अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 + अष्टावक्र गीता भाष्य, प्रकरण 3-6 + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 7-9 + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 10) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 11) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 12) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 13) + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 + अष्टावक्र गीता भाष्य, प्रकरण 3-6 + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 7-9 + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 10) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 11) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 12) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 13) + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]

सात पुस्तकों का कॉम्बो मुफ़्त स्टिकर के साथ
Description
ख़ास पाठकों के लिए तीन पुस्तकों का कॉम्बो भारी छूट पर!
अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 1-2 + अष्टावक्र गीता भाष्य, प्रकरण 3-6 + अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण 7-9 + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 10) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 11) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 12) + अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 13) + [1 आचार्य प्रशांत कोट्स स्टिकर मुफ़्त]
पढ़ें और अपने जीवन को सही दिशा दें।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (1-2):

अद्वैत वेदांत के उच्चतम ग्रंथों में है अष्टावक्र गीता। इसमें अद्वैत ज्ञान का निरूपण भी है, मुक्ति के चरणबद्ध उपाय भी हैं और एक ब्रह्मज्ञानी की बात भी है।

राजा जनक एक काबिल शासक हैं। जो सभी प्रकार से सम्पन्न और प्रसन्न हैं; पर फिर भी एक आंतरिक अपूर्णता सताती है। इसलिए समाधान के लिए ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं, जिनकी उम्र मात्र ग्यारह वर्ष है।

राजा जनक का प्रश्न होता है — वैराग्य कैसे हो? मुक्ति कैसे मिले?

चूँकि ग्रंथ की शुरुआत ही तात्विक जिज्ञासा से होती है इसलिए अष्टावक्र की बात श्लोक दर श्लोक बहुत गहराई तक जाती है। अष्टावक्र का प्रत्येक श्लोक इतना सशक्त और सटीक होता है कि प्रथम अध्याय के अंत में ही राजा जनक मुक्त हो जाते हैं। इस पुस्तक में आचार्य प्रशांत ने प्रथम दो प्रकरण के प्रत्येक श्लोक की सरल व उपयोगी व्याख्या प्रस्तुत किया है।

प्रथम प्रकरण की विषयवस्तु

शिष्य एक संसारी है। इसलिए बात की शुरुआत होती है आचरण के तल से। फिर इसके पश्चात बात खुलती है आत्मज्ञान की।

अष्टावक्र आसक्ति को बंधन व निरपेक्ष दर्शन को मुक्ति का रहस्य बताते हैं।

द्वितीय प्रकरण की विषयवस्तु

राजा जनक अब मुक्त हो चुके हैं। प्रकरण की शुरुआत ही उनकी उद्घोषणा से होती है; "अहो! मुक्ति इतनी सहज थी, मैं अब तक समझ क्यों न सका?" राजा जनक स्वयं को बोध स्वरूप जानने लगे और स्वयं के शरीर और मन ऐसे देखने लगे जैसे वो कोई स्वतंत्र इकाई हों।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (3-6):

आध्यात्मिक ग्रंथों में अष्टावक्र गीता का स्थान अद्वितीय है। इस अनुपम ग्रंथ को अद्वैत वेदान्त का सबसे शुद्ध ग्रंथ कहा जाता है। यह ग्रंथ मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के मध्य हुए आत्मज्ञान विषयक संवाद का संकलन है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत द्वारा प्रकरण तीन से छः के श्लोकों पर दिए विस्तृत और सरल व्याख्यानों को संकलित किया गया है।

पुस्तक में तीसरे प्रकरण में अहम् और जगत का सम्बन्ध बताने से हुई शुरुआत छठे प्रकरण तक आत्मा और जगत के सम्बन्ध की गहराई तक ले जाती है।

तीसरे प्रकरण में ऋषि अष्टावक्र कहते हैं कि जिस जगत ने तुमको गंदा किया, उसी जगत में तुम्हें सफ़ाई नहीं मिलने वाली। और छठे प्रकरण में ऋषि कहते हैं, "मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान। यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण, बस इसके साथ एकरूप होना है।"

इस अति शुद्ध ग्रंथ पर आचार्य प्रशांत की व्याख्या ने इसे सब मुमुक्षुओं के लिए सरल और ग्राह्य बना दिया है।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (7-9):

अष्टावक्र गीता वेदान्त का कालजयी ग्रंथ है, जिसमें मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के बीच हुए गहन संवाद का वर्णन है। राजा जनक, जिन्हें बाहरी सुख-सुविधाओं से संपन्न होने के बावजूद एक अपूर्णता सताती है, ज्ञान और मुक्ति की मंशा से ऋषि अष्टावक्र के पास जाते हैं। ग्रंथ की शुरुआत ही ज्ञान और मुक्ति की चाह के साथ होती है।

