
हममें से कौन मानता है कि वह बेहोश है?
हम अपने विचार, फैसले और जीवन के हिसाब-किताब पर पूरा भरोसा रखते हैं। अपने तरीके हैं, अपनी गणनाएँ हैं, अपने विश्वास हैं। लेकिन कितनी ही बार बाद में पता चलता है कि जिसे हम पूरे भरोसे से सच मान रहे थे, सच्चाई उससे बिल्कुल अलग थी। विडंबना यह है कि हम अपनी बेहोशी को ही होश मानकर जीते हैं, क्योंकि अपनी मान्यताएँ हमें बिल्कुल सही लगती हैं।
यहीं से संतों की भाषा उलट जाती है। जब बेहोशी ही होश कहलाने लगी, तो संतों ने सच और अध्यात्म को मद, नशा और खुमारी कहा।
कबीर साहब कहते हैं: “सुरत कलारी भई मतवारी, मदवा पी गई बिन तोले।”
इस पंक्ति की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत बताते हैं कि सच्चे आदमी की पहचान है निर्भीक मदहोशी। एक ऐसी दीवानगी जो संसार पर किसी तरह से आश्रित नहीं है। जो सम्मान-अपमान, निंदा-श्लाघा कुछ नहीं सोचती, जो अब दुनिया से हुक्म लेती ही नहीं है।
प्रस्तुत वीडियो श्रृंखला के इस तीसरे वीडियो में हमारे ही चुनाव का प्रश्न सामने आता है: हम अपना झूठा होश बचाए रखना चाहते हैं, या यह मानने को तैयार हैं कि हम बेहोश हैं? यहीं से यह बात खुलती है कि सच जान लेने के बाद भी हम झूठ क्यों पकड़े रहते हैं, और अपनी बेहोशी को स्वीकारने पर जीवन में निडरता और आज़ादी सहज ही कैसे आ जाती हैं।
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