ताओ ते चिंग - भाग 1 + श्रीमद्भगवद्गीता भाग 1 [Hardbound] + कठोपनिषद् (भाग - 1) + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 + शून्यता सप्तति + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

ताओ ते चिंग - भाग 1 + श्रीमद्भगवद्गीता भाग 1 [Hardbound] + कठोपनिषद् (भाग - 1) + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 + शून्यता सप्तति + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

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Description
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ताओ ते चिंग - भाग 1 + श्रीमद्भगवद्गीता भाग 1 [Hardbound] + कठोपनिषद् (भाग - 1) + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 + शून्यता सप्तति + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।

ताओ ते चिंग - भाग 1:

प्रस्तुत पुस्तक एक अनूठी पुस्तक है जो विश्व के प्राचीन ग्रंथों में से एक "ताओ ते चिंग" पर आचार्य प्रशांत के प्रवचनों को संकलित करती है। ताओवाद कोई आयोजित धर्म नहीं है, वो एक तरह की जीवन-पद्धति है। ताओवाद कहता है, ‘यदि जीवन में शुभता लानी है तो प्रकृति के पीछे क्या है, प्रकृति का आधार क्या है, उसको समझना पड़ेगा।’ वेदान्त का प्रतिपाद्य विषय भी जिज्ञासा है, जानना है।

आचार्य प्रशांत ने इस पुस्तक के माध्यम से “ताओ ते चिंग” के रहस्यमयी सूत्रों को वेदान्त के प्रकाश में आज के संदर्भ में सरल और सहज भाषा में समझाया है, जिससे पाठक इस प्राचीन ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसात कर सकें। यह पुस्तक ताओवाद की शिक्षाओं को वर्तमान जीवन की चुनौतियों और आवश्यकताओं के प्रति अत्यधिक प्रासंगिक बनाती है। इस पुस्तक में “ताओ ते चिंग” से पहले 10 सूत्रों पर व्याख्या को संकलित किया गया है।

श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य:

श्रीमद्भगवद्गीता कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान मात्र नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा को सम्बोधित शब्द हैं।

गीता का जन्म शान्त मनोरम वन या आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ है। अर्जुन जीवन से विरक्त शिष्य नहीं जो संसार त्यागकर कृष्ण के पास आए हों। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म है तो दूसरी तरफ़ सम्बन्धियों और गुरुजनों का मोह; बड़ा कठिन है निर्णय लेना कि अपनों पर बाण चलाएँ या नहीं। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य है जो सुन तो रहा है, पर समझने को बहुत तत्पर नहीं। एक दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता श्रीकृष्ण के अर्जुन के अज्ञान के प्रति संघर्ष की गाथा है।

इस संघर्ष में श्रीकृष्ण के शस्त्र हैं वेदांत के सूत्र और सिद्धांत। गीता वेदांत की प्रस्थानत्रयी का प्रमुख स्तम्भ है। उपनिषदों के महावाक्य ही गीता में अत्यंत रोचक व व्यावहारिक रूप से उद्भूत होते हैं।

हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है; आम पाठक अर्जुन की स्थिति में अपनी छवि देख सकता है। यही बात हमारा एक विशिष्ट नाता जोड़ती है गीता से।

आचार्य प्रशांत का 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य' गीता का विशुद्ध वेदांतसम्मत अर्थ आप तक ला रहा है। एक-एक श्लोक की व्याख्या में शुद्धता को ही केंद्रीय वरीयता दी गयी है।

प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय पाँच से अठारह तक के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या संकलित है।

कठोपनिषद् (भाग - 1):

कठ उपनिषद् उन उपनिषदों की सूची में है जो न केवल सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं बल्कि सर्वाधिक प्रसिद्ध भी हैं। यह कृष्ण यजुर्वेद शाखा से सम्बन्धित है। इस उपनिषद् में उद्दालक के पुत्र नचिकेता और यम के बीच संवाद है जिसे एक कथा के रूप में लिखा गया है।

कथा की शुरुआत होती है ऋषि उद्दालक के सर्वमेध यज्ञ से जिसमें वो ब्राह्मणों को बूढ़ी गायें दान देते हैं। यह बात बालक नचिकेता को अनुचित लगती है और वो जाकर पिता से जिज्ञासा करते हैं, 'हे तात! आप मुझे किसे दान में देंगे?' बार-बार पुत्र से यह प्रश्न सुनकर पिता क्रोधित होकर कहते हैं, 'जा, तुझे मृत्यु को दिया।' यह सुन नचिकेता चुपचाप यम के द्वार चले जाते हैं और बिना कुछ खाये-पिये तीन दिन तक यमराज की प्रतीक्षा करते हैं। यमराज नचिकेता की सरलता और धैर्य से प्रसन्न होकर उन्हें तीन वर माँगने को कहते हैं।

