आचार्य प्रशांत आपके बेहतर भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं
लेख
अर्जुन की निरपेक्षता || (2020)
Author Acharya Prashant
आचार्य प्रशांत
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अथ व्यवटस्थतान्दृष्टवा धातकराष्ट्रान्कटपध्वजः | प्रवृत्तेशस्त्रसम्पातेधनुरुद्यम्य पाण्डवः | हृषीकेशंतदा वाक्यटमदमाह महीपते || १, २० ||

सेनयोरुभयोमकध्येरथंस्थाप्य मेऽच्श्यतु | यावदेताटन्निरक्षेऽहंयोद्धुकामानवटस्थतान् || १, २१||

हे राजन! इसके बाद कपिध्वज ने मोर्चा बाँधकर डटे हुए धृतराष्ट्र-सम्बन्धियों को देखकर, उस शस्त्र चलने की तैयारी के समय धनुष उठाकर हृषिकेश श्रीकृष्ण महाराज से यह वचन कहा – हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक २०-२१

कै मकया सह योद्धव्यमटस्मन्रणसमुद्यमे|| १, २२ ||

और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध व्यापार में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए। —श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १, श्लोक २२

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। आज जब इसका स्वाध्याय कर रहे थे तो श्लोक संख्या २० में अर्जुन को ‘कपिध्वज’ विशेषण से पुकारा गया है। और पहले ही अध्याय के श्लोक २२ में अर्जुन कहते हैं कि दोनों सेनाओं के बीच में रथ खड़ा कीजिए जिससे मैं दोनों सेनाओं का निरीक्षण कर सकूँ। उस श्लोक में कहते हैं कि "...इस युद्ध रूप व्यापार में मुझे किन-किनके साथ युद्ध करना योग्य है, तब तक उसे खड़ा रखिए।" तो युद्ध का व्यापार और कपिध्वज का क्या आशय है?

आचार्य प्रशांत: कपिध्वज तो इसलिए क्योंकि उनके ध्वज में वानर प्रतीक था। इसी बात को लोकमान्यता में ऐसे कहा जाता है कि अर्जुन के रथ पर हनुमान रहते थे, रक्षा करते थे। तो इस आशय से कहा कपिध्वज।

दूसरी बात आपने पूछी, युद्ध का व्यापार। व्यापार माने कामकाज, कारोबार। जो सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हुई हैं, उनका और क्या कामकाज है? युद्ध ही तो। तो इस अर्थ में व्यापार। तीर दिए जाएँगे, तीर लिए जाएँगे, घावों का आदान-प्रदान होगा, फ़िर पता चलेगा किसी को मुनाफा, किसी को नुकसान हुआ। व्यापार, और क्या पूछा?

प्र१ "दोनों सेनाओं के बीच में मुझे खड़ा कर दीजिए जिससे मैं निरीक्षण कर सकूँ।" तो ये निरीक्षण वही तो नहीं है, आचार्य जी, जिसको आप बार-बार अपनी वृत्तियों का निरीक्षण करने के लिए कह रहे हैं, बाहर और अंदर?

आचार्य: इतनी गहरी अर्जुन की मंशा थी या नहीं, इसमें तो संशय है। लेकिन हाँ, जो भी कोई कह रहा है कि 'मैं देखना चाहता हूँ, और मध्य में खड़ा करिएगा ताकि किसी एक पक्ष विशेष की ओर से ना देखूँ, पक्षपाती होकर ना देखूँ; एक निरपेक्ष बिंदु से दोनों सेनाओं का अवलोकन कर पाऊँ', बड़ी बात है।

युद्ध, जहाँ आपकी पक्ष लेने की वृत्ति होती है, वो और प्रबल और सघन हो जाती है। वहाँ किसी का कह पाना कि मुझे किसी मध्यम स्थान पर, किसी निष्पक्ष जगह पर ले चलो जहाँ मेरा किसी से तादात्म्य ना हो, जहाँ से मैं कौरवों को भी वैसे ही देख सकूँ जैसे पांडवों को, बड़ी बात है।

सामान्य स्थितियों में भी व्यक्ति के लिए धारणा शून्य होकर, पक्ष निरपेक्ष होकर कुछ भी देखना बड़ा मुश्किल होता है। और अर्जुन जिस स्थिति में है, वो तो नि:संदेह असाधारण है। वास्तव में अर्जुन ने ये प्रार्थना ना की होती तो श्रीकृष्ण का अर्जुन को गीता कह पाना बड़ा मुश्किल होता।

