श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1 + 2) [Hardbound] + ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण + श्रीकृष्ण + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
चार पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
5/5
1 Ratings
Description
सभी पाठकों के लिए चार पुस्तकों का विशेष कॉम्बो भारी छूट पर! श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1 + 2) [Hardbound] + ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण + श्रीकृष्ण + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें। श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1 + 2) [Hardbound] + ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण + श्रीकृष्ण + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त] पढ़ें और जीवन को सही दिशा दें।
श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य (भाग 1 + 2) [Hardbound]:
श्रीमद्भगवद्गीता कोई शाब्दिक चर्चा या सैद्धान्तिक ज्ञान मात्र नहीं, बल्कि रणक्षेत्र में खड़े एक योद्धा को सम्बोधित शब्द हैं।
गीता का जन्म शान्त मनोरम वन या आश्रम में नहीं, रणक्षेत्र में हुआ है। अर्जुन जीवन से विरक्त शिष्य नहीं जो संसार त्यागकर कृष्ण के पास आए हों। अर्जुन के सामने एक तरफ़ धर्म है तो दूसरी तरफ़ सम्बन्धियों और गुरुजनों का मोह; बड़ा कठिन है निर्णय लेना कि अपनों पर बाण चलाएँ या नहीं। कृष्ण के समक्ष एक ऐसा हठी शिष्य है जो सुन तो रहा है, पर समझने को बहुत तत्पर नहीं। एक दृष्टि से देखें तो भगवद्गीता श्रीकृष्ण के अर्जुन के अज्ञान के प्रति संघर्ष की गाथा है।
इस संघर्ष में श्रीकृष्ण के शस्त्र हैं वेदांत के सूत्र और सिद्धांत। गीता वेदांत की प्रस्थानत्रयी का प्रमुख स्तम्भ है। उपनिषदों के महावाक्य ही गीता में अत्यंत रोचक व व्यावहारिक रूप से उद्भूत होते हैं।
हमारी भी स्थिति अर्जुन से अलग नहीं है; आम पाठक अर्जुन की स्थिति में अपनी छवि देख सकता है। यही बात हमारा एक विशिष्ट नाता जोड़ती है गीता से।
आचार्य प्रशांत का 'श्रीमद्भगवद्गीता भाष्य' गीता का विशुद्ध वेदांतसम्मत अर्थ आप तक ला रहा है। एक-एक श्लोक की व्याख्या में शुद्धता को ही केंद्रीय वरीयता दी गयी है।
प्रस्तुत पुस्तक में श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय पाँच से अठारह तक के मुख्य श्लोकों की विस्तृत व्याख्या संकलित है।
ऐसे प्रकटते हैं कृष्ण:
यदा यदा हि धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
भगवद्गीता के चौथे अध्याय के प्रसिद्ध श्लोकों में से हैं श्लोक क्रमांक 7 से 11। इन श्लोकों ने आमजन के बीच जितनी प्रसिद्धि पाई है, उतना ही इनके अर्थ को विकृत भी किया गया है।
प्रचलित अर्थ कहता है कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म सिर चढ़कर नाचता है, तब-तब कृष्ण प्रकट होते हैं। जिसका अर्थ हमने ये कर लिया है कि कोई हमसे ऊँचा, हमसे अधिक सामर्थ्यवान कहीं बाहर से आएगा हमारे जीवन से अधर्म को मिटाने के लिए। ऐसा मानकर हमने स्वयं को अपने जीवन के प्रति ज़िम्मेदारी से मुक्त कर दिया है।
वेदांत कहता है — कोई नहीं है बाहर; तुम्हारा जीवन, तुम्हारी ज़िम्मेदारी, तुम्हारा चुनाव। तुम चाहो तो कृष्ण प्रकट होंगे, लेकिन बाहर से नहीं, तुम्हारे ही भीतर से। किसी बाहरवाले की प्रतीक्षा करने का एक ही कारण है — बाहरी और आंतरिक, दोनों रूप से सही ज्ञान का अभाव।
अधर्म तो चारों तरफ़ पसरा हुआ है, मूल बात है — क्या हमें दिखाई देता है?
हमारे भीतर ये आत्मज्ञान का अभाव है या कहें कि अज्ञान का अंधकार है कि सामने इतना अधर्म होते हुए भी हमें कुछ दिखाई नहीं देता। वेदांत ‘मैं’ की बात करता है, हमारे भीतर के इसी अज्ञान के अंधकार को मिटाने के लिए हमें इन श्लोकों के वेदांत सम्मत अर्थ को समझना बहुत आवश्यक है। प्रस्तुत पुस्तक के माध्यम से आचार्य प्रशांत इन श्लोकों के सही व उपयोगी अर्थ को वेदांत के प्रकाश में समझा रहे हैं जो कि हम सबको समझना बहुत आवश्यक है।
श्रीकृष्ण:
श्रीकृष्ण गीता में आपसे एक बात कह रहे हैं, वो बात तब भी उपयोगी थी, आज भी उपयोगी है, सदा उपयोगी रहेगी, समयातीत बात है।
लेकिन हमें लगने लग जाता है कि उस समय का जो कुछ था, वो भी समयातीत ही होगा। तो उस समय की जो परिस्थितियाँ थीं, हम उन्हें भी दोहरा देना चाहते हैं। अब श्रीकृष्ण तो रथ पर चलते थे, आप रथ पर चलने लग जाओगे सड़क पर? और मुकुट पहनोगे? और धनुष-बाण लेकर चलोगे?
जब अर्जुन उस अर्जुन जैसा नहीं रहा, तो क्या कृष्ण वैसे ही होंगे जैसे उस समय थे?
गीता नहीं बदलेगी। अर्जुन भी बदलेंगे, कृष्ण भी बदलेंगे; कृष्णत्व नहीं बदलेगा।