मैं बेकैद, मैं बेकैद | Main Bekaid, Main Bekaid [New Release]
बाबा बुल्लेशाह काव्य पर भाष्य
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Paperback Details
HindiLanguage
60Print Length
Description
हम संसार में सुख खोजने निकलते हैं, उसे पा भी लेते हैं, और पाकर खो भी देते हैं। और फिर से खोजने निकल पड़ते हैं। यह चक्र कभी थमता नहीं क्योंकि जो मिलता है वह राहत तो दे देता है पर पूर्ण संतुष्टि नहीं। यह संयोग नहीं है।
अधूरापन हमारे अस्तित्व की संरचना में ही निहित है। विचार, नाम, पहचान — जो कुछ भी मिलकर 'मैं' की रचना करते हैं, वही हमारी अदृश्य कैद बन जाते हैं।
अधिकांश मानवता इस कैद के सामने दो ही रास्ते देख पाई: कामना और अधूरेपन के कु-चक्र में यूँ ही जीते रहो, या फिर स्वर्ग और पुनर्जन्म की कल्पनाओं में सांत्वना खोजो कि जो इस जीवन में नहीं मिला, वह मृत्यु के बाद अवश्य मिलेगा। पर भारतीय दर्शन एक तीसरी संभावना तक पहुँचा—जीवनमुक्ति; जीते-जी इस 'मैं' का बेकैद हो जाना!
बाबा बुल्लेशाह के सूफ़ी काव्य "मैं बेकैद" की व्याख्या करते हुए आचार्य प्रशांत इसी संभावना को वेदांत की गहराइयों से उद्घाटित करते हुए इस अधूरेपन से मुक्ति का रास्ता दिखते हैं जो इसी जन्म में संभव है।
प्रस्तुत पुस्तक केवल दार्शनिक बोध नहीं, बल्कि पाठक के लिए एक जीवंत आमंत्रण है — अपनी कैद को पहचानने का, और उससे मुक्ति की दिशा में पहला कदम उठाने का।