इस भाग में बात सातवें अध्याय तक पहुँच गई है, और गहरी हो गई है। ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को उनके बंधन पहचानने के लिए स्पष्टता दे रहे हैं। आज इस ग्रंथ की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है, क्योंकि मानवजाति के पास अनेक संसाधन और सूचना का भंडार उपलब्ध है। मनुष्य की गहरी इच्छा मुक्ति की ही है, इसलिए यह जानना अधिक आवश्यक हो जाता है कि क्या मुक्तिदायी है और क्या नया बंधन।

प्रस्तुत पुस्तक आचार्य प्रशांत द्वारा प्रकरण 7 से 9 पर दिए गए विस्तृत और सरल व्याख्यानों का संकलन है। प्रकरण 7 में राजा जनक घोषणा करते हैं कि वे मन और जगत के इस खेल से पूरी तरह अप्रभावित हैं, और ऋषि अष्टावक्र एक सच्चे गुरु की तरह उन्हें बंधन और उसकी निशानियों से अवगत कराते हुए सतर्क करते हैं।

अष्टावक्र गीता पर आचार्य प्रशांत की यह सरल, स्पष्ट और सटीक व्याख्या एक सेतु के समान है, जिसके माध्यम से आप इस गहन चर्चा को आसानी से समझ सकते हैं।

अष्टावक्र गीता भाष्य (प्रकरण 10):

अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत के शिखर-ग्रंथों में एक है, जिसमें मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के बीच हुए गहन संवाद का वर्णन है। यहाँ ज़ोर किसी विधि, मंत्र या अभ्यास पर नहीं, बल्कि बोध व आत्मज्ञान की अनिवार्यता पर है।

प्रस्तुत पुस्तक अष्टावक्र गीता के प्रकरण 10 पर आधारित आचार्य प्रशांत द्वारा की गई वेदान्तिक व्याख्या है। वे अष्टावक्र गीता शृंखला के इस चौथे भाग में आपको संसार-त्याग की सलाह नहीं देते, संसार-रचना की जड़ दिखाते हैं: कामना। जहाँ कामना है, वहीं संसार का चक्र है; और मुक्ति कोई नई उपलब्धि नहीं, वह बस कामना के क्षय का नाम है।

प्रकरण के आठ श्लोकों में स्पष्ट किया गया है कि परंपरा में धर्म, अर्थ, काम को ‘पुरुषार्थ’ कहा गया, पर जब ये तीनों अहंकार को राहत देने की दिशा में चलें, तो आध्यात्मिक परिणति नहीं दे सकते। इसीलिए ऋषि का वाक्य कठोर है: काम (इच्छा), अर्थ (वह ‘अर्थ’ जो असल में स्वार्थ बन चुका है), और ऐसा धर्म जो इन दोनों का कारण बनता है — इन सबका अनादर करो; इन्हें छोड़ो। यहाँ ‘वैराग्य’ का अर्थ किसी नैतिक महानता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि तथ्यों का निर्भय स्वीकार है, जो कि इन्हीं क्षणभंगुर विषयों की अनित्यता को जानने से होता है।

यह पुस्तक आपको ‘और कुछ’ नहीं देती, बल्कि कर्मकांडों, मान्यताओं, और जो कुछ अतिरिक्त है, उसे आपसे दूर करती है। वैराग्य को भाव या दमन की तरह नहीं, बोध के रूप में आप तक लाती है, जिससे आपके भ्रम कम होते हैं, पकड़ ढीली पड़ती है, और बंधन अपनी ताकत खो देते हैं।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (11):

अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत के शिखर-ग्रंथों में से एक है, जिसमें मुमुक्षु राजा जनक और युवा ऋषि अष्टावक्र के बीच हुए गहन संवाद का वर्णन है। यहाँ ‘नेति-नेति’ कोई सिद्धांत नहीं, एक सीधी चोट है: जो असत्य है, उसे नकारते चलो, ताकि सत्य स्वयं प्रकट हो सके।

दसवें प्रकरण में जहाँ बाहरी विषयों के प्रति तृष्णा के त्याग पर बल दिया गया था, इस शृंखला के ग्यारहवें प्रकरण में ऋषि अष्टावक्र राजा जनक को 'आत्मज्ञान' के उस शिखर पर ले जाते हैं जहाँ मुमुक्षु प्रकृति के विषयों के परिवर्तनकारी स्वभाव को देख पाता है। दुख का मूल कारण स्वयं संसार नहीं, बल्कि उसके प्रति होने वाली 'चिंता' या मानसिक प्रलाप है। जब संसार में भाव (होना), विकार (परिवर्तन), और अभाव (न होना) की स्वाभाविकता दिखाई देने लगती है, तो मन की लगातार चलने वाली अनिवार्य बयानबाज़ी गिर जाती है।

