श्रीमद्भगवद्गीता भाग 1 [Hardbound] + कठोपनिषद् (भाग - 1) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 1-2) + निरालम्ब उपनिषद् + हनुमान चालीसा का वेदान्तिक अर्थ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पाँच पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
सभी पाठकों के लिए पाँच पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! श्रीमद्भगवद्गीता भाग 1 [Hardbound] + कठोपनिषद् (भाग - 1) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 1-2) + निरालम्ब उपनिषद् + हनुमान चालीसा का वेदान्तिक अर्थ + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य:
श्रीमद्भगवद्गीता कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान मात्र नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा को सम्बोधित शब्द हैं।
गीता का जन्म शान्त मनोरम वन या आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ है। अर्जुन जीवन से विरक्त शिष्य नहीं जो संसार त्यागकर कृष्ण के पास आए हों। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म है तो दूसरी तरफ़ सम्बन्धियों और गुरुजनों का मोह; बड़ा कठिन है निर्णय लेना कि अपनों पर बाण चलाएँ या नहीं। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य है जो सुन तो रहा है, पर समझने को बहुत तत्पर नहीं। एक दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता श्रीकृष्ण के अर्जुन के अज्ञान के प्रति संघर्ष की गाथा है।
इस संघर्ष में श्रीकृष्ण के शस्त्र हैं वेदांत के सूत्र और सिद्धांत। गीता वेदांत की प्रस्थानत्रयी का प्रमुख स्तम्भ है। उपनिषदों के महावाक्य ही गीता में अत्यंत रोचक व व्यावहारिक रूप से उद्भूत होते हैं।
हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है; आम पाठक अर्जुन की स्थिति में अपनी छवि देख सकता है। यही बात हमारा एक विशिष्ट नाता जोड़ती है गीता से।
आचार्य प्रशांत का 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य' गीता का विशुद्ध वेदांतसम्मत अर्थ आप तक ला रहा है। एक-एक श्लोक की व्याख्या में शुद्धता को ही केंद्रीय वरीयता दी गयी है।
प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय पाँच से अठारह तक के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या संकलित है।
कठोपनिषद् भाष्य:
कठ उपनिषद् उन उपनिषदों की सूची में है जो न केवल सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं बल्कि सर्वाधिक प्रसिद्ध भी हैं। यह कृष्ण यजुर्वेद शाखा से सम्बन्धित है। इस उपनिषद् में उद्दालक के पुत्र नचिकेता और यम के बीच संवाद है जिसे एक कथा के रूप में लिखा गया है।
कथा की शुरुआत होती है ऋषि उद्दालक के सर्वमेध यज्ञ से जिसमें वो ब्राह्मणों को बूढ़ी गायें दान देते हैं। यह बात बालक नचिकेता को अनुचित लगती है और वो जाकर पिता से जिज्ञासा करते हैं, 'हे तात! आप मुझे किसे दान में देंगे?' बार-बार पुत्र से यह प्रश्न सुनकर पिता क्रोधित होकर कहते हैं, 'जा, तुझे मृत्यु को दिया।' यह सुन नचिकेता चुपचाप यम के द्वार चले जाते हैं और बिना कुछ खाये-पिये तीन दिन तक यमराज की प्रतीक्षा करते हैं। यमराज नचिकेता की सरलता और धैर्य से प्रसन्न होकर उन्हें तीन वर माँगने को कहते हैं।
नचिकेता तीन वर के माध्यम से जीवन और मृत्यु से जुड़े कुछ सवालों के जवाब चाहते हैं और इनसे जुड़े रहस्यों को बताने की माँग करते हैं, जिन्हें जानना हर व्यक्ति के लिए अनिवार्य है क्योंकि इन्हीं तीनों वर से उसके कर्तव्य निर्धारित होते हैं।
यह पुस्तक आपकी इस जिज्ञासा का भी उत्तर देती है कि यह कथा हमसे कैसे जुड़ी हुई है और नचिकेता, यमराज और ऋषि उद्दालक किनके प्रतीक हैं।
कठोपनिषद् पर चल रही एक विशेष चर्चा श्रृंखला में आचार्य प्रशांत ने एक-एक श्लोक पर विस्तार से व्याख्या की है, जिनमें से इस पुस्तक में श्लोक 9 तक की व्याख्या को सम्मिलित किया गया है।
अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (1-2):
अद्वैत वेदांत के उच्चतम ग्रंथों में है अष्टावक्र गीता। इसमें अद्वैत ज्ञान का निरूपण भी है, मुक्ति के चरणबद्ध उपाय भी हैं और एक ब्रह्मज्ञानी की बात भी है।
राजा जनक एक काबिल शासक हैं। जो सभी प्रकार से सम्पन्न और प्रसन्न हैं; पर फिर भी एक आंतरिक अपूर्णता सताती है। इसलिए समाधान के लिए ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं, जिनकी उम्र मात्र ग्यारह वर्ष है।
राजा जनक का प्रश्न होता है — वैराग्य कैसे हो? मुक्ति कैसे मिले?
