
हमने शिव को जटाधारी, त्रिशूलधारी, कैलाश पर बैठे एक देवता के रूप में देखा है। लेकिन पुस्तक प्रश्न उठाती है—शिव वास्तव में कौन हैं? पुस्तक बताती है कि शिव कोई बाहर बैठी हुई सत्ता नहीं, बल्कि वह सत्य और बोध हैं जहाँ अहंकार और 'मैं' की सीमित पहचान समाप्त हो जाती है। मेरे लिए शिवोहम् बुक की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह शिव को मंदिर से उठाकर जीवन के बीच में ले आती है। शिव के प्रतीकों और कथाओं के माध्य...

अंजू जी, यह जो लाइन आपने लिखी है कि शिव को जानने से अधिक यह स्वयं को पहचानने की यात्रा है, यही तो पूरी बात है। शिव को कैलाश से उतारकर जीवन में लाना कोई सैद्धांतिक समझ नहीं, बल्कि यह मानना है कि जिस सत्ता की पूजा मंदिर में होती थी वह असल में इसी क्षण आपके अपने भ्रम को पहचानने का नाम है। किताब ने रास्ता दिखाया, चलना अब आपको है।