
यह पुस्तक सिखाती है कि कैसे हम जीवन में बिना उद्देश्य के जीवन व्यतीत करते है, समय को किसी निरर्थक चीज़ों में व्यय करते है जिससे हमारे अंदर अकेलेपन का भाव उत्पन्न होता है। प्रकृति (शरीर ) के मंसूबों को नहीं भांपते और प्रकृति में ही लिप्त हो जाते है जिससे मन में कुंठा, क्रोध, ईर्ष्या और विषाद जन्म लेती है, भीतर कुछ है जो चीख - चीखकर मुक्ति के लिए तड़प रही है पर हम अज्ञानवश उस अरिक्तता को पूर्ण करने ...