मेरी दृष्टि में गीता की शुरुआत ही होती है अर्जुन की इस अद्भुत याचिका से। कौन सा योद्धा अपने सारथी को शंख फूँकने से ठीक पहले यह कहता है कि, "ले चलो मेरे रथ को ऐसी जगह पर जहाँ से मुझे दोनों सेनाएँ साफ़-साफ़ दिखाई दें। मैं एक ओर का हो करके दूसरी ओर नहीं देखना चाहता, मैं कहीं का ना हो करके दोनों ओर देखना चाहता हूँ।"

गीता यहीं से शुरू होती है। अन्यथा इतने योद्धा थे, पांडव सभी प्रिय ही थे कृष्ण को और पांडवों में ही धर्मराज भी थे। धर्म की ही शिक्षा दी जानी थी तो धर्मराज को भी दी जा सकती थी। पर अर्जुन ने जो बात रखी, जो जिज्ञासा दिखाई, वो वास्तविक धर्म है। अर्जुन ने कहा, “सच्चाई जाननी है, किसी का होकर नहीं, सबसे विलग होकर, क्योंकि जुड़ा हुआ हूँ यदि किसी एक पक्ष से तो कुछ दिखाई नहीं देगा, मान्यताएँ, धारणाएँ, पक्षपात, यही हावी रहेंगे।”

देखा है, संघर्ष के, युद्ध के, लड़ाई-झगड़ों के क्षणों में प्रबल रूप से, सक्रिय रूप से, भीषण रूप से हम पक्षपाती हो जाते हैं? हमारी जितनी दलगत भावनाएँ, पक्षगत भावनाएँ होती हैं, हमारी सारी पेरोकियल (संकीर्ण) वृत्तियाँ, वो सारी युद्ध के, लड़ाई के क्षणों में अति सक्रिय हो जाती हैं।

आपके भाई से हो सकता है आपकी ना बनती हो, हो सकता है आपके और आपके भाई के बीच रोज़ कहासुनी होती हो, मारामारी भी हो जाती हो कभी-कभार, पर आपको पता चले कि भाई की मोहल्ले के किसी लड़के से, किसी व्यक्ति से लड़ाई हो गई है, आप तत्काल वहाँ पर भाई का पक्ष लेने पहुँच जाएँगे। घटनास्थल पर पहुँच कर आप जानना भी नहीं चाहेंगे कि ये जो रस्साकशी चल रही है, इसमें ग़लती किसकी है। आप वहाँ न्याय करने नहीं पहुँचे हैं, आप वहाँ अपनों का पक्ष लेने पहुँचे हैं। बल्कि वहाँ पहुँच करके ये प्रतीत भी हो कि ग़लती तो इसमें भाई की ही थी, तो भी पक्ष आप भाई का ही लेंगे।

तो ऐसे में अर्जुन ने जो इच्छा प्रदर्शित करी है, वो असाधारण है। मुश्किल होता है तनाव के क्षणों में, उत्तेजना के क्षणों में इतनी निष्पक्षता, इतना संयम दर्शा पाना। ठीक इसी जगह पर अर्जुन ने दिखा दिया, प्रमाणित कर दिया कि वो पात्र है गीता को सुनने का। इसलिए मैं कह रहा हूँ कि गीता की शुरुआत यहीं से होती है। हर व्यक्ति गीता के श्रवण का, सेवन का पात्र नहीं होता। अर्जुन प्रमाणित कर रहा है कि वो है।

प्र२: आचार्य जी, मेरा सवाल यह है कि जब वो मध्य में गए अपने रथ को लेकर, तो उन्होंने दूसरे तरफ ये देखा कि जिनसे वो लड़ने वाले हैं और जिनसे वो लड़ेंगे, वो सब उनके सगे-सम्बन्धी हैं, जानने वाले हैं और एक समय तक वो बहुत मानते भी थे उनको, इसीलिए उन्होंने लड़ने से मना कर दिया कि, "मैं इनके ख़िलाफ़ नहीं लड़ सकता हूँ। और पूरा राजपाट छोड़िए, अगर आप पूरे संसार की भी सत्ता देंगे तो मैं नहीं लेना चाहूँगा।"

तो मेरी सीमित दृष्टि से अर्जुन का विचार सही था क्योंकि वो नहीं लड़ेगा तो हिंसा नहीं होगी, और वो चाहता था कि वो चला जाए। तो एक तरफ श्रीकृष्ण तो सब जानते थे, सच जानते थे, दूसरी तरफ अर्जुन को भी वो मुक्त ही करना चाह रहे थे और उसे दिखाना चाह रहे थे सच को। लेकिन कहीं-न-कहीं वो उसको क्या और बंधन में नहीं बाँध रहे हैं हिंसा और लड़ाई-झगड़े में पड़वाकर?

