जिन सतगुरु पहचाना नहीं | Jin Satguru Pehchana Nahi [New Release]
संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
HindiLanguage
88Print Length
Description
कबीर साहब का भजन “जिन सतगुरु पहचाना नहीं” मनुष्य की उस गहरी भटकन पर चोट करता है जिसमें वह शांति, मुक्ति और सत्य तो चाहता है, पर उन्हें पहचान नहीं पाता।
प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इस प्रसिद्ध भजन की व्याख्या करते हैं जिसका केंद्रीय संदेश यही है: समस्या चाह की कमी नहीं, पहचान की कमी है। “जिन सतगुरु पहचाना नहीं” का गहरा आशय बाहरी गुरु की पहचान भर नहीं है। आचार्य प्रशांत पुस्तक में स्पष्ट करते हैं कि सतगुरु को पहचानने की पहली शर्त है अपनी बीमारी/समस्या को पहचानना। जब तक मनुष्य भीतर पराश्रयता, भय, भ्रम और आदतों से संचालित होने की वृत्ति को नहीं देखता, तब तक वह सही गुरु, सही ज्ञान या सही मार्ग भी कैसे पहचान सकता है? अपनी समस्या का ईमानदार अवलोकन ही उपचार का आरंभ है। सही गुरु की पहचान, स्वयं की सही पहचान से ही शुरू होती है।
यह पुस्तक आपको किसी बाहरी सहारे की ओर नहीं, स्वयं को साफ़-साफ़ देखने की ओर आमंत्रित करती है। ऐसी स्पष्टता जिसके बाद बेचैनी समस्या नहीं बचती, बल्कि मार्गदर्शन की शुरुआत बन जाती है।