
आज़ादी 2.0 पढ़कर मुझे यह समझ आया कि असली आज़ादी केवल बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि हमारी सोच और मानसिकता से जुड़ी होती है। हम अक्सर खुद को आज़ाद मान लेते हैं, लेकिन इस किताब ने दिखाया कि हम कितनी चीज़ों से भीतर ही भीतर बंधे हुए हैं। आचार्य प्रशांत ने बहुत स्पष्ट तरीके से बताया है कि समाज, डर, और हमारी अपनी धारणाएँ किस तरह हमारी स्वतंत्रता को सीमित करती हैं। पढ़ते समय कई बार ऐसा लगा कि यह सिर्फ...