बहुत से आध्यात्मिक गुरु कहते हैं कि अगर आप मुक्त होना चाहते हैं तो सबसे पहले आप हिंसा छोड़ो या उस तरीके के काम ना करो जिससे दूसरे लोगों को दुःख पहुँचता हो। तो इसके उलट श्रीकृष्ण अर्जुन को बँधनों में फँसा रहे हैं। वो तो भागना चाह रहा है, वो तो मुक्त होना चाह रहा है, कह रहा है कि, "मैं इनमें नहीं पड़ना चाह रहा हूँ, मैं जा रहा हूँ।" लेकिन श्रीकृष्ण रोकते हैं और उसको लड़ने के लिए कहते हैं। तो बँधकर कैसे आज़ाद होगा, लड़कर कैसे आज़ाद हो सकता है कोई?

आचार्य: बिना लड़े किसने आज़ादी पाई है?

प्र२: अगर वो चले जाते और पहाड़ों पर ध्यान करते तो बाकी चीज़ों से मुक्त हो जाते।

आचार्य: उसमें आज़ाद हो जाता? मुक्ति किसके ख़िलाफ़ पाई जाती है? मुक्ति का क्या अर्थ है? मुक्ति शब्द अर्थहीन है बिना बँधनों के। बँधन नहीं तो मुक्ति कैसी? तो कह रहे हो कि अर्जुन कहीं चला जाता, अकेले रहता, ध्यान करता तो मुक्ति मिल जाती। अर्जुन का बँधन क्या है?

श्रोतागण: मोह, आसक्ति।

आचार्य: तो ये लिए-लिए उसको मुक्ति मिल जाती? अगर उसका बँधन ही मोह है, तो ये बँधन लिए-लिए उसे मुक्ति मिल जाती? तो कैसी बातें कर रहे हो?

प्र२: आचार्य जी, हिंसा का क्या?

आचार्य: हिंसा माने क्या?

प्र२: वो लोगों को मारेंगे।

आचार्य: लोगों को मारना क्यों हिंसा है? किसने कह दिया कि हिंसा का अर्थ है किसी को मारना? ये सब हिंसा की सस्ती, प्रचलित और बाज़ारू परिभाषाएँ हैं, कि किसी ने किसी को मार दिया तो तुमने कह दिया हिंसा।

धर्म विरुद्ध जाना हिंसा है। अहम् के दायरे में रह करके अहम् के अनुसार ही कर्म करना हिंसा है।

कृष्णा अर्जुन से जो करवा रहे हैं, वो शुद्धतम अहिंसा है। पर दुर्भाग्य से होता यह है कि सूक्ष्मतम सिद्धांतों को हम स्थूल रूप में ले लेते हैं, क्योंकि हम स्थूल तलों पर ही जीते हैं न। शरीर के तल पर जीते हैं इसीलिए अध्यात्म की बातों को भी हम यूँ सुनते हैं जैसे वो शरीर के तल पर ही कही गई हों। तो अहिंसा का अर्थ हमने यही निकाल लिया कि किसी को मारो इत्यादि नहीं, यही अहिंसा है।

हिंसा शुरू ही तब हो जाती है जब तुम अपने-पराए का भेद करते हो।

और अहम् का काम ही यही है, एक छोटी सी सीमा रेखा में अपने-आप को रखना और बाकियों को पराया मानना। उस छोटी सीमा रेखा के अंदर कुछ दो-चार, पाँच-दस लोग होंगे, वो अपने हैं, बाकी पराए हैं।

जो दूसरे को मानकर दूसरे को मार दे, उसको तुम कह दोगे कि हिंसक है। और जो कुछ लोगों के अपने कुल को अपना माने, उसको क्या नहीं कहोगे कि हिंसक है? क्या तुम पूरी दुनिया को पराया मान सकते हो बिना मुट्ठीभर लोगों को अपना माने? पूरी दुनिया पराई क्यों लगती है? क्योंकि चंद लोग परिभाषित कर रखे हैं कि ये तो अपने हैं।

तो जहाँ तुमने किसी को अपना, किसी को पराया कहा, वहीं हिंसा शुरू हो गई न? अर्जुन क्या कह रहा है? “अरे, ताऊ है, वो चचा है, वो मामा है, वो भाई हैं, वो दादा हैं, वो परदादा हैं, वो गुरु हैं, और ये सब तो मेरे अपने हैं”, ये हिंसा है।

