डर + बदला + युध्यस्व + अंधविश्वास + संघर्ष + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

डर + बदला + युध्यस्व + अंधविश्वास + संघर्ष + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

पाँच पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
ख़ास पाठकों के लिए पाँच पुस्तकों का कॉम्बो भारी छूट पर
डर + बदला + युध्यस्व + अंधविश्वास + संघर्ष + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और जीवन में प्रकाश लाएँ।

डर:

जीवन दो ही तरीकों से जिया जाता है: या तो डर में या प्रेम में। हमने प्रेम कभी जाना नहीं है और डर से हमारा बड़ा गहरा नाता है। डर का जन्म होता है अपूर्णता के विचार से, यह विचार कि हम में कुछ अस्तित्वगत कमी है। इसी विचार को सत्य मानकर हम संसार द्वारा प्रदत्त वस्तुओं पर आश्रित हो जाते हैं, चाहे वो हमारे रिश्ते-नाते हों, चाहे रुपये-पैसे अथवा पद-प्रतिष्ठा।

आचार्य प्रशांत जी इन संवादों के माध्यम से इस अपूर्णता के विचार को ही नकार देते हैं। आचार्य जी हमें हमारे उस 'मैं' से परिचित कराते हैं जो असली है और जो अमृतस्वरूप है। कृपया इस पुस्तक का भरपूर लाभ लें और अपने जीवन के केंद्र से डर को विस्थापित कर प्रेम को लाएँ।

बदला:

आत्म-अज्ञान के वशीभूत बदले की आन्तरिक ज्वाला में जलता हुआ मन न सिर्फ़ स्वयं को सज़ा देता है, बल्कि उसके कर्मों व सम्बन्धों में भी यह भाव अपनी वीभत्स अभिव्यक्ति पाता है। आज तक धरती पर हुए अधिकांश महायुद्धों के पीछे भी बदले की यह भावना ही मूल कारक या उत्प्रेरक रही है।

बदले की भावना के पीछे का गहरा मनोविज्ञान क्या है? बदले की भावना से मुक्त होकर जीवन और सम्बन्धों को आनन्द और प्रेम से परिपूर्ण कैसे बनाया जा सकता है? प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत ने इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर हमें बडे़ ही सहज तरीके से समझाए हैं।

यह पुस्तक अनिवार्य रूप से हमारे पाठकों को इस विषय पर एक गहरी स्पष्टता प्रदान करेगी और एक सार्थक आन्तरिक रूपांतरण में सहायक सिद्ध होगी।

युध्यस्व:

आत्म-अज्ञान के वशीभूत बदले की आन्तरिक ज्वाला में जलता हुआ मन न सिर्फ़ स्वयं को सज़ा देता है, बल्कि उसके कर्मों व सम्बन्धों में भी यह भाव अपनी वीभत्स अभिव्यक्ति पाता है। आज तक धरती पर हुए अधिकांश महायुद्धों के पीछे भी बदले की यह भावना ही मूल कारक या उत्प्रेरक रही है।

बदले की भावना के पीछे का गहरा मनोविज्ञान क्या है? बदले की भावना से मुक्त होकर जीवन और सम्बन्धों को आनन्द और प्रेम से परिपूर्ण कैसे बनाया जा सकता है? प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत ने इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर हमें बडे़ ही सहज तरीके से समझाए हैं।

यह पुस्तक अनिवार्य रूप से हमारे पाठकों को इस विषय पर एक गहरी स्पष्टता प्रदान करेगी और एक सार्थक आन्तरिक रूपांतरण में सहायक सिद्ध होगी।

अंधविश्वास:

तथ्यों की उपेक्षा और मान्यताओं को अंगीकार करने के फलस्वरूप मानवता सदियों से अंधविश्वासों की चपेट में रही है और उनके दुष्परिणाम झेलती रही है। अंधविश्वास ने व्यक्ति के जीवन को डरा-सहमा और संकुचित बना डाला है।

जादू-टोना, तंत्र-मंत्र, भूत-प्रेत, अदृश्य शक्तियाँ, ज्योतिष व हस्तरेखा — इन तमाम सामाजिक विद्रूपताओं की मूल वजह अंधविश्वास ही है। आज के समय की विडंबना ये है कि शिक्षा और विज्ञान में तरक्की के बावजूद भी लोग अंधविश्वास की गिरफ्त से उबर नहीं पा रहे। साउंड ऑफ साइलेंस, पॉज़िटिव एनर्जी और पॉज़िटिव वाइब्रेशन तथा नारियल फोड़ने जैसी मान्यताओं को आज भी पढ़ा-लिखा समाज मान रहा है।

आज के पढ़े-लिखे वर्ग में भी अंधविश्वास इतना व्यापक क्यों है? अंधविश्वास का समूल समाधान क्या है? इन महत्वपूर्ण प्रश्नों के समुचित उत्तर ही अंधकार की ओर बढ़ रही इस पूरी मानवता को बचा सकते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत ने इन तमाम झूठी और दुष्प्रचारित मान्यताओं का खंडन किया है और आत्मज्ञान संचालित वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण विकसित करने के लिए प्रेरित किया है।

संघर्ष:

जीवन प्रतिपल संघर्ष तो है ही, पर हम यह नहीं जान पाते कि हमारे लिए कौनसा संघर्ष उचित है। और फिर हम छोटी लड़ाइयों में उलझकर बड़ी और महत्वपूर्ण लड़ाई से चूक जाते हैं।

बड़ी लड़ाई वो है जो अपने विरुद्ध की जाती है, असली संघर्ष वो है जो मन के विकारों को हटाने के लिए किया जाता है। जैसे-जैसे हमारा मन सुलझता जाता है, वैसे-वैसे हम बाहरी चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सक्षम होते जाते हैं। इस पुस्तक में हमें आचार्य प्रशांत से समझने को मिलेगा कि सही संघर्ष कौनसा है, वह क्यों ज़रूरी है और यह कि आनंद तो स्वयं से जूझने में ही है।
Select Format
Share this book
Have you benefited from Acharya Prashant's teachings? Only through your contribution will this mission move forward.
Reader Reviews
5 stars 0%
4 stars 0%
3 stars 0%
2 stars 0%
1 stars 0%