
एक भरी महफ़िल में आप मंच से लोगों को संबोधित कर रहे थे। आपकी बात पर ज़ोरदार तालियाँ बजीं और मन खुशी से झूम उठा। लेकिन अगले ही दिन ऑफिस पहुँचते ही बॉस से ज़रा सी डांट क्या पड़ी, आपकी सारी खुशी गायब और पूरा दिन खराब।
आखिर हम दुनिया को खुद पर इतना हावी क्यों होने देते हैं? ज़रा सोचिए, जिस दुनिया की समझ पर हम खुद इतना सवाल उठाते हैं, उसी दुनिया से मिली तालियों और गालियों की कीमत ही क्या है?
माया आदर माया मान,
माया नहिं तहं ब्रह्म ज्ञान।
कबीर साहब के भजन पर आधारित दूसरी वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत 'आदर' और 'मान' की असलियत को हमारे सामने रखते हैं। जहाँ दुनिया कष्ट सहकर ज़िम्मेदारी निभाने को ऊँचा आदर्श मानती है, वहीं आचार्य जी स्पष्ट करते हैं कि समाज से पहचान पाने की हमारी यह चाह असल में और कुछ नहीं, माया का ही एक रूप है। वे समझाते हैं कि माया कोई बाहरी दुश्मन नहीं जिससे लड़ा जाए। अगर रोज़मर्रा के जीवन में ही ख़ुद को ईमानदारी से देख लें तो माया समझ में आने लगती है।
यह वीडियो श्रृंखला आपको माया को समझने का विवेक प्रदान करती है, ताकि आप दुनिया की दी हुई इस 'झूठी इज़्ज़त' की गुलामी से बाहर आ सकें। यह सीरीज़ एक ऐसा जीवन जीने की ओर प्रेरित करती है, जहाँ आपके कर्म ज़िम्मेदारियों के बोझ से नहीं, बल्कि सहज प्रेम और बोध से उठते हैं।
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माया तजूं तजि नहिं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ।
माया आदर माया मान,
माया नहिं तंह ब्रह्म ज्ञान।
माया रस, माया कर जान,
माया कारनि तजे परान।
माया जप तप माया जोग
माया बाँधे सबहि लोग।
माया जल थलि माया अकासि,
माया व्यापी रही चहुं पासि।
माया पिता माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।
माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम आधार।
~ संत कबीर