जो मैं बौरा तो राम तोरा (Jo Main Baura To Ram Tora) [नवीन प्रकाशन]

जो मैं बौरा तो राम तोरा (Jo Main Baura To Ram Tora) [नवीन प्रकाशन]

संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
Hindi Language
128 Print Length
Description
अहंकार ऊँचाई तो चाहता है, पर उसे अपनी शर्तों पर पाना चाहता है। नतीजा होता है कि निर्णय उलझते हैं, रिश्ते बोझिल होते हैं, और भीतर एक बेचैनी बनी रहती है।

संत कबीर के प्रसिद्ध भजन की वेदान्तिक व्याख्या के माध्यम से आचार्य प्रशांत हमारे इसी अहंकार की परतों को खोलते हैं, जिसे हम अक्सर अपनी ‘मर्ज़ी' या 'स्वतंत्र इच्छा' समझ लेते हैं। वे बताते हैं कि जिसे हम अपना 'स्वभाव' कहते हैं, वह अक्सर पुरानी आदतों, सामाजिक दबावों और जैविक संस्कारों के हाथों की कठपुतली मात्र है। उसकी समस्या ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि ये है कि वह ज्ञान को भी अपनी कहानी में खपा लेता है।

आचार्य प्रशांत भजन के 'मर्म' को आज की सरल भाषा में समझाते हुए हमें दो केंद्रों के बीच चुनाव पर खड़ा करते हैं:

आम केंद्र: जहाँ हम अपनी असुरक्षाओं, समाज की दी हुई झूठी इज़्ज़त और अपनी ही रची कहानियों के सहारे जीते हैं ताकि हमें कभी बदलना न पड़े।

राम केंद्र: वह केंद्र जहाँ जीवन में स्पष्टता और वास्तविक स्वतंत्रता आती है, जो हमें डरों और बाहरी पहचान के भारी बोझ से मुक्त करती है।

प्रस्तुत पुस्तक आपको अपनी ही धारणाओं, मान्यताओं और बाहरी परतों को पहचानने का साहस देती है, ताकि निर्णय अधिक साफ़ हों, और जीवन कहानी नहीं, स्पष्टता से संचालित हो। अहंकार की इन पुरानी परतों को उतारना और खुद का सामना करना अकेले कठिन लग सकता है। लेकिन संतों का साथ इस मार्ग को सुगम बना देता है।
Index
CH1
सत्य के लिए बौरापन
CH2
देह, मन, संसार — मुक्ति का माध्यम
CH3
तथ्य और कल्पना: अहंकार का जगत बनाम वास्तविक जगत
CH4
सच्ची भक्ति इतनी विरल क्यों?
CH5
अहंकार बनाम आत्मज्ञान: बोध की यात्रा
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