अब से खबरदार रहो भाई | Ab Se Khabardar Raho Bhai [New Release]

अब से खबरदार रहो भाई | Ab Se Khabardar Raho Bhai [New Release]

संत कबीर भजन श्रृंखला
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Paperback Details
Hindi Language
132 Print Length
Description
ऐसे ज्ञान की क्या उपयोगिता जो जीवन में काम ही न आए?

गुरु के वचनों को हम सुन तो लेते हैं, और अनुभूति भी होती है कि कुछ बहुमूल्य मिल गया है। पर वह जो मिला है, अभी पूरी तरह अपना नहीं हुआ — ज्ञान तो है, पर जीवन में उतरा नहीं।

यही वह संवेदनशील मोड़ है जहाँ कबीर साहब चेता रहे हैं — "अब से खबरदार रहो भाई"। वे बात कर रहे हैं आत्मज्ञान की जिसमें खुद से खुद के ही झूठ को पकड़ना और परखना है। यह ज्ञान सुनकर प्राप्त करना तो आसान है, पर जीवन में उतारना नहीं।

आचार्य प्रशांत भजन का मर्म सामने रखते हुए स्पष्ट करते हैं कि गुरु से मिले ज्ञान को उपयोगी बनाने के लिए उसे हर दिन कमाना पड़ता है। और यह कमाई विशेष प्रयास माँगती है: ज्ञान के आलोक में खुद के झूठों को जलाते हुए घटते जाने का।

साधक के पास एक ओर खुद को गलाकर ज्ञान के अनंत प्रकाश तक पहुँचने का अवसर है, तो दूसरी ओर निरंतर खतरा भी है: अपनी ही चालों में फँसकर ज्ञान से दूर हो जाने का। इसीलिए खबरदार रहना आवश्यक है, जो संभव है केवल भीतरी सजगता और प्रेम-पूर्ण प्रयास से।

प्रस्तुत पुस्तक में आचार्य प्रशांत वेदांत के प्रकाश में भजन का सार सामने रखते हैं, और अपनी अग्रगामी शैली में संतवाणी की उस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं जिसमें रोज़मर्रा के उदाहरणों के माध्यम से पाठक स्वयं को देखने और ज्ञान को जीवन में उतारने की दिशा पाता है।
Index
CH1
पाकर गँवाना है सबसे बड़ा अभाग
CH2
अहंकार की परछाई: चोट और प्रतिशोध
CH3
आत्मज्ञान: कुछ पाना नहीं, स्वयं को घटाना
CH4
प्रथम और अंतिम दोषी: अहंकार
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