आचार्य प्रशांत: हमारे फन्डामेन्टल ड्यूटीज़ होते हैं, मौलिक कर्तव्य, उन्हीं मौलिक कर्तव्यों में लिखा हुआ है कि भई राष्ट्रगान और राष्ट्रध्वज का सम्मान किया जाना चाहिए, बिलकुल सही बात है। और उन्हीं मौलिक कर्तव्यों में ये भी है कि पर्यावरण की रक्षा करनी है और सब पशुओं के प्रति करुणा का भाव रखना है। ठीक जहाँ तिरंगे कि बात है कि तिरंगे के प्रति हमें सम्मान रखना चाहिए, संविधान में फन्डामेन्टल ड्यूटीज़ भी वर्णित हैं, मौलिक कर्तव्य।
उन्हीं में है ये बात कि तिरंगे के सम्मान करो और उन्हीं में तो फिर ये बात भी है कि पर्यावरण की रक्षा करो, पशुओं के प्रति करुणा रखो, कम्पैशन टुवर्ड्स ऑल लिविंग क्रीएचर्स (सारे जीव-जन्तुओं के प्रति करुणा), उसकी बात कौन करेगा? हम उसको एक हफ़्ता क्यों नहीं दे रहे हैं? हम क्यों नहीं कह रहे हैं कि पन्द्रह अगस्त के आसपास के बीस दिन हम पर्यावरण को और पशुओं के प्रति करुणा जाग्रत करने को रखेंगे। तब तो तथ्य ये है कि भारत, भारत सरकार, भारत को दुनिया का सबसे बड़ा कत्लखाना बनाने पर जुटी हुई है, वो इसको कह रहें हैं ‘पिन्क रेवोल्यूशन’।
वो कह रहें हैं यहाँ और ज़्यादा, और ज़्यादा तुम कृत्रिम गर्भादान करके जानवर पैदा करो और उनको काटो-काटो-काटो ताकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा माँस निर्यातक देश बन जाए। हम यहाँ पर नहीं बात करना चाहते क्या जो संविधान ने हम पर मौलिक कर्तव्य डाले हैं उनकी? तिरंगा ऊँचा है तिरंगा शुभ है, पर बाकी मौलिक कर्तव्यों की कौन बात करेगा? किसी सरकार ने आज तक पशुओं के प्रति करुणा की बात क्यों नहीं करी?
तब तो सरकार खुद बताती है ‘सन्डे हो या मन्डे, रोज़ खाओ अन्डे’ और चिकन खाओ उससे सेहत बनेगी। सरकार ख़ुद संविधान का उलन्घन कर रही है! संविधान कह रहा है कि ये फन्डामेन्टल ड्यूटी..और फन्डामेन्टल ड्यूटी क्या सिर्फ़ नागरिक की होती है, सरकार की नहीं होती? संविधान कह रहा है ये फन्डामेन्टल ड्यूटी है ‘कम्पैशन टुवर्ड्स ऑल एनिमल्स’, तो आप स्लॉटर हाउसेस (क़त्लखानों) को सबसिडाईज़