अहम् का काम ही यही है: अपने-पराए का भेद बाँटना।

अर्जुन क्या युद्ध से तब भी हटने को तैयार हो जाता यदि सामने जो लोग थे उनसे उसका कोई शारीरिक सम्बन्ध ना होता? सामने जो लोग थे, अगर वो यूँ ही कोई होते जिनसे अर्जुन का कोई लेना-देना नहीं, तो क्या तब भी अर्जुन कहता कि "युद्ध बेकार चीज़ है, मुझे जाने दो"? तो अर्जुन जो कर रहा है, वो पूरे तरीके से देह की बात हुई न? शरीर का रिश्ता है, खून का रिश्ता है इनसे। ये हिंसा है। देह के तल पर अपना-पराया बनाना, यही हिंसा है।

फ़िर तुम तर्क ही करना चाहते हो तो तर्क को आगे बढ़ा सकते हैं। तुम कह रहे हो कि इतने लोग मारे गए, युद्ध हुआ, बड़ा बुरा हुआ। और दुर्योधन के हाथ में राज्य चला जाता तो क्या होता? बड़ा अच्छा होता? यूँ ही तो नहीं कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जा रहा। कोई वजह है। एक ओर धर्म है, एक ओर अधर्म है।

छोटा-मोटा राज्य नहीं था हस्तिनापुर, उस समय का एक अग्रणी राज्य था। और हस्तिनापुर में जो होता था, वो पूरे भारत को प्रभावित करता था। महाभारत का युद्ध रोका जा सकता था। सम्यक तरीकों से उसे रोकने की कृष्ण ने पूरी कोशिश भी करी पर रुका नहीं। फ़िर भी रोक सकते थे, युद्ध से भागकर भी रोक सकते थे, कह सकते थे कि, "नहीं लड़ना, भाई!" उससे देशभर का कल्याण हो जाता?

पर जब मन छोटा है और जब मन दुर्बल होता है तो वो धर्म की बात नहीं करता है, वो बस यह कहता है, “अरे, देखो, किसी की देह की हानि ना हो।” अब देह की हानि बचा करके कितनी और तरह की हानियाँ करवा लीं, इसका विचार ही नहीं करना चाहते।

पृथ्वी पर जो कुछ भी होता है, द्वैत का ही खेल होता है माने तुलनात्मक रूप से ही होता है; एब्सोल्यूट (पूर्ण) तो यहाँ कुछ होता नहीं। तो पृथ्वी पर तो जो भी निर्णय लिए जाएँगे, तुलनात्मक रूप से ही लिए जाएँगे। तुम कहोगे अगर इधर का निर्णय लूँ तो ये होगा, उधर का निर्णय लूँ तो ये होगा। दोनों ही तरफ जाने में कुछ-न-कुछ कीमत अदा करनी पड़ेगी। तो फ़िर तुलना करके देखते हो कि किधर जाने में लाभ ज़्यादा है, हानि कम है।

बिलकुल ऐसा हो सकता था कि युद्ध रुकवा दिया जाता और जितने भी सैनिकों की, योद्धाओं की जानें गईं, वो बच जातीं। कुछ लाभ हो जाता। और हानि कितनी थी? पर हानि व्यापक तौर पर थी। हानि तत्काल नहीं दिखाई देती, हानि तत्काल होती भी नहीं। हानि समय ले करके होती, तो हम उस हानि की उपेक्षा कर देना चाहते हैं।

और आम इंसान की कहानी ही यही है। वो बहुत सारा नुकसान झेल लेता है, बस नुकसान तुरंत नहीं होना चाहिए। अपने जीवन को देखिए, यही ढर्रा मिलेगा। तुरंत यदि छोटा नुकसान भी हो रहा हो तो हम चिहुँक जाते हैं और धीरे-धीरे करके अगर बहुत बड़ा नुकसान भी हो तो हम कहते हैं, “कोई बात नहीं।” अर्थात हमें अपने नुकसान से मतलब नहीं है, मतलब हमें अपनी कमज़ोरी से है। हमारे पास वो सीना नहीं है जो एकमुश्त नुकसान झेल जाए।

हम कमज़ोर लोग हैं। हम कहते हैं, “धीरे-धीरे करके मेरा खून बहता रहे, कोई बात नहीं, पर एक बार में चिकित्सा करा लेने को मैं तैयार नहीं हूँ। सालों तक, शताब्दियों तक दर्द सहने को मैं तैयार हूँ, पर एक बार में यदि ऐसा इलाज मिलता हो जो दर्द तो देगा पर उपचार कर जाएगा, वैसे इलाज के लिए मैं तैयार नहीं हूँ।” ये हमारी कमज़ोरी का ही लक्षण है न?

