
ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।।
ग्रंथों को पढ़ने से पहले शांति पाठ क्यों जरूरी संक्षिप्त में समझ लेते हैं।
गुरु को क्षोभ इस बात का लगना है कि “अच्छा-ख़ासा मैं ऊपर बैठा था शिखर की ऊँचाइयों पर, इन पगले शिष्यों के लिए मुझे बार-बार अपना आनंद खंडित करके नीचे आना पड़ता है। और नीचे आओ तो ये कैसे-कैसे तो सवाल पूछते हैं, कैसी-कैसी ज़िद करते हैं, कैसे-कैसे बहाने और झूठ बताते हैं, मुझे ही धोखा देते हैं। मैं इनकी खातिर बार-बार नीचे आता हूँ प्रेमवश, और ये मुझसे ही चालाकियाँ करते हैं।“ तो जो गुरु है, उसको यह द्वेष पैदा हो सकता है।
शिष्य को तो द्वेष पैदा होगा ही कि “ये गुरु अपने-आपको बड़ा ज्ञानी समझता है, बार-बार हमारी ही खोट निकालता रहता है। ख़ुद तो न जाने कौन-से आसमान पर बैठा है! ज़मीन के व्यवहार का इसको कुछ पता नहीं, और नीचे आकर के हमसे अजब-गजब बातें करता है। कहता है कि तुम्हारा ये झूठा है, इस चीज़ की नेति-नेति करो, ये छोड़ो, मोह त्यागो, बंधन त्यागो, मुक्ति में बड़े आनंद हैं। हमें ये बातें ही इसकी नहीं पसंद आतीं।“ तो शिष्य में भी द्वेष उठता है गुरु के खिलाफ़।
आरंभ में ही प्रार्थना की जाती है कि “हे परमात्मन्! आप हम दोनों की ही रक्षा करें, गुरु की भी, शिष्य की भी। आप हम दोनों का ही पालन करें। आप हम दोनों को ही शक्ति दें।” क्योंकि दोनों को ही शक्ति की ज़रूरत पड़ने वाली है; गुरु को भी क्रोध आने वाला है और शिष्य में भी गुरु के प्रति दुर्भावना आने वाली है। “हम दोनों की विद्या प्रखर हो और हम दोनों एक-दूसरे के प्रति ईर्ष्या और द्वेष न करें। हे शक्ति सम्पन्न! हमारे त्रिविध तापों का शमन हो। अक्षय शांति की स्थापना हो।”
शांति पाठ की पूरी महत्ता को आचार्य जी ने इस वीडियो सीरिज़ के माध्यम से स्पष्ट किया है। बोध प्रत्युषा सीरीज़ आरंभ करने से पहले शांतिपाठ कर लेते हैं।
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