबीले पकड़ लेते हैं। तो वो उससे पूछते हैं कि तुझे मार दें! अब सबको पता है कि मरना क्या है, हमारी तक़दीर है, मर ही जाना है, पर मरने से सब डरते हैं — तो बोलता है, ‘नहीं, मारना नहीं, मारना नहीं।’ तो बोलते है, ‘अगर मारेंगे नहीं, तो तेरा झींगा लाला करेंगे।’ तो पूछते हैं, ‘मरना पसन्द है या झींगा लाला?’ वो चालाकी दिखाता है, कहता है, ‘मरने से तो बचूँगा!’ कहता है, ‘झींगा लाला।’ तो कबीलों का सरदार कहता है, ‘ठीक है, झींगा लाला टिल डेथ (मरने तक)।’ (श्रोतागण हँसते हैं)

मरना तो है ही, या तो सीधे मर लो, नहीं तो झींगा लाला करा-कराकर मरोगे! (श्रोतागण हँसते हैं)

समझ में आ रही है बात?

“पूरबि लिखिआ पाइआ।” सन्त में और खल में अन्तर इतना ही है कि सन्त जान गया है कि उसकी नियति क्या है और वो हँसकर के शहीद होता है। वो कह रहा है, ‘तू बुला रहा है, मुझे आना तो तेरे ही पास है और जाऊँगा कहाॅं!’ और जो खल मन होता है वो सौ तिकड़में लगाता है, वो बचना चाहता है। वो कहता है, ‘नहीं मरना है, नहीं; ‘बचना है!’ ये कर लूँगा, वो कर लूँगा।’ दायें भागेगा, बायें भागेगा, छुपेगा कहीं, बहाने बनाएगा, होशियारी दिखाएगा। वो सब से होगा क्या? क्या बच पाएगा? न! झींगा लाला टिल डेथ।

गुरु वही जो तुम्हें समझा दे कि क्यों झींगा लाला कराते हो, सीधे-सीधे गुज़र जाओ! जस्ट पास अवे पीसफ़ुली। जो तुम्हारी नियति है उसके सौन्दर्य को देखो! उसमें कष्ट नहीं है, उसमें प्रेम है। जो तुम्हें बुला रहा है, उससे डरते क्यों हो, ख़ौफ़ क्या खाते हो? वो प्रेम की पुकार है।

तुम्हारा सुनना विकृत हो गया है कि कोई प्रेम से भी बुलाता है तो तुम काँपने लगते हो। वो तो प्यार से बुला रहा है और तुम्हें कभी-न-कभी उसके प्यार को स्वीकारना पड़ेगा ही, जितने दिन नहीं स्वीकारोगे उतने दिन तुम ही तड़पोगे! तो आज ही क्यों नहीं स्वीकार लेते? अभी क्यों नहीं?

उसके आमंत्रण को अस्वीकार करके तुम अपनी ही वेदना को बढ़ाते जा रहे हो, प्रोलॉन्ग कर रहे हो। कि जैसे प्यासे के सामने सागर हो और वो ख़ौफ़ में खड़ा हो कि पता नहीं क्या है, ज़हर है! जब तक नहीं पियोगे, तुम ही तड़पोगे। और तुम्हारे न पीने की वजह तुम्हारी अपनी दुर्बुद्धि है और कुछ नहीं, ध्यान का अभाव! ठीक से देख नहीं रहे।

“गुर परसादी हरि मन वसिआ।” गुरु प्रसाद देने को उत्सुक है, तुम प्रसाद से भाग रहे हो, तुम्हें लग रहा है प्रसाद में ज़हर मिला हुआ है।

“नदी किनारे मैं खड़ी, ज्यों जल मैला होय। मैं मैलि पिया उजरे, मिलन कहाँ से होय।।”

~ कबीर साहब

नदी बह रही है सामने और तुम खड़े होकर के शक की निगाह से, चेहरे पर हज़ार तरीक़े की शंकाएँ लिये हुए पानी को देख रहे हो। ‘बड़ा गन्दा पानी है!’ पहाड़ी नदी, साफ़ निर्मल! “नदी किनारे मैं खड़ी, ज्यों जल मैला होय। मैं मैलि पिया उजरे, मिलन कहाँ से होय।।”

तुम्हारी दुर्बुद्धि है! पानी तो पीना पड़ेगा, नदी के पास तो जाना पड़ेगा, एक ही हो जाना पड़ेगा। जितनी देर करोगे उतने प्यासे मरोगे। क्यों होशियारी? क्यों चालाकी? ध्यान दोगे तो शान्त समर्पण आसान हो जाएगा।

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