राम भजा सो जीता जग में + रैन दिवस पिया संग रहत है + पी ले प्याला हो मतवाला + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

राम भजा सो जीता जग में + रैन दिवस पिया संग रहत है + पी ले प्याला हो मतवाला + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर!
राम भजा सो जीता जग में + रैन दिवस पिया संग रहत है + पी ले प्याला हो मतवाला + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

राम भजा सो जीता जग में:

जीवन के निर्णायक क्षणों में हमारा चुनाव किसके पक्ष में होता है — सच्चाई के, या उस डर के जो कहता है कि दुनिया में झूठ ही जीतता है?
जब सही रास्ता स्पष्ट होता है, तब भी भीतर कोई आवाज़ हमें रोकती क्यों है?

“राम भजा सो जीता जग में” — कबीर साहब द्वारा रचित यह अति सरल भजन आपकी इसी दुविधा को मिटाने की कुंजी है। इस भजन के केंद्र में है “जग”। वे केवल इतना नहीं कह रहे कि “राम भजा सो जीता”, वे कह रहे हैं “राम भजा सो जीता जग में”, इसी जगत में। कबीर के राम उस सत्य के प्रतीक हैं जिसकी मनुष्य को भीतर-ही-भीतर तलाश है। भजने का अर्थ है लगातार याद रखना कि राम से दूरी है। कि अभी पूरा नहीं हूँ, अभी आगे जाना है।

इसी सत्य से हम दूर हो जाते हैं क्योंकि हमें बचपन से सिखाया जाता है कि दुनिया में झूठ, डर और चालाकी ही जीतती है। प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत भजन की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि किस प्रकार यही सीख हमें जीवन भर गलत चुनावों की ओर धकेलती है। यह पुस्तक अमूर्त प्रवचन नहीं, निडर, सच्चे और स्पष्टतापूर्ण जीवन की ओर एक कदम है।

रैन दिवस पिया संग रहत हैं:

व्यक्ति जन्म लेता है, कुछ दिन जीता है, और उसकी मृत्यु हो जाती है। संत, ऋषि, जिन्होंने जीवन को जाना है, उन्होंने यही सवाल बार-बार पूछा है: जैसे जी रहे हो, क्या वैसे जीने के लिए जन्मे हो? जैसी आपकी ज़िंदगी है, आपको कुछ साल पहले दिखाई गई होती, तो भी क्या आप ऐसी ही ज़िंदगी चाहते?

कबीर साहब के शब्दों को महज़ भावुक भजनों के दायरे से बाहर निकालकर आचार्य प्रशांत इस पुस्तक में सीधे हमारे जीवन की सबसे गहरी मनोवैज्ञानिक परतों के बीच ले आते हैं। वे बताते हैं कि मनुष्य रोटी, कपड़ा, मकान और सेहत जैसी बुनियादी सुरक्षा पा लेने के बाद भी एक अनजाने डर में जीता है। इसी डर के कारण वह बंधनों, मान्यताओं और सीमाओं को स्वीकार करता जाता है, और जीवन द्वारा दिए उड़ान के अवसर गँवाता जाता है।

बोध या ज्ञान का क्षेत्र एक सुरक्षित जीवन सुनिश्चित करने या मृत्यु पश्चात किसी पारलौकिक जगत का आश्वासन देने के लिए नहीं है। बोध इसलिए है ताकि आप अपनी साधारण अनुभवों की व्यर्थता को साफ़ देख सकें और उसे लाँघने का साहस जुटा सकें। आपकी ज़िंदगी की ऊँची उड़ान, आपकी उच्चतम संभावना ही बोध का लक्ष्य है। “पिया”आपकी ज़िंदगी की यही उच्चतम संभावना है।

जीवन अपनी समग्र संभावना के साथ हर पल एक नया चुनाव, ऊँची उड़ान का एक नया न्योता लेकर आता है। प्रस्तुत पुस्तक आपको अपने बंधनों, मान्यताओं, सुरक्षित ढर्रों के प्रति स्पष्टता देती है, जिसके बाद जीवन के हर अज्ञात विकल्प, हर न्योते को स्वीकार करने का साहस भीतर से जगने लगता है।

पी ले प्याला हो मतवाला:

कबीर साहब के सबसे लोकप्रिय भजनों में से एक, "पी ले प्याला हो मतवाला," हमें ऐसे प्याले की ओर आमंत्रित कर रहा है जो अमरत्व का द्वार है।

यह सुनते ही हमारे सामने तुरंत एक लुभावनी छवि आ जाती है — किसी देवता के दिए वरदान की, या उस पारस पत्थर की, जो बस मिथकों और कहानियों में ही मिलते हैं।

पर संतों का अमृत बिलकुल इसी जीवन में उपलब्ध हो सकता है। आचार्य प्रशांत इस सच्चाई को कुछ ऐसी मौलिक और जीवंत बोध-कथाओं के माध्यम से उजागर करते हैं, जो भजन के मर्म को हमारे ही जीवन के धरातल पर ले आती हैं।

बात शुरू होती है एक मतवाले घोड़े और ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबे एक टट्टू की गाथा से — टट्टू अपनी बँधी-बँधाई दिनचर्या में इतना संस्कारित है कि घोड़े की उन्मुक्तता उसे 'बेहोशी' प्रतीत होती है। पर क्या हो, अगर वह खुद से पूछ ले कि जिसे वह होश मानता है, वह आख़िर है क्या? कहीं घोड़े का मतवालापन ही तो उस अमरत्व की कुंजी नहीं?

भजन की एक-एक पंक्ति ऐसी ही रोचक कहानियों के माध्यम से खुलती जाती है, और पाठक को उस स्पष्टता तक ले जाती है जहाँ वह अपने संबंधों, कामनाओं और समस्याओं को दुनिया-प्रदत्त दृष्टि से नहीं, बल्कि एक ईमानदार दृष्टि से देख सके।

यह पुस्तक उनके लिए है जो व्यर्थ के झंझटों से मुक्त होकर जीवन की वास्तविक गहराई में उतरना चाहते हैं, वह गहराई जो संसार के त्याग से नहीं, बल्कि उससे सही संबंध बनाने से उपजती है।
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