
घर-गृहस्थी और भविष्य की चिंताओं में उलझे हुए आम आदमी के लिए अध्यात्म या तो संसार से भाग जाने का दूसरा नाम है, या कुछ पलों के लिए अपनी दुनिया भुला देने का एक माध्यम। ऐसे में, रोज़मर्रा के जीवन में जब भी कोई उलझन सामने आती है, तब हम अध्यात्म की ओर मुड़ते तो ज़रूर हैं, पर केवल एक बहलावे के रूप में जिससे समस्या से कुछ देर के लिए मन हटा सकें।
कबीर साहब के भजन की ये पंक्तियाँ, हमें इसी भटकाव से बाहर निकालती हैं और व्यावहारिक जीवन को सुचारु रूप से जीने में अध्यात्म की महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करती हैं:
माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम अधार।
“माया तजूँ तजि नहिं जाइ” भजन पर आधारित आखिरी वीडियो सीरीज़ में आचार्य प्रशांत जी समझाते हैं कि इसी दुनिया में जीने की समझ न होना ही ‘माया’ है। वे स्पष्ट करते हैं कि जो सचमुच आध्यात्मिक है, सिर्फ़ वही इस संसार के भौतिक व्यवहार को समझते हुए एक सफल जीवन जी सकता है।
आचार्य प्रशांत जी के शब्दों में: “अध्यात्म का मतलब संसार से दूरी नहीं होता, अविवेक और मूर्खता से दूरी होता है।”
प्रस्तुत वीडियो सीरीज़ आपको इसी संसार में बिना भ्रम के जीना सिखाती है। ऐसे ही स्पष्ट जीवन को कबीर साहब भजन में ‘राम आधार’ कहकर गाते हैं। जब आपके दैनिक जीवन के सारे निर्णय 'राम आधार' से लिए जाते हैं, तो जीवन खुलने लगता है और आप सही दिशा में निर्णय लेने लगते हैं।
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माया तजूं तजि नहिं जाइ,
फिर फिर माया मोहि लपटाइ।
माया आदर माया मान,
माया नहिं तंह ब्रह्म ज्ञान।
माया रस, माया कर जान,
माया कारनि तजे परान।
माया जप तप माया जोग
माया बाँधे सबहि लोग।
माया जल थलि माया अकासि,
माया व्यापी रही चहुं पासि।
माया पिता माया माता,
अतिमाया अस्तरी सुता।
माया मारि करै ब्योहार,
कबीर मेरे राम आधार।
~ संत कबीर