ख़ास पाठकों के लिए दो पुस्तकों का कॉम्बो भारी छूट पर! मन + वेदान्त + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
मन:
मन क्या है? मन अपनेआप में एक व्यवस्था है जिसमें तमाम विचारों और भावनाओं की लहरें उठती-गिरती रहती हैं। मन को वास्तव में कहीं पहुँचना नहीं है। बल्कि इच्छा करना, इच्छित वस्तु को पाना, भोगना, फिर असन्तुष्ट हो जाना, फिर इच्छा करना, इसी दुष्चक्र में घूमते रहना मन का प्रयोजन है। मन की प्राकृतिक व्यवस्था में ऊँचाई या गहराई के लिए कोई जगह नहीं है।
जहाँ तक हमारी बात है, हमारा प्रयोजन है एक आज़ाद और भरपूर जीवन जीना जिसमें कोई चक्रवत बाध्यता न हो। पर मन में उठती लहरें हमारे नियन्त्रण में नहीं होती हैं। मन हमसे पूछकर नहीं चल रहा होता। हाँ, हम ज़रूर मन के ग़ुलाम बन जाते हैं। तो मन के अनुसार चलने का मतलब ही है एक बहुत-बहुत गहरी ग़ुलामी।
प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत हमें बताते हैं कि मन की दासता में जीना कोई अनिवार्यता नहीं है। मन तो अहम् की छाया मात्र है, तुम अपनेआप को जैसे परिभाषित करोगे, तुम अपनी जो मान्यता रखोगे, मन वैसा ही हो जाएगा। तो मन की सूक्ष्मताओं को गहराई से समझने और आपको मन के पार ले जाने में यह पुस्तक अवश्य सहायक सिद्ध होगी।
वेदान्त:
आत्म-जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य अपना सबसे कीमती संसाधन, अपना जीवन ही खोता चलता है। चिन्ता कर-करके कुछ हासिल भी कर लिया तो ये कभी नहीं समझ पाता कि जो हासिल किया उसकी कीमत क्या, और वह हासिल करने के लिए जो गँवाया, उसकी कीमत क्या! यही कारण है कि सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में आत्म-जिज्ञासा को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।
इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत वेदान्त के मूल सिद्धांतों को समझाते हैं और प्रमुख उपनिषद् सूत्रों में छुपे गूढ़ रहस्यों को सरलता के साथ उजागर करते हैं। यह पुस्तक एक भेंट है उनके लिए जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं, साथ-ही-साथ उनके लिए भी जिन्होंने अपनी यात्रा बस अभी शुरू ही की है।