शिवोहम् + आत्मज्ञान + वेदान्त + श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1) [Hardbound] + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

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Description
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पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

शिवोहम्:

शिव माने बोध। ऋभुगीता कहती है कि शिव प्रकाश रूप हैं। उस प्रकाश में, उस रोशनी में ख़ुद को देखो। अपनी हालत, अपनी ज़िंदगी को देखो। यही महाशिवरात्रि का पर्व है।

इंसान की जो जड़ है, इंसान का जो केंद्र बिंदु है, उसकी तरफ़ इशारा करने के लिए ‘शिव’ शब्द की रचना हुई। शिव कोई व्यक्ति थोड़े ही हैं। वो कोई ऐसी इकाई नहीं हैं जो अपना कोई निजी, पृथक या विशिष्ट व्यक्तित्व रखती हो। सब समय, सब स्थान मन का विस्तार हैं, और शिव मन की मंज़िल हैं, मन का केंद्र हैं, मन की प्यास हैं।

शिव इसलिए नहीं हैं कि उनके साथ और बहुत सारे किस्से जोड़ दो। शिव इसलिए हैं ताकि हम अपने किस्सों से मुक्ति पा सकें। शिव हमारे सब किस्सों का लक्ष्य हैं, गंतव्य हैं। शिव को भी एक और किस्सा मत बना लो, देवता मत बना लो। पर मन को देवताओं के साथ सुविधा रहती है क्योंकि देवता हमारे ही जैसे हैं – खाते-पीते हैं, चलते हैं। उनके भी हाथ-पाँव हैं, वाहन हैं, लड़ाइयाँ करते हैं, पीटे जाते हैं। उनकी भी पत्नियाँ हैं, उनकी भी कामनाएँ हैं। तो शिव को भी देवता बना लेने में हमें बड़ी रुचि रहती है। पर अगर यह कर लोगे तो अपना ही नुक़सान करोगे।

शिव न देवता हैं, न भगवान् हैं, न ईश्वर हैं; सत्य मात्र हैं। अंतर करना सीखो!

आत्मज्ञान:

क्या है आत्मज्ञान?

आत्म माने 'मैं'। हम जीते जाते हैं, कर्म करते जाते हैं बिना कर्म की पूरी प्रक्रिया को ग़ौर से देखे। कर्म कहाँ से हो रहे हैं, कर्मों के पीछे क्या है, कर्मों का कर्ता कौन है, इस पर ग़ौर करने की हम न ज़रूरत समझते हैं न हमें अवकाश मिलता है, क्योंकि कर्मों की एक अविरल श्रृंखला है।

आत्मज्ञान का मतलब हुआ कि आपको साफ़ पता हो कि कर्म के पीछे कौन है। आत्मज्ञान का मतलब होता है ठीक तब जब जीवन की गति चल रही है, आप उसके प्रति जागरूक हो जाएँ।‌ और तब आप बिना उस गति को रोके भी उस गति से बाहर हो सकते हैं।

इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने इस तथ्य पर रोशनी डाली है कि आत्मज्ञान का मतलब यह नहीं होता कि तुम आत्मा को जान गये, आत्मा के ज्ञान को आत्मज्ञान नहीं कहते। आत्मज्ञान का मतलब है अहंकार का ज्ञान। आत्मा का ज्ञान नहीं होता, आत्मा की अनुकम्पा से आत्मज्ञान होता है।

आत्मज्ञान आपको बताता है कि आप वृत्तियों के, गुण-दोषों के, अहंकार के पुतले मात्र हो। तो फिर अपने लिए कोई कामना करना व्यर्थ हो जाता है, तब आप निष्काम हो पाते हो। तो आत्मज्ञान से ही फिर निष्काम कर्म भी फलित होता है।

वेदान्त:

आत्म-जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य अपना सबसे कीमती संसाधन, अपना जीवन ही खोता चलता है। चिन्ता कर-करके कुछ हासिल भी कर लिया तो ये कभी नहीं समझ पाता कि जो हासिल किया उसकी कीमत क्या, और वह हासिल करने के लिए जो गँवाया, उसकी कीमत क्या! यही कारण है कि सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में आत्म-जिज्ञासा को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।

इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत वेदान्त के मूल सिद्धांतों को समझाते हैं और प्रमुख उपनिषद् सूत्रों में छुपे गूढ़ रहस्यों को सरलता के साथ उजागर करते हैं। यह पुस्तक एक भेंट है उनके लिए जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं, साथ-ही-साथ उनके लिए भी जिन्होंने अपनी यात्रा बस अभी शुरू ही की है।

श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य:

श्रीमद्भगवद्गीता कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान मात्र नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा को सम्बोधित शब्द हैं।

गीता का जन्म शान्त मनोरम वन या आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ है। अर्जुन जीवन से विरक्त शिष्य नहीं जो संसार त्यागकर कृष्ण के पास आए हों। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म है तो दूसरी तरफ़ सम्बन्धियों और गुरुजनों का मोह; बड़ा कठिन है निर्णय लेना कि अपनों पर बाण चलाएँ या नहीं। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य है जो सुन तो रहा है, पर समझने को बहुत तत्पर नहीं। एक दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता श्रीकृष्ण के अर्जुन के अज्ञान के प्रति संघर्ष की गाथा है।

इस संघर्ष में श्रीकृष्ण के शस्त्र हैं वेदांत के सूत्र और सिद्धांत। गीता वेदांत की प्रस्थानत्रयी का प्रमुख स्तम्भ है। उपनिषदों के महावाक्य ही गीता में अत्यंत रोचक व व्यावहारिक रूप से उद्भूत होते हैं।

हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है; आम पाठक अर्जुन की स्थिति में अपनी छवि देख सकता है। यही बात हमारा एक विशिष्ट नाता जोड़ती है गीता से।

आचार्य प्रशांत का 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य' गीता का विशुद्ध वेदांतसम्मत अर्थ आप तक ला रहा है। एक-एक श्लोक की व्याख्या में शुद्धता को ही केंद्रीय वरीयता दी गयी है।

प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय पाँच से अठारह तक के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या संकलित है।
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