
आज भक्ति का अर्थ या तो मधुर भावनाओं से जोड़ दिया जाता है, या फिर भगवान को पाने के किसी एक विशेष मार्ग से। हम अक्सर मान लेते हैं कि कोई खास छवि के आगे सिर झुका लेना ही संपूर्ण समर्पण है।
लेकिन जिसे हम समर्पण समझते हैं, क्या वह स्थायी चैन दे पाता है जिसकी हमें तलाश है? ऐसी भक्ति से मिलने वाला सुकून दुनिया की भागदौड़ में लौटते ही गायब क्यों हो जाता है?
थोड़ी भक्ति बहुत अहंकारा,
ऐसे भक्ता मिले अपारा।
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत हमारी इस प्रचलित भक्ति को आईना दिखाते हुए स्पष्ट करते हैं कि चूँकि हम बदलना नहीं चाहते, इसलिए अहंकार भगवान को भी अपनी मान्यताओं के साँचे में ढाल लेता है। इस तरह हम किसी ऊँचाई के आगे नहीं झुकते, बल्कि अपने ही द्वारा स्थापित एक छवि के सामने झुककर अपनी बेचैनी बनाए रखते हैं।
अगर भक्ति के नाम पर होने वाली यह चालाकी हमारी उलझनें बनाए रखती है, तो फिर संतों की सच्ची भक्ति क्या है?
कबीर साहब के भजन पर आधारित यह वीडियो सीरीज़ आपको संतों की भक्ति से परिचित कराती है जहाँ भक्त और भगवान के बीच एक आयामगत भेद है जिसे समझने से भीतर की सारी चालाकियाँ ढहने लगती हैं। तो आइए, आचार्य प्रशांत के साथ इस विशुद्ध भक्ति की ओर कदम बढ़ाएँ, जहाँ भगवान के आगे झुकने का अर्थ अपनी हस्ती को बचाना नहीं, बल्कि अपनी ही गढ़ी छवियों से आज़ाद होकर भीतर से बदल जाना है।
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जो मैं बौरा तो राम तोरा
लोग मरम का जाने मोरा
मैं बौरी मेरे राम भरतार,
ता कारण रचि करूँ स्यंगार।
माला तिलक पहरि मन माना,
लोगनि राम खिलौना जाना।
थोड़ी भगति बहुत अहंकारा,
ऐसे भगता मिलै अपारा।
लोग कहें कबीर बौराना,
कबीर का मरम राम जाना।