सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! प्रलय + आत्मज्ञान + वेदान्त + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
प्रलय:
जलवायु परिवर्तन अब कोई आने वाला खतरा नहीं है। यह हमारे घर, हमारे शरीर, हमारे भोजन, हमारे भविष्य — सबको एक साथ निगल रहा है। लेकिन संकट जितना वास्तविक है, हमारी चेतना उतनी ही सुन्न।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत, वेदांत के आलोक में यह स्पष्ट करते हैं कि जलवायु संकट केवल एक पर्यावरणीय चुनौती नहीं है, बल्कि मनुष्य की जीवन-दृष्टि, उसकी इच्छाओं और मूल्यों से उपजा संकट है।
हर अध्याय एक गंभीर संवाद है — जो हमारी आदतों, सामाजिक व्यवस्था और मानसिक संरचनाओं की पड़ताल करता है। यह पुस्तक प्रश्न उठाती है — भीतर भी, बाहर भी।
▪️क्या सिर्फ नीति बदलावों या तकनीकी उपायों से यह संकट टल जाएगा? ▪️क्यों सबसे अधिक संकट में वे लोग हैं, जो इसके लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं? ▪️कैसे हमारी उपभोगप्रियता और चुप्पी इस प्रलय की ज़मीन तैयार कर रही है? ▪️क्या अब भी कुछ किया जा सकता है?
यह किसी को दोष नहीं देती, पर यह भी नहीं कहती कि हम निर्दोष हैं। "प्रलय" कोई भविष्य की कहानी नहीं है। यह आज की स्थिति है, जिसे हम देखना नहीं चाहते। यह पुस्तक उसी को देखने को कहती है — जिसे टालना अब विनाश को चुनने जैसा है।
आत्मज्ञान:
क्या है आत्मज्ञान?
आत्म माने 'मैं'। हम जीते जाते हैं, कर्म करते जाते हैं बिना कर्म की पूरी प्रक्रिया को ग़ौर से देखे। कर्म कहाँ से हो रहे हैं, कर्मों के पीछे क्या है, कर्मों का कर्ता कौन है, इस पर ग़ौर करने की हम न ज़रूरत समझते हैं न हमें अवकाश मिलता है, क्योंकि कर्मों की एक अविरल श्रृंखला है।
आत्मज्ञान का मतलब हुआ कि आपको साफ़ पता हो कि कर्म के पीछे कौन है। आत्मज्ञान का मतलब होता है ठीक तब जब जीवन की गति चल रही है, आप उसके प्रति जागरूक हो जाएँ। और तब आप बिना उस गति को रोके भी उस गति से बाहर हो सकते हैं।
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने इस तथ्य पर रोशनी डाली है कि आत्मज्ञान का मतलब यह नहीं होता कि तुम आत्मा को जान गये, आत्मा के ज्ञान को आत्मज्ञान नहीं कहते। आत्मज्ञान का मतलब है अहंकार का ज्ञान। आत्मा का ज्ञान नहीं होता, आत्मा की अनुकम्पा से आत्मज्ञान होता है।
आत्मज्ञान आपको बताता है कि आप वृत्तियों के, गुण-दोषों के, अहंकार के पुतले मात्र हो। तो फिर अपने लिए कोई कामना करना व्यर्थ हो जाता है, तब आप निष्काम हो पाते हो। तो आत्मज्ञान से ही फिर निष्काम कर्म भी फलित होता है।
वेदान्त:
आत्म-जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य अपना सबसे कीमती संसाधन, अपना जीवन ही खोता चलता है। चिन्ता कर-करके कुछ हासिल भी कर लिया तो ये कभी नहीं समझ पाता कि जो हासिल किया उसकी कीमत क्या, और वह हासिल करने के लिए जो गँवाया, उसकी कीमत क्या! यही कारण है कि सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में आत्म-जिज्ञासा को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत वेदान्त के मूल सिद्धांतों को समझाते हैं और प्रमुख उपनिषद् सूत्रों में छुपे गूढ़ रहस्यों को सरलता के साथ उजागर करते हैं। यह पुस्तक एक भेंट है उनके लिए जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं, साथ-ही-साथ उनके लिए भी जिन्होंने अपनी यात्रा बस अभी शुरू ही की है।