“अरे, अरे, अरे, रक्तपात, मत करो। समझौता कर लो, समझौता कर लो।” और उस समझौते की कीमत क्या है, ये देखी? और ऐसा नहीं है कि कृष्ण रक्तपिपासु थे या युद्धोन्मत्त थे; युद्ध रोकने की पूरी कोशिश करी थी उन्होंने। अधिक-से-अधिक जितना झुका जा सकता था, झुके भी थे। दुर्योधन की सारी शर्तें मानने को तैयार थे कि ना हो लड़ाई, ना हो खून-खच्चर, अच्छा ही है। पर जब स्थिति यहाँ तक आ जाए कि दूसरा पक्ष अधर्म की सब सीमाएँ ही लाँघ रहा हो, पाँच गाँव भी माँगे जा रहे हों तो उतना भी देने को तैयार ना हो, तो फिर?

और युद्ध सिर्फ पाँच पांडवों के हित के लिए नहीं है। ये कौरवों और पांडवों का कोई आपसी, निजी मामला नहीं है। जो सम्राट बनेगा, वो लाखों, करोड़ों का भाग्य विधाता हो जाएगा। वो भारत का भविष्य निर्धारित करेगा, इसलिए महाभारत ज़रूरी है। अगर दुर्योधन का भारत नहीं चाहिए तो फ़िर महाभारत करनी पड़ेगी न?

नहीं तो फ़िर तुम्हारी तरह की अहिंसा कि अर्जुन तो अच्छा करता कि जा करके किसी गुफा में बैठकर ध्यान करता, उसे मुक्ति मिल जाती। कौन सी मुक्ति है, मैं पूछ रहा हूँ तुमसे, जो गुफा में ध्यान करने से मिली है? वो तो बहुत पीछे का भारत था, अभी जो आज का भारत था, उसको मुक्ति क्या बिना संघर्ष के मिल गई थी, बिना युद्ध के मिल गई थी?

ग़ुलामी के लिए कोई संघर्ष नहीं चाहिए। मुक्ति के लिए तो सदैव संघर्ष चाहिए ही होगा।

ये किन कल्पनाओं में हो कि इधर-उधर जाकर कहीं भाग गए, छुप गए तो मुक्ति मिल जाएगी? जिन्हें अपनी दासता बरक़रार रखनी हो, वो भले ही संघर्ष ना करें, पर जो मुक्ति के प्रार्थी हों, उनका संघर्ष के बिना कैसे काम चलेगा? उन्हें तो घोर संघर्ष करना पड़ेगा, भीतर भी और बाहर भी।

अर्जुन एक-एक तीर जो चला रहा है, वो कौरवों मात्र पर नहीं चला रहा है; अर्जुन का एक-एक तीर पुराने अर्जुन पर भी चल रहा है। हर तीर के साथ पुराना अर्जुन मिटता जा रहा है और एक नए अर्जुन का जन्म हो रहा है। पुराना अर्जुन कौन? पुराना अर्जुन वो जो पाण्डु पुत्र था; पुराना अर्जुन वो जो भीष्म के वंश का था; पुराना अर्जुन वो जो द्रोण का शिष्य था। नया अर्जुन कौन? जो सिर्फ कृष्ण का है। ये मुक्ति है—अर्जुन स्वयं से मुक्त हो रहा है एक-एक तीर के साथ। इसको कहते हैं मुक्ति। दूसरों को नहीं मार रहा अर्जुन; दूसरों से पहले स्वयं को मार रहा है।

आज पहला अध्याय पढ़ा आपने। पहले अध्याय का जो अर्जुन है, वो अट्ठारहवें अध्याय में कहीं मिलेगा? तो कहाँ गया पहले अध्याय का अर्जुन? कहाँ गया? अट्ठारवें अध्याय तक आते-आते पहले अध्याय का अर्जुन कहाँ गया? मर गया। किसने मारा उसे? अर्जुन ने ही मारा। ये मुक्ति है।

देह होकर देखोगे, स्थूल दृष्टि से देखोगे तो तुम्हें दिखाई पड़ेगा कि अर्जुन तो तीर चला रहा है दूसरों पर। वास्तव में अर्जुन तीर चला रहा है स्वयं पर। इस युद्ध को लड़ना अर्जुन की साधना भी है—वो अपने ही पूर्वग्रहों से, मोह से, बँधनों से मुक्त हुआ जा रहा है—ऐसे मिलती है मुक्ति।

जीव पैदा हुए हो, बेटा। लगातार कर्म तो करना ही है। एक कर्म है तीर चलाना, एक कर्म है भाग जाना। तुम कह रहे हो कि तीर चलाने से मुक्ति मिल गई भाग जाने से, अब भाग जाने से मुक्ति कैसे मिलेगी? कर्म तो तुमने दोनों ही दशाओं में किया ही न। तीर चलाना एक कर्म था और मैदान से भाग जाना भी एक कर्म होता। तीर चलाने से मुक्ति मिली भाग जाने से, और अब ये जो भाग जाने का कर्म है, इससे मुक्ति कैसे मिलेगी, बोलो?

