विद्यार्थी जीवन, पढ़ाई और मौज + आज़ादी 2.0 + संकल्प + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

विद्यार्थी जीवन, पढ़ाई और मौज + आज़ादी 2.0 + संकल्प + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
विद्यार्थी जीवन, पढ़ाई और मौज + आज़ादी 2.0 + संकल्प + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

विद्यार्थी जीवन, पढ़ाई और मौज:

आजकल का युवा, खासतौर से भारत का, विभिन्न पारिवारिक, सामाजिक, शैक्षणिक व मीडिया, व्यावसायिक, शारीरिक दुविधाएँ, प्रेम व रिश्ते तथा गहरे अस्तित्ववान जीवन सम्बन्धी प्रश्नों से जुड़ी बहुधा चुनौतियों का सामना करता है। युवा वर्ग एक ऐसी नाज़ुक स्थिति में है जहाँ से ज़िंदगी में गलत मोड़ लेना काफी आसान है। आचार्य प्रशांत अपने एक अनोखे ही तरीके से युवा पीढ़ी की ऊर्जा और संघर्षों को संबोधित करते हैं। इस पुस्तक का यही उद्देश्य है कि आपको भी स्पष्टता मिले और अपने जीवन के निर्णय आप स्वयं अपनी सूझबूझ से कर सकें।

आज़ादी 2.0:

भारत की राजनीतिक आज़ादी के दशकों बाद भी हम अनेक तरीकों से कैद हैं - सामाजिक, मानसिक, भावनात्मक रूप से। आचार्य प्रशांत कहते हैं: तब दुश्मन स्पष्ट था, आज का दुश्मन छिपा हुआ है. आज दुश्मन आपका हितैषी बनकर वार कर रहा है।

आज़ादी 2.0 सिर्फ़ एक किताब नहीं है, यह आचार्य प्रशांत द्वारा दिए उन गहरे संवादों का संकलन है जो आपको वास्तविक स्वतंत्रता से परिचित कराती है। इस पुस्तक का उद्देश्य आज़ादी को लेकर कोई सतही शोर-गुल करना नहीं बल्कि सालों पुरानी ग़ुलामी के पीछे छुपे कारणों को समझना है। वही कारण जो आज आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी आपके-हमारे बीच न केवल अपनी जड़ें जमाए हुए हैं, बल्कि और अधिक गहराई पा रहे हैं। वही कारण जो आपके और आपकी उच्चतम संभावना के बीच की बाधा हैं।

यह पुस्तक आपको उस व्यक्ति से मिलवाएगी जो आप हो सकते हैं। उस जीवन से मिलवाएगी जो आप जी सकते हैं। उस आकाश से मिलवाएगी जिसमें आप उड़ान भर सकते हैं।

क्योंकि उड़ान अभी बाक़ी है! आसमाँ अभी बाक़ी है!

संकल्प:

हम सब अपने लिए कुछ लक्ष्य बनाते हैं, और उन्हें पूरा करने के लिए अनेक संकल्प उठाते हैं। बहुत बार उन संकल्पों को पूरा करके बाहर-बाहर हम बहुत कुछ अर्जित भी कर लेते हैं, पर क्या उससे भीतर का खालीपन मिट जाता है? क्या ऐसा होता है कि जो मिला है उससे और पाने की चाहत ही खत्म हो जाए? वो चाहतें दोबारा उठें ही न?

हम एक संकल्प से दूसरे संकल्प पर दौड़ते रहते हैं लेकिन रुक कर यह नहीं पूछते कि संकल्प खुद पूरा होकर भी क्या हमें पूरा कर पा रहा है? क्या जीवन में कोई मूलभूत बदलाव आ रहा है?

आचार्य प्रशांत की यह पुस्तक संकल्प‌ लेने वाले का ध्यान बाहर से भीतर की ओर मोड़ने का प्रयास है। संकल्पकर्ता कौन है? उसके संकल्प किन लक्ष्यों के लिए लिये जा रहे हैं? वो लक्ष्य ही कहॉं से निर्धारित हो रहे हैं?

यह पुस्तक व्यक्ति को इन मूल प्रश्नों की ओर लेकर आती है जिससे कि उसके संकल्प समझ और बोध से उठें, अज्ञानता और बाहरी प्रभावों के कारण नहीं। पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने सही संकल्प से जुड़ी कुछ भ्रांतियों और चुनौतियों पर भी मार्गदर्शन किया है।
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