श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1) [Hardbound] + दुर्गासप्तशती + योगवासिष्ठ सार + वेदान्त + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

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श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1) [Hardbound]:

श्रीमद्भगवद्गीता कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान मात्र नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा को सम्बोधित शब्द हैं।

गीता का जन्म शान्त मनोरम वन या आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ है। अर्जुन जीवन से विरक्त शिष्य नहीं जो संसार त्यागकर कृष्ण के पास आए हों। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म है तो दूसरी तरफ़ सम्बन्धियों और गुरुजनों का मोह; बड़ा कठिन है निर्णय लेना कि अपनों पर बाण चलाएँ या नहीं। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य है जो सुन तो रहा है, पर समझने को बहुत तत्पर नहीं। एक दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता श्रीकृष्ण के अर्जुन के अज्ञान के प्रति संघर्ष की गाथा है।

इस संघर्ष में श्रीकृष्ण के शस्त्र हैं वेदांत के सूत्र और सिद्धांत। गीता वेदांत की प्रस्थानत्रयी का प्रमुख स्तम्भ है। उपनिषदों के महावाक्य ही गीता में अत्यंत रोचक व व्यावहारिक रूप से उद्भूत होते हैं।

हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है; आम पाठक अर्जुन की स्थिति में अपनी छवि देख सकता है। यही बात हमारा एक विशिष्ट नाता जोड़ती है गीता से।

आचार्य प्रशांत का 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य' गीता का विशुद्ध वेदांतसम्मत अर्थ आप तक ला रहा है। एक-एक श्लोक की व्याख्या में शुद्धता को ही केंद्रीय वरीयता दी गयी है।

प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के प्रथम चार अध्याय के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या संकलित है।

दुर्गासप्तशती:

देशभर में नवरात्रि तो बड़े धूमधाम से मनायी जाती है, पर क्या हम इस पर्व के मर्म को समझते हैं? हम जिन दुर्गा माँ की पूजा करते हैं अर्थात् महिषासुरमर्दिनी, उनका चरित्र कहाँ से आया है? ये असुर और उनका संहार करने वाली माँ किनके प्रतीक हैं? यह असुर संहार हमारे दैनिक जीवन से कैसे संबंधित है? इन सबका उत्तर है श्रीदुर्गासप्तशती ग्रंथ।

श्रीदुर्गासप्तशती में तेरह अध्याय और सात-सौ श्लोक हैं। इनमें तीन चरित्र हैं अर्थात् तीन तरह के राक्षस जो हमारे तीन तरह के अज्ञान — दम्भ, मद और मोह के प्रतीक हैं। इन राक्षसों का संहार करने वाली देवी प्रकृति के तीन गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। आचार्य जी ने तीनों चरित्रों को बड़े सरल, सुगम भाषा में विस्तृत और रोचक तरीके से समझाया है। यह पुस्तक आपको देवी उपासना के महत्व को तो बताएगी ही, साथ-ही-साथ देवी उपासना, जो केवल कर्मकांड और पाखंड से भरपूर एक हुल्लड़बाज़ी बन गयी है, उसके विपरीत आपके हृदय में माँ दुर्गा के प्रति एक सच्ची श्रद्धा जागृत करने में सहायक होगी। और आप यह समझ पाएँगे कि देवी जिन असुरों का संहार करती हैं वो और कोई नहीं बल्कि हमारी ही वृत्ति और कुत्सित वासनाएँ हैं।

योगवासिष्ठ सार:

हमने अब तक श्रीराम को रामायण से ही जाना है, जिसमें श्रीराम को हमने एक आज्ञाकारी बेटा, एक प्रजाहितैषी राजा और एक मर्यादापुरुष की तरह जाना है।

पर क्या हमने जाना है कि श्रीराम को आध्यात्मिक शिक्षा कहाँ से मिली थी? उनको अवतार क्यों कहा जाता है? वो इतने महान क्यों थे?

जिस प्रकार कृष्ण को समझने के लिए गीता चाहिए, उसी तरह राम को पूरी तरह समझने के लिए 'योगवासिष्ठ सार' चाहिए।

रामायण से निश्चित रूप से हमें भगवान राम के जीवन को जानने का मौक़ा मिलता है पर श्रीराम से जुड़ी जो मूल आध्यात्मिक शिक्षा है, वह 'योगवासिष्ठ सार' के माध्यम से हम तक पहुँचती है।

जिस प्रकार युवा सिद्धार्थ के मन में जीवन और संसार के प्रति गहन प्रश्न और वैराग्य का भाव उठा था, उसी तरह श्रीराम भी अपनी युवावस्था में व्याकुल और बेचैन हुए थे। उनके मन में भी जीवन के प्रति गहन जिज्ञासा उठी थी।

'योगवासिष्ठ सार' युवा राम और उनके गुरु महर्षि वसिष्ठ के संवाद का संग्रह है। यह ग्रन्थ बताता है कि एक युवक राजकुमार मर्यादापुरुषोत्तम राम कैसे बने।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य जी ने महर्षि वसिष्ठ की शिक्षाओं और उनके दर्शन की सरल व्याख्या की है।

'योगवासिष्ठ सार' को समझे बिना आपका राम के प्रति प्रेम अधूरा ही रहेगा। यदि आप वाकई जानना चाहते हैं कि राम का नाम इतना ऊँचा और इतना पवित्र क्यों है, और उनकी महानता किसमें है, तो यह पुस्तक ज़रूर पढ़ें।

वेदान्त:

आत्म-जिज्ञासा के अभाव में मनुष्य अपना सबसे कीमती संसाधन, अपना जीवन ही खोता चलता है। चिन्ता कर-करके कुछ हासिल भी कर लिया तो ये कभी नहीं समझ पाता कि जो हासिल किया उसकी कीमत क्या, और वह हासिल करने के लिए जो गँवाया, उसकी कीमत क्या! यही कारण है कि सनातन धर्म के प्रमुख ग्रंथों में आत्म-जिज्ञासा को सबसे ऊँचा स्थान दिया गया है।

इस पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत वेदान्त के मूल सिद्धांतों को समझाते हैं और प्रमुख उपनिषद् सूत्रों में छुपे गूढ़ रहस्यों को सरलता के साथ उजागर करते हैं। यह पुस्तक एक भेंट है उनके लिए जो अपनी आध्यात्मिक यात्रा में थोड़ा आगे बढ़ चुके हैं, साथ-ही-साथ उनके लिए भी जिन्होंने अपनी यात्रा बस अभी शुरू ही की है।
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