कठोपनिषद् भाग - 3 (Kathopanishad Bhaag - 3) [नवीन प्रकाशन]
श्लोक 1.2.1 - 1.2.17 पर भाष्य
5/5
1 Ratings
Gifting available for eBook & AudiobookAdd to cart and tap ‘Send as a Gift’
Paperback Details
HindiLanguage
344Print Length
Description
कठोपनिषद् मात्र एक प्राचीन ग्रंथ नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और मृत्यु के बीच घटित सबसे साहसी संवादों में से एक है। यह कथा है बालक नचिकेता की, जिसने सुख-सुविधाओं के प्रलोभनों को ठुकराकर स्वयं काल की आँखों में झाँकने का साहस किया। प्रस्तुत पुस्तक कठोपनिषद् की कथा भर नहीं है; यह मनुष्य के भीतर प्रतिदिन घटने वाले उस निर्णायक क्षण की पुस्तक है, जहाँ उसे चुनना होता है — श्रेय या प्रेय, सत्य या सुविधा, बोध या बहाव।
आचार्य प्रशांत की व्याख्या में नचिकेता कोई प्राचीन पात्र नहीं रह जाते; वे आज के हर उस व्यक्ति का प्रतीक बन उठते हैं जो सफलता, सुरक्षा और सुख-सुविधा के वादों के बीच भी भीतर एक गहरा अधूरापन अनुभव करता है। यम भी यहाँ केवल मृत्यु के देवता नहीं हैं; वे उस अंतिम प्रश्न का रूप हैं जिससे बचकर हम जीना चाहते हैं — मैं सच में क्या चाहता हूँ, और किस कीमत पर?
आज का मनुष्य उपभोग, भीड़-अनुकरण, मानसिक चंचलता और उधार की मान्यताओं से घिरा हुआ है। कठोपनिषद् शृंखला के तीसरे भाग में श्लोक 1.2.1 से 1.2.17 पर आचार्य प्रशांत की ये टिप्पणियाँ पाठक को ऐसी दृष्टि देती हैं, जिससे वह क्षणिक आकर्षण और वास्तविक कल्याण में भेद कर सके; दूसरों द्वारा गढ़ी हुई ज़िंदगी से बाहर आ सके; और अपने भीतर उस केंद्र को पहचान सके जहाँ से स्पष्टता, साहस और शांति जन्म लेते हैं।
यह पुस्तक मृत्यु के बारे में नहीं, सही अर्थों में जीने के बारे में है। यदि आप भी दुनिया के प्रलोभनों से थक चुके हैं और अब सत्य के साथ समझौता नहीं करना चाहते, तो यह पुस्तक आपके लिए है।