सभी पाठकों के लिए दो पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! ज्वाला + ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
ज्वाला:
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन महापुरुषों के जीवन के उस संघर्ष से हम सबको परिचित करा रहे हैं, जो आम जनमानस तक आज तक नहीं पहुँच पाया है। आज भले ही हमने उन्हें महापुरुष कहकर सम्मानित किया है लेकिन जीवित रहते हुए उन्होंने केवल बाहरी ताकतों से ही नहीं, बल्कि सालों से हमारे अपने समाज द्वारा आत्मसात की गई रूढ़ियों, अंधविश्वास और ग़ुलामी की वृत्ति से लड़ाई की ताकि हम बंधनमुक्त और गरिमापूर्ण जीवन की ओर अग्रसर हो सकें।
ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण:
यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
भगवद्गीता के चौथे अध्याय के प्रसिद्ध श्लोकों में से हैं श्लोक क्रमांक 7 से 11। इन श्लोकों ने आमजन के बीच जितनी प्रसिद्धि पाई है, उतना ही इनके अर्थ को विकृत भी किया गया है।
प्रचलित अर्थ कहता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सिर चढ़कर नाचता है, तब-तब कृष्ण प्रकट होते हैं। जिसका अर्थ हमने ये कर लिया है कि कोई हमसे ऊँचा, हमसे अधिक सामर्थ्यवान कहीं बाहर से आएगा हमारे जीवन से अधर्म को मिटाने के लिए। ऐसा मानकर हमने स्वयं को अपने जीवन के प्रति ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया है।
वेदांत कहता है — कोई नहीं है बाहर; तुम्हारा जीवन, तुम्हारी ज़िम्मेदारी, तुम्हारा चुनाव। तुम चाहो तो कृष्ण प्रकट होंगे, लेकिन बाहर से नहीं, तुम्हारे ही भीतर से। किसी बाहरवाले की प्रतीक्षा करने का एक ही कारण है — बाहरी और आंतरिक, दोनों रूप से सही ज्ञान का अभाव।
अधर्म तो चारों तरफ़ पसरा हुआ है, मूल बात है — क्या हमें दिखाई देता है?
हमारे भीतर ये आत्मज्ञान का अभाव है या कहें कि अज्ञान का अंधकार है कि सामने इतना अधर्म होते हुए भी हमें कुछ दिखाई नहीं देता। वेदांत ‘मैं’ की बात करता है, हमारे भीतर के इसी अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए हमें इन श्लोकों के वेदांत सम्मत अर्थ को समझना बहुत आवश्यक है। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत इन श्लोकों के सही व उपयोगी अर्थ को वेदांत के प्रकाश में समझा रहे हैं जो कि हम सबको समझना बहुत आवश्यक है।