
दुविधा और जटिलता ही मन का दुःख हैं। हमारा मन जितना स्पष्ट और सरल रहेगा, हमारा जीवन उतना ही आनंदित और सुखमय होगा।
हो सकता है कि हम बहुत ज्ञानी और अनुभवी हों परंतु यदि हमें आंतरिक स्पष्टता नहीं होगी तो हमारा ज्ञान और अनुभव व्यर्थ हैं। आंतरिक स्पष्टता एक स्वच्छ आँख की तरह है जो चीज़ों को साफ़ देख सकती है।
स्पष्टता ही शांति का पर्याय है और अस्पष्टता अशांति और मनोरोगों का प्रमुख कारण।
आचार्य जी का यह सरल वीडियो कोर्स "आंतरिक स्पष्टता के सूत्र" आपके जीवन और मन में आंतरिक स्पष्टता लाने के लिए तैयार किया गया है। यह कोर्स उन बाधाओं के समूल नाश के लिए है जो हमारे मन को जटिल बनाते हैं।
यह कोर्स श्वेताश्वेतर उपनिषद् के अध्याय 5 के कुछ श्लोकों पर आधारित है। साथ ही उन श्लोकों से जुड़े प्रश्नों पर भी खुलकर चर्चा की गयी है।
श्वेताश्वतर उपनिषद् का स्थान ईशादि दस प्रधान उपनिषदों में है। इसके वक्ता श्वेताश्वतर ऋषि हैं। इस उपनिषद् की विवेचनशैली बड़ी ही सुसम्बद्ध और भावपूर्ण है। यह उपनिषद् कृष्ण यजुर्वेदीय शाखा के अन्तर्गत है। इसमें कुल छ: अध्याय हैं।
यह पाठ्यक्रम अध्याय 5 के पहले और दूसरे श्लोक पर आधारित है। अध्याय में 1 जगत कारण का निर्णय कर प्रण व चिन्तन पूर्वक ध्यानाभ्यास को ही उसके साक्षात्कार का साधन बताया गया है। इसका विशेष विवरण अध्याय 2 में है। अध्याय 2 में ध्यान की विधि व ध्यान के योग्य स्थान, यौगिक क्रियाओं का वर्णन व आत्म साक्षात्कार से सम्बंधित प्रश्नों पर प्रकाश डाला गया है। अध्याय 3 में एक सफल जीवन व उसकी उच्चतम संभावना व अध्याय 4 में मन की स्थिरता पर चर्चा की गयी है। अध्याय 5 में आंतरिक स्पष्टता के ऊपर ज़ोर दिया गया है।
आचार्य प्रशांत की इस स्पष्ट व सरल व्याख्या से आंतरिक स्पष्टता के सूत्रों के बारे में पता चलता है।
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