एक कर्म करके दूसरे कर्म से मुक्ति नहीं पाई जाती। कर्म से मुक्ति धर्म ही दिलवाता है।

और कर्म से तुम पीछा छुड़ा नहीं सकते क्योंकि जीव हो। जीव चाहे, न चाहे, प्रतिपल कर्म तो कर ही रहा है। जब तक अहम् है, जब तक अहम् की केंद्रीय सत्ता है, तब तक जीव अपनी दृष्टि में कर्ता है और कर्म करेगा ही।

धर्म का अर्थ है: सही कर्म करना। इस बात की तो कोई गुंजाइश ही नहीं है, यह तो विकल्प उपलब्ध ही नहीं है कि तुम कर्म ना करो।

बुरी खबर है उनके लिए जो सोचते हैं कुछ ना करके बच जाएँगे। कुछ ना करने का विकल्प इंसान को उपलब्ध नहीं है, हर स्थिति में तुम्हें कुछ-न-कुछ करना तो पड़ेगा ही। तुम युद्ध छोड़कर भाग भी जाओ तो ये भी एक कर्म हुआ। अब प्रश्न यह है कि क्या ये कर्म धर्मोचित है?

धर्मोचित कौन सा है? जो अपने ख़िलाफ़ किया जाए। अन्यथा हमारे पुराने संस्कार, हमारे ढर्रे, यही हमसे कर्म करवाते रहते हैं, यही कर्ता बने रहते हैं और इन्हीं के हाथों का खिलौना बनकर जीव कर्म करता जाता है। इनके ख़िलाफ़ जाना ही धर्म है।

तो अर्जुन के भी पुराने संस्कार उससे कुछ करवा रहे हैं, और कृष्ण कह रहे हैं, “उनके ख़िलाफ़ जाओ – यही धर्म है।”

“अपनों को दुःख नहीं देना चाहिए”, ये तो तुम धृतराष्ट्र का सिद्धांत बता रहे हो। क्या मिल गया धृतराष्ट्र को तुम्हारे सिद्धांत पर चलकर? दुःख से बचने की चेष्टा में महादुःख मिला कि नहीं मिला? फिर?

भीम गदा लगाए दुर्योधन को, उससे पहले धृतराष्ट्र ने ही दो-चार गदा लगा दी होती तो महाभारत की ज़रूरत पड़ती? और धृतराष्ट्र ख़ुद, कहानी कहती है कि, बड़े सबल गदाधारी थे। महाभारत के बाद भीम को बुलाया और इरादा यह था कि बच्चू को भींच करके चूर-चूर कर दूँगा। वो तो कृष्ण ने भीम की जगह खम्भा खड़ा कर दिया। तो उन्होंने खम्भे का ही आलिंगन किया और खम्भा चकनाचूर, ऐसे थे धृतराष्ट्र।

इन्हीं धृतराष्ट्र ने बेटाराम को बुला करके दो-चार बार गदा का पान करा दिया होता, कि, "खड़े होना दोनों, दुर्योधन, दु:शासन। क्या कर रहे थे बेटा आज? चीरहरण। लाओ हम सिखाते हैं चीरहरण।" और गांधारी गदा लेकर आती और दो-दो गदा दोनों को पड़ती, भाइयों को, सब सही चलता न? पर दुर्योधन भी तुम्हारी ही अहिंसा की परिभाषा से बच गया। धृतराष्ट्र भी तुम्हारी ही तरह अहिंसावादी थे, कि अपनों पर हथियार नहीं उठाना चाहिए। मत उठाओ अपनों पर ऊँगली और फ़िर देखो अपने ही सौ पुत्रों को कटते हुए।

अध्यात्म साधारण मध्यम-वर्गीय नैतिकता नहीं होता, धर्म का प्रचलित लोक संस्कृति से बहुत कम ताल्लुक होता है। तो सोच रहे हो तुम कि जो नैतिकता लेकर घूम रहे हो, यही तो धर्म है। नहीं, ये धर्म नहीं है। धर्म तो साधारण नैतिकता के परखच्चे उड़ा देता है। आमतौर पर जिनको तुम धार्मिक लोग बोलते हो, वो धार्मिक नहीं होते, वो बस संस्कारित होते हैं; वो बस एक तरह की संस्कृति का पालन कर रहे हैं, धर्म का नहीं। धर्म तो जब अपने नग्न रूप में सामने आता है तो संस्कृतिवादियों को बड़ी आफत हो जाती है।

संस्कृति चलती है सिद्धांतों पर और नैतिकता पर, परम्पराओं पर और रूढ़ियों पर। धर्म चलता है सत्य पर।