चूँकि ग्रंथ की शुरुआत ही तात्विक जिज्ञासा से होती है इसलिए अष्टावक्र की बात श्लोक दर श्लोक बहुत गहराई तक जाती है। अष्टावक्र का प्रत्येक श्लोक इतना सशक्त और सटीक होता है कि प्रथम अध्याय के अंत में ही राजा जनक मुक्त हो जाते हैं। इस पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने प्रथम दो प्रकरण के प्रत्येक श्लोक की सरल व उपयोगी व्याख्या प्रस्तुत किया है।
प्रथम प्रकरण की विषयवस्तु
शिष्य एक संसारी है। इसलिए बात की शुरुआत होती है आचरण के तल से। फिर इसके पश्चात बात खुलती है आत्मज्ञान की।
अष्टावक्र आसक्ति को बंधन व निरपेक्ष दर्शन को मुक्ति का रहस्य बताते हैं।
द्वितीय प्रकरण की विषयवस्तु
राजा जनक अब मुक्त हो चुके हैं। प्रकरण की शुरुआत ही उनकी उद्घोषणा से होती है; "अहो! मुक्ति इतनी सहज थी, मैं अब तक समझ क्यों न सका?" राजा जनक स्वयं को बोध स्वरूप जानने लगे और स्वयं के शरीर और मन ऐसे देखने लगे जैसे वो कोई स्वतंत्र इकाई हों।
निरालम्ब उपनिषद्:
वैदिक आध्यात्मिक साहित्य में उपनिषदों का स्थान शीर्ष है। इन्हें ही वेदान्त कहा गया है। ये कोई सामान्य, साधारण, मान्यता मूलक ग्रन्थ नहीं हैं, ये अतिविशिष्ट हैं। जैसे मन की सारी आध्यात्मिक यात्रा इन पर आकर रुक जानी हो, उसका अन्त हो जाना हो। इसलिए इनको कहा गया है वेदान्त।
यह निरालंब उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से लिया गया है। निरालंब का अर्थ होता है — बिना अवलंब के, बिना सहारे के। नाम से ही स्पष्ट है कि यह उपनिषद् किसी ऐसे की बात करने जा रहा है जो किसी पर अवलंबित नहीं है, आश्रित नहीं है।
क्यों आवश्यक है निरालंब की बात करना? क्योंकि जहाँ अवलंबन है, जहाँ कोई दूसरा है वहीं दुख है। और जहाँ निरालंब है, वहीं पूर्णता है, वहीं आनन्द है। हमारी चाहत होती है उसी अवस्था को पा लेने की जहाँ अब कोई धोखा नहीं है, जहाँ पूर्ण विश्रांति है।
हनुमान चालीसा का वेदान्तिक अर्थ:
आप हनुमान जी को बस ऐसे सोचो कि 'भूत पिशाच निकट नहीं आवे, महावीर जब नाम सुनावे' — माने रास्ते में जा रहे हैं और भूतों से बहुत डर लगता है तो बीच-बीच में पाठ करते रहते हैं — तो ये दुरूपयोग कर लिया हनुमान का। फिर आप समझे ही नहीं कि हनुमान किसके प्रतीक हैं। धर्म में सिर्फ़ प्रतीक होते हैं, तथ्य तो वहाँ होते ही नहीं। और उन प्रतीकों को पढ़ना पड़ता है, देखना पड़ता है कि इनका इशारा किधर को है। जो इशारा नहीं समझते, उनके लिए बड़ी मुश्किल हो जाती है।
बहुत लोग हैं पश्चिम में जो कहते हैं कि भारतीय वानरों की पूजा करते हैं, 'द मंकी गॉड'। उनको नहीं समझ में आ रहा कि क्या दिखाया जा रहा है, क्योंकि वानर हम सब हैं। शरीर से हम सब बिलकुल वानर ही हैं पर वानर होते हुए भी कैसे राम की ओर बढ़ा जा सकता है, इसके प्रतीक हैं हनुमान, 'मंकी गॉड' नहीं हैं। अब ये जाने बिना हनुमान भक्ति कर रहे हो तो क्या कर रहे हो? बस वही कि परीक्षा में पास करवा देना, नौकरी दिला देना, पत्नी दिला देना, या और कामनाएँ। उसमें क्या है?
जब तक उनके वानर रूप का अर्थ नहीं जाना, जब तक ये नहीं जाना कि हम सब वानर हैं और वानर होते हुए भी हृदय में राम हो सकते हैं, तब तक हनुमान आपके लिए सार्थक नहीं हुए। और सिर्फ़ वेदान्त के ही आधार पर किसी भी बात की, कथा की या दर्शन की व्याख्या की जा सकती है। वेदान्त कुंजी है, उसी से सारे ताले खुलेंगे। वेदान्त ये नहीं कह रहा कि बाकी दरवाज़ों पर मत जाओ, सिर्फ़ एक दरवाज़े से प्रवेश करो; वेदान्त कह रहा है सब दरवाज़ों पर जाओ लेकिन कुंजी यहाँ से मिलेगी। वो कुंजी नहीं ली तो कोई दरवाज़ा नहीं खुलेगा तुम्हारे लिए। वेदान्त अपनेआप में कुछ है नहीं, एक कुंजी भर है। वो कुंजी ले लो फिर तुम्हें जिस धारा में प्रवेश करना हो, कर लो।