प्रस्तुत पुस्तक आपको किसी “नई उपलब्धि” की ओर नहीं, जीवन के अनावश्यक बोझ को उतारने की ओर ले जाती है। पुस्तक स्पष्ट करती है: जो बदलता है, वही प्रकृति है, और उसका बदलना स्वभाव है। पुस्तक की सहज संगति से जैसे-जैसे यह बोध गहराता है, मन को हर बदलाव पर टिप्पणी करने, डरने, बचाने की मजबूरी कम होती जाती है। शांति किसी खास परिस्थिति की शर्त नहीं, बल्कि विशुद्ध आत्मज्ञान की स्वाभाविक परिणति बन जाती है।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (12):

अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक विलक्षण ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की चरम संभावना को प्रकट करता है। पिछले प्रकरणों में ऋषि अष्टावक्र द्वारा दिए ज्ञान के परिणामस्वरूप राजा जनक को मिली स्पष्टता व दृष्टि का वर्णन है।

इन श्लोकों में राजा जनक बताते हैं कि कैसे क्रमशः शरीर के कर्मों, वाणी की व्यस्तता और मन की चिंताओं से उनकी पहचान ढीली पड़ती जा रही है, और अंततः वे अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं। अब उन्हें न मन को एकाग्र करने का प्रयत्न करना है, न किसी अनुभव को पकड़ना है, न किसी दुख से बचना है, क्योंकि वे अपनी वास्तविकता से परिचित हैं। जो खोजा जा रहा था, वो खोया हुआ नहीं था, ऐसा जानकर अब उनकी खोज समाप्त होती है और सहज स्थितप्रज्ञता प्रकट होती है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन गूढ़ श्लोकों की व्याख्या समकालीन जीवन के संदर्भ में करते हैं। उनकी सरल और स्पष्ट व्याख्या आपको यह देखने में सहायता करती है कि मुक्ति कोई भविष्य की उपलब्धि नहीं है; वह केवल उस भ्रम के समाप्त होने का नाम है जिसमें हम स्वयं को कर्ता, भोगता और खोजी मानते रहते हैं।

यह पुस्तक पाठक को किसी नई उपलब्धि का वादा नहीं करती; यह उसे स्वयं के अनावश्यक संघर्षों को पहचानने और छोड़ने की दृष्टि देती है। और जब यह दृष्टि स्पष्ट होती है, तब जीवन के ये संघर्ष और भटकाव समाप्त होने लगते हैं, और व्यक्ति सहजता व स्पष्टता में स्थित होने लगता है।

अष्टावक्र गीता भाष्य प्रकरण (13):

अष्टावक्र गीता अद्वैत वेदांत का एक अद्वितीय ग्रंथ है, जिसमें ऋषि अष्टावक्र और राजा जनक के बीच हुआ संवाद आत्मज्ञान की परम संभावना को प्रकट करता है। तेरहवें प्रकरण तक आते-आते यह संवाद उस ऊँचाई पर पहुँच जाता है जहाँ गुरु और शिष्य के बीच का भेद लगभग मिट जाता है। इसलिए राजा जनक के वचनों में वही स्पष्टता, वही स्थिरता और वही परिपक्वता झलकती है जो ऋषि अष्टावक्र की वाणी में थी।

प्रकरण 13 के श्लोकों में जनक स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के दुख का कारण बाहरी परिस्थितियाँ या विषय नहीं हैं, बल्कि उन विषयों के प्रति उसकी अज्ञानपूर्ण धारणाएँ, मान्यताएँ और आशाएँ हैं। शरीर और मन प्रकृति के उपकरण हैं, जो अपने गुणों—सत्त्व, रज और तम—के अनुसार कार्य करते हैं। अहंकार व्यर्थ ही स्वयं को इनका कर्ता मानकर सुख-दुख के जाल में उलझ जाता है। ज्ञानी वह है जो देख लेता है कि प्रकृति अपने स्वभाव से कार्य कर रही है; और जहाँ उसका कोई वश नहीं है—जैसे शरीर का बूढ़ा होना, दूसरों का व्यवहार, या भविष्य की दिशा—वहाँ अधिकार छोड़ देना ही सच्चा पुरुषार्थ है।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत इन श्लोकों की व्याख्या अत्यंत सरल, स्पष्ट और समकालीन उदाहरणों के माध्यम से करते हैं। वे दिखाते हैं कि हम अक्सर अज्ञान की जेल में रहते हुए आज़ादी की तस्वीरों से संतुष्ट हो जाते हैं, जबकि वास्तविक मुक्ति का मार्ग उस जेल की दीवारों—अज्ञानपूर्ण मान्यताओं, संस्कारों और धारणाओं—को गिरा देने में है। जब अज्ञान जल जाता है, तब मनुष्य द्वैत के सुख-दुख से ऊपर उठकर सहज आनंद में स्थित हो जाता है। यह पुस्तक आपके लिए इसी आनंद की दिशा जाने का एक आमंत्रण है।
Select Format
Share this book
Have you benefited from Acharya Prashant's teachings? Only through your contribution will this mission move forward.
Reader Reviews
5 stars 0%
4 stars 0%
3 stars 0%
2 stars 0%
1 stars 0%