तुम नैतिक अहिंसा की बात कर रहे हो, कृष्ण असली रूप में अहिंसक हैं, इसीलिए कृष्ण की और तुम्हारी बन नहीं रही। नैतिक अहिंसा कहती है: किसी का दिल मत दुखाना, किसी को मार मत देना। ये झूठी अहिंसा है, ये दो टके की अहिंसा है। असली अहिंसा आध्यात्मिक होती है।

असली अहिंसा तब उठती है जब तुम आत्मा को एक मात्र सत्य जान लो, तब अहिंसा है। जब देहभाव से मुक्त ही हो जाओ, तब अहिंसा है।

तुम्हारी अहिंसा क्या कहती है? "सच मत बोल देना क्योंकि सच कड़वा होता है। किसी का दिल दुःख जाएगा अगर सच बोल दिया"—क्योंकि तुम्हारी अहिंसा तो केंद्रित ही इसी बात पर कि किसी का, राजू, दिल मत दुखइयो—तुम्हारी कुल अहिंसा इतने में समा जाती है। और सत्य तो सदा दिल दुखाता है, तो तुम्हारी अहिंसा सबसे पहले सत्य की दुश्मन होती है और कमज़ोरी की पक्षधर होती है; क्योंकि जिसका दिल दुखेगा, वो पलटवार भी करेगा न।

तो जिसको सच बोलना है, उसमें यह ताक़त होनी चाहिए कि जिससे सच बोल रहा है, उसका पलटवार सह सके। दुर्बल लोगों के लिए ना अहिंसा है, ना सत्य है; क्योंकि जो भी सत्य को जीने निकलेगा, उस पर चोट और आघात तो होंगे ही।

दुर्बल आदमी हमेशा यही कहेगा, “नहीं, नहीं, नहीं सत्य चाहिए ही नहीं। सत्य का मतलब होता है कि दूसरे को चोट लगेगी और दूसरे को चोट लगी तो वो पलटकर हम पर भी चोट करेगा।” अब हम ये तो स्वीकार कर नहीं पाएँगे कि हम घबराते हैं कि कहीं हमें चोट ना लग जाए, इतनी ईमानदारी तो हममें है नहीं कि सीधे-सीधे मान लें कि बड़ा डर लगता है, कहीं हमें चोट ना लग जाए। तो हम यह नहीं कहेंगे कि हम अपनी सुरक्षा की खातिर चिंतित हैं, हम कहेंगे, “अरे, हम अहिंसावादी हैं, हम दूसरे को चोट नहीं पहुँचाना चाहते।”

तुममें हिम्मत भी है दूसरे को चोट पहुँचाने की? दूसरे को चोट पहुँचाने के लिए बड़ा कलेजा चाहिए, क्योंकि जिसको चोट दे रहे हो, वो चुप नहीं बैठने वाला। डरते हो।

कह रहे हो कि अर्जुन निकल जाता युद्ध से तो ज़्यादा अच्छा होता, क्योंकि उधर देख रहे हो दुर्योधन के बाजू तो पसीना छूट रहा है। स्वयं को अर्जुन की जगह रख रहे हो और कह रहे हो कि, "उधर भीष्म खड़े हैं, द्रोण खड़े हैं, कृपाचार्य खड़े हैं और सौ कौरव। बाप रे! सौ!" जहाँ दुर्योधन के बाजू देखे और गदा देखी, तहाँ बोले, “अहिंसा परमो धर्म:। अरे, लड़ाई बहुत बुरी बात है।” यहीं दुर्योधन की जगह कोई नौसिखिया खड़ा होता तो तुममें अहिंसा नहीं जगती।

दुश्मन बलवान हो तो सब अहिंसक हो जाते हैं तुरंत। और पशुओं को काटकर खाते समय अहिंसा नहीं जगती, सड़क पर कुत्ते को पत्थर मारते वक़्त अहिंसा नहीं जगती। सड़क के फेरीवाले, रिक्शेवाले, सब्ज़ीवाले के साथ दुर्व्यवहार करते हुए अहिंसा नहीं जगती, पर सामने पहलवान हो, “साहब, हम और हिंसा?”

