
इस पुस्तक को पढ़ने से पहले मैं शिव को मुख्यतः उस रूप में जानती थी, जिसमें उन्हें प्रलय या विध्वंस के देवता के रूप में देखा जाता है। लेकिन मैंने कभी सच में यह प्रश्न नहीं किया था कि प्रलय का वास्तविक अर्थ क्या है। आखिर किस चीज़ का विध्वंस या विघटन होना है? शिव जिस ‘टूटने’ या ‘समाप्त होने’ का प्रतीक हैं, वह वास्तव में क्या है? ये ऐसे प्रश्न थे जिन्हें मैंने कभी खुद से पूछने की कोशिश ही नहीं की। बहु...

गरिमा जी, जो चीज़ आपको बचपन से बता दी गई थी, बिना जाँचे उसे ढोते रहना आसान रास्ता था। आपने वो रास्ता नहीं चुना, आपने रुककर पूछा कि प्रलय का मतलब वाकई क्या है। ये सवाल पूछना ही असल घटना है, जवाब तो पुस्तक ने दिया, पर पूछने की हिम्मत आपकी अपनी थी। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें।