माया तजूँ तजि नहिं जाइ + मन मस्त हुआ + रहना नहीं देस बिराना है + चलना है दूर मुसाफ़िर + मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पाँच पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए पाँच पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! माया तजूँ तजि नहिं जाइ + मन मस्त हुआ + रहना नहीं देस बिराना है + चलना है दूर मुसाफ़िर + मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
माया तजूँ तजि नहिं जाइ
धन माया है! स्त्री माया है! घर-परिवार माया है!
यह पुस्तक 'माया' की पारंपरिक और वास्तविक समझ के अंतर को स्पष्ट करती है। यह माया को छोड़ने की नहीं, बल्कि उसे सही रूप में समझने की दिशा में ले जाती है, जिससे जीवन अधिक सहज और स्पष्ट बनता है।
मन मस्त हुआ
कबीर साहब का यह भजन आत्मबोध से मिलने वाली वास्तविक मस्ती और आनंद की ओर संकेत करता है। भजन को गाने मात्र से जो आनंद आता है, यह पुस्तक आपको उस आनंद की जड़ तक ले जाने का आमंत्रण है।
यदि आप इस मस्ती को सिर्फ़ छूना नहीं, जीना चाहते हैं, तो यह पुस्तक आपके लिए है।
रहना नहीं देस बिराना है
यह पुस्तक स्पष्ट करती है कि अध्यात्म संसार से भागना नहीं, बल्कि उसके साथ सही संबंध स्थापित करना है। यह जीवन को उसकी संपूर्ण गरिमा के साथ जीने की प्रेरणा देती है।
चलना है दूर मुसाफ़िर
जीवन एक अनवरत यात्रा है और मनुष्य उसका यात्री। यह पुस्तक माया-मोह की गाँठों को पहचानने और वेदांत की शिक्षा को जीवन में उतारने की स्पष्टता देती है।
मोको कहाँ ढूँढे रे बंदे
यह पुस्तक कबीर साहब के कालजयी भजन की व्याख्या के माध्यम से दिखाती है कि जिस सत्य की खोज हम बाहर करते हैं, वह हमारे भीतर ही है। यह पाठक को अपनी मान्यताओं और भ्रमों को पहचानने की दृष्टि देती है।