सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! निरालम्ब उपनिषद् + श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1) [Hardbound] + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
निरालम्ब उपनिषद्:
वैदिक आध्यात्मिक साहित्य में उपनिषदों का स्थान शीर्ष है। इन्हें ही वेदान्त कहा गया है। ये कोई सामान्य, साधारण, मान्यता मूलक ग्रन्थ नहीं हैं, ये अतिविशिष्ट हैं। जैसे मन की सारी आध्यात्मिक यात्रा इन पर आकर रुक जानी हो, उसका अन्त हो जाना हो। इसलिए इनको कहा गया है वेदान्त।
यह निरालंब उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से लिया गया है। निरालंब का अर्थ होता है — बिना अवलंब के, बिना सहारे के। नाम से ही स्पष्ट है कि यह उपनिषद् किसी ऐसे की बात करने जा रहा है जो किसी पर अवलंबित नहीं है, आश्रित नहीं है।
क्यों आवश्यक है निरालंब की बात करना? क्योंकि जहाँ अवलंबन है, जहाँ कोई दूसरा है वहीं दुख है। और जहाँ निरालंब है, वहीं पूर्णता है, वहीं आनन्द है। हमारी चाहत होती है उसी अवस्था को पा लेने की जहाँ अब कोई धोखा नहीं है, जहाँ पूर्ण विश्रांति है।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने निरालंब उपनिषद् के प्रत्येक श्लोक का सरल और उपयोगी अर्थ किया है।
श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य:
श्रीमद्भगवद्गीता कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान मात्र नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा को सम्बोधित शब्द हैं।
गीता का जन्म शान्त मनोरम वन या आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ है। अर्जुन जीवन से विरक्त शिष्य नहीं जो संसार त्यागकर कृष्ण के पास आए हों। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म है तो दूसरी तरफ़ सम्बन्धियों और गुरुजनों का मोह; बड़ा कठिन है निर्णय लेना कि अपनों पर बाण चलाएँ या नहीं। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य है जो सुन तो रहा है, पर समझने को बहुत तत्पर नहीं। एक दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता श्रीकृष्ण के अर्जुन के अज्ञान के प्रति संघर्ष की गाथा है।
इस संघर्ष में श्रीकृष्ण के शस्त्र हैं वेदांत के सूत्र और सिद्धांत। गीता वेदांत की प्रस्थानत्रयी का प्रमुख स्तम्भ है। उपनिषदों के महावाक्य ही गीता में अत्यंत रोचक व व्यावहारिक रूप से उद्भूत होते हैं।
हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है; आम पाठक अर्जुन की स्थिति में अपनी छवि देख सकता है। यही बात हमारा एक विशिष्ट नाता जोड़ती है गीता से।
आचार्य प्रशांत का 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य' गीता का विशुद्ध वेदांतसम्मत अर्थ आप तक ला रहा है। एक-एक श्लोक की व्याख्या में शुद्धता को ही केंद्रीय वरीयता दी गयी है।
प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय पाँच से अठारह तक के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या संकलित है।