लिखनी है नई कहानी + संकल्प + सही कर्म + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
तीन पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! लिखनी है नई कहानी + संकल्प + सही कर्म + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
लिखनी है नई कहानी:
जीवनपर्यंत मन किसी नये की तलाश में रहता है। उस तलाश को वो अक्सर ही किसी नये अनुभव, घर, गाड़ी इत्यादि से पूरी करने की अभिलाषा करता है।
नये की तलाश मन को अक्सर ही एक आशा में बाँध देती है कि यदि बाहर की स्थितियाँ बदल जाएँ तो भीतर की बेचैनी भी मिट जाएगी।
आचार्य प्रशांत छात्रों के साथ हुए संवादों के माध्यम से समझाते हैं कि मन की बेचैनी और ऊब बाहरी बदलावों से नहीं बल्कि भीतर से आत्मस्थ होकर जाती हैं।
आत्मस्थ होना ही एक नये जीवन, एक नयी कहानी की नींव है।
संकल्प:
हम सब अपने लिए कुछ लक्ष्य बनाते हैं, और उन्हें पूरा करने के लिए अनेक संकल्प उठाते हैं। बहुत बार उन संकल्पों को पूरा करके बाहर-बाहर हम बहुत कुछ अर्जित भी कर लेते हैं, पर क्या उससे भीतर का खालीपन मिट जाता है? क्या ऐसा होता है कि जो मिला है उससे और पाने की चाहत ही खत्म हो जाए? वो चाहतें दोबारा उठें ही न? हम एक संकल्प से दूसरे संकल्प पर दौड़ते रहते हैं लेकिन रुक कर यह नहीं पूछते कि संकल्प खुद पूरा होकर भी क्या हमें पूरा कर पा रहा है?
यह पुस्तक व्यक्ति को इन मूल प्रश्नों की ओर लेकर आती है जिससे कि उसके संकल्प समझ और बोध से उठें, अज्ञानता और बाहरी प्रभावों के कारण नहीं। पुस्तक के माध्यम से आचार्य जी ने सही संकल्प से जुड़ी कुछ भ्रांतियों और चुनौतियों पर भी मार्गदर्शन किया है।
सही कर्म:
यह एक प्रश्न हर मनुष्य किसी-न-किसी तरीक़े से पूछता है कि मेरे लिए सही काम क्या है। यह प्रश्न आवश्यक भी है क्योंकि मनुष्य करने के लिए जो काम चुन लेता है, वही काम फिर उसके जीवन की गुणवत्ता और मंज़िल भी निर्धारित कर देता है। तो एक मायने में कहा जा सकता है कि काम ही जीवन है – सही काम माने सार्थक जीवन और ग़लत काम माने बर्बाद जीवन। आम जन में कर्म को लेकर यह भ्रान्त अवधारणा होती है कि कर्म इसलिए होता है कि हम रोटी कमा सकें, घर बना सकें या पैसा और रुतबा पा सकें। जिनकी भी थोड़ी सूक्ष्म दृष्टि रही है, उन्होंने कर्म से पहले कर्ता को देखा है। और कर्ता (अहम्) का बड़े-से-बड़ा हित यही है कि वो अपनी नियति तक पहुँच जाए, मुक्ति पा जाए।
प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत ने स्पष्ट रूप से बताया है कि सही कर्म का एकमात्र यही अर्थ है कि जो बन्धन में है वो कुछ ऐसा काम चुने जो उसके बन्धनों को काटे और उसे उसकी मूलग्रन्थि से मुक्त करे।