नचिकेता तीन वर के माध्यम से जीवन और मृत्यु से जुड़े कुछ सवालों के जवाब चाहते हैं और इनसे जुड़े रहस्यों को बताने की माँग करते हैं, जिन्हें जानना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है क्योंकि इन्हीं तीनों वर से उसके कर्तव्य निर्धारित होते हैं।

यह पुस्तक आपकी इस जिज्ञासा का भी उत्तर देती है कि यह कथा हमसे कैसे जुड़ी हुई है और नचिकेता, यमराज और ऋषि उद्दालक किनके प्रतीक हैं।

कठोपनिषद् पर चल रही एक विशेष चर्चा श्रृंखला में आचार्य प्रशांत ने एक-एक श्लोक पर विस्तार से व्याख्या की है, जिनमें से इस पुस्तक में श्लोक 9 तक की व्याख्या को सम्मिलित किया गया है।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (1-2):

अद्वैत वेदांत के उच्चतम ग्रंथों में है अष्टावक्र गीता। इसमें अद्वैत ज्ञान का निरूपण भी है, मुक्ति के चरणबद्ध उपाय भी हैं और एक ब्रह्मज्ञानी की बात भी है।

राजा जनक एक काबिल शासक हैं। जो सभी प्रकार से सम्पन्न और प्रसन्न हैं; पर फिर भी एक आंतरिक अपूर्णता सताती है। इसलिए समाधान के लिए ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं, जिनकी उम्र मात्र ग्यारह वर्ष है।

राजा जनक का प्रश्न होता है — वैराग्य कैसे हो? मुक्ति कैसे मिले?

चूँकि ग्रंथ की शुरुआत ही तात्विक जिज्ञासा से होती है इसलिए अष्टावक्र की बात श्लोक दर श्लोक बहुत गहराई तक जाती है। अष्टावक्र का प्रत्येक श्लोक इतना सशक्त और सटीक होता है कि प्रथम अध्याय के अंत में ही राजा जनक मुक्त हो जाते हैं। इस पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने प्रथम दो प्रकरण के प्रत्येक श्लोक की सरल व उपयोगी व्याख्या प्रस्तुत किया है।

प्रथम प्रकरण की विषयवस्तु

शिष्य एक संसारी है। इसलिए बात की शुरुआत होती है आचरण के तल से। फिर इसके पश्चात बात खुलती है आत्मज्ञान की।

अष्टावक्र आसक्ति को बंधन व निरपेक्ष दर्शन को मुक्ति का रहस्य बताते हैं।

द्वितीय प्रकरण की विषयवस्तु

राजा जनक अब मुक्त हो चुके हैं। प्रकरण की शुरुआत ही उनकी उद्घोषणा से होती है; "अहो! मुक्ति इतनी सहज थी, मैं अब तक समझ क्यों न सका?" राजा जनक स्वयं को बोध स्वरूप जानने लगे और स्वयं के शरीर और मन ऐसे देखने लगे जैसे वो कोई स्वतंत्र इकाई हों।

शून्यता सप्तति:

वेदान्त की बात जितनी स्पष्टता से महात्मा बुद्ध के दर्शन में उभरकर आती है, उतनी स्पष्टता से शायद कहीं और नहीं। और बुद्ध की वाणी सबसे ज़्यादा साफ़ होकर सुनाई देती है आचार्य नागार्जुन में।

‘शून्यता सप्तति’ आचार्य नागार्जुन द्वारा रचित ग्रंथ है, जो मानव के मूल दुख को संबोधित करता है। शून्यता पर आधारित यह ग्रंथ हमारी मान्यताओं और मन में उठ रहे कुतर्कों पर सवाल करता है।

आचार्य नागार्जुन की सारी बात शून्यता की थी। और आचार्य नागार्जुन तथ्यों की दुनिया में भी गहरी पैठ रखते थे — वो रसायनविद् थे, खगोलशास्त्री थे और तंत्रविद्या का भी गहरा ज्ञान रखते थे। आचार्य नागार्जुन ने तर्क को बड़ा महत्व दिया है, और तर्क की दुनिया में पूरे विश्व में उनका नाम बहुत-बहुत सम्मान से लिया जाता है।

मूल 'शून्यता सप्तति' ग्रंथ में कुल तिहत्तर छंद हैं। प्रस्तुत पुस्तक में प्रथम बारह छंदों पर आचार्य जी के व्याख्यानों को संकलित किया गया है। आचार्य जी ने एक-एक छंद को आज के परिप्रेक्ष्य में व‌ आपके जीवन से जोड़कर अत्यंत व्यावहारिक रूप से समझाया है, जिससे यह अमूल्य आध्यात्मिक ज्ञान आम जनमानस के लिए भी सहज और बोधगम्य हो जाता है।
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