
नज़र की पहुँच के पार लेना नज़ारे,
सीनों के गली-कूचों में दौड़ें मारना
नई जगह, नए अनुभव, नए संबंध - हर बार की दौड़-भाग के बाद लगता है शायद यहीं चैन मिलेगा।
लेकिन क्या सब कुछ मिल जाने के बाद भी एक भीतरी बेचैनी रह जाती है? ऐसे में स्थायी चैन कैसे मिलेगा?
आचार्य प्रशांत कहते हैं - “पुराने रास्तों पर चलकर, नई मंज़िलों तक कैसे पहुँच जाओगे?”
तो अब यह सवाल उठता है कि क्या हम इश्क़ को सही जगह खोज भी रहे हैं या फिर वहीं पुराने रास्तों में उलझे हुए हैं?
संत रूमी के प्रेम-काव्य पर वीडियो सीरीज़ की पांचवीं कड़ी में आचार्य प्रशांत हमें साफ़ नज़रों से स्वयं को और दुनिया को देखना सिखाते हैं ताकि हम स्थायी चैन की ओर बढ़ सके।
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