अहिंसक होने के लिए बड़ी ताक़त चाहिए। कमज़ोरों का काम नहीं है अहिंसा।

जो स्वयं देहभाव से मुक्त हो गया हो, जो देह और देह से सम्बंधित सब बँधनों को काट चुका हो, मात्र वही अहिंसक हो सकता है। बिलकुल बाज आ जाइए इन सब सिद्धांतों से, आप जो फरमा रहे हैं, वो सब फ़िल्मी सिद्धांत हैं, फिल्मों में बताया जाता है। और कुछ सस्ते शायर इस तरह की बातें करते हैं कि सब धर्म, सब मज़हब, इनका तो एक ही सार है: ‘किसी का दिल मत दुखाना’। ये बातें फिल्मों और सस्ते मुशायरों में अच्छी लगती हैं। असली अध्यात्म में इनकी कोई कीमत नहीं है।

सुना होगा आपने ये सब कि गीता हो, कि क़ुरआन हो, सबका सन्देश तो बस एक है, क्या? “किसी का दिल मत दुखाना।” ये वो लोग हैं जो बर्दाश्त नहीं कर सकते कि इनका दिल कोई दुखाए। ये वो लोग हैं जो अपनी धारणाओं, अपनी मान्यताओं, अपने पूर्वाग्रहों, अपने अंधविश्वासों पर अड़े हुए हैं, ये चाहते ही नहीं कि कोई इन्हें चुनौती दे। चूँकि ये नहीं चाहते कि कोई इन्हें चुनौती दे इसीलिए ये किसी दूसरे को चुनौती नहीं देना चाहते। इसी बात को वो बेईमानी के साथ ऐसे सामने रखते हैं कि किसी का दिल मत दुखाना।

सच्चाई तो जब भी सामने रखोगे, जो झूठ पर अड़ा हुआ है, उसका दिल तो दुखेगा ही। ये ‘दिल ना दुखाना’ अहिंसा कब से हो गया और कैसे हो गया?

तुम्हारे हिसाब से चलूँ तो बड़ी हिंसा मैंने कर दी, इतना दिल तो तुम्हारा ही दुखा दिया। मैं तो पेशेवर दिल दु:खदायक हूँ, रोज़ यही काम है चार घण्टा; जैसे कोई हाइड्रोलिक प्रेस हो, उसके नीचे एक-एक करके दिल रखे जाते हों और प्रेस से भट,भट, भट। “अगला दिल लाओ। अगला दिल किसका है, भाई, बताइए? हम तो हिंसावादी हैं कृष्ण की तरह।”

प्र३: मैं अपने निजी जीवन में अर्जुन की तरह सही निर्णय कैसे ले सकता हूँ?

आचार्य: अर्जुन की तरह अगर सही निर्णय लेना चाहते हैं तो ये देखिए कि अर्जुन ने सर्वप्रथम क्या निर्णय लिया। कोई भी और निर्णय लेने से पहले उसने यह निर्णय लिया कि कृष्ण के ही साथ रहूँगा, चाहे कितना भी नुकसान हो जाए। कृष्ण की सेना भी दुर्योधन को चली गई, उसने कहा, "कोई बात नहीं, मुझे तो श्रीकृष्ण के साथ ही रहना है।" और आप कह रहे हैं कि, "हम स्वयं कैसे निर्णय ले लें?" ये अर्जुन जैसी बात तो नहीं लगती। अर्जुन ने क्या यह निर्णय लिया था कि वो स्वयं ही निर्णय ले लेगा या उसने अपने निर्णय कृष्ण को समर्पित कर दिए थे?

तो अर्जुन की तरह निर्णय लेना चाहते हैं तो सबसे पहले यह हठ, ये अहम् छोड़ें कि, "मैं ख़ुद ही कर लूँगा; मुझे कृष्ण की कोई ज़रूरत नहीं।" किसने कहा था कि मुझे कृष्ण की कोई ज़रूरत नहीं, जबकि उसे कृष्ण पाने का विकल्प उपलब्ध था? दुर्योधन ने। ये तो बात दुर्योधन जैसी हो गई कि मैं ख़ुद ही कर लूँगा।

अर्जुन बनना हो तो कहिए, “बाकी सब छोड़ करके कृष्ण चाहिए, बस।”

अर्जुन ने एक निर्णय किया - कृष्ण चाहिए। आगे के सारे निर्णय कृष्ण ने कर दिए। आप पहला निर्णय तो सही करिए न। और वही निर्णय ग़लत कर दिया तो बाकी आप जितने निर्णय करते रहें, उनकी कोई हैसियत नहीं। एक सही निर्णय कर लीजिए, नफा हो, नुकसान हो, कृष्ण के ही साथ रहना है।

और कृष्ण ज़रूरी नहीं हैं कि आपको उसी रूप में मिलें जिस रूप में अर्जुन को मिले थे। पृथ्वी पर जितने पदार्थ हैं, जितने रुप, जितने रंग, जितने आकार, जितने नाम, सबमें सम्भावना है आपका कृष्ण हो जाने की। आप ढूँढिए कि आपके कृष्ण कहाँ हैं, और जहाँ भी मिलें फ़िर साथ रहिए।

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