विज्ञान में एक गरिमा है, वहाँ पर हर चीज़ झुठलाई जा सकती है। विज्ञान कहता है — कुछ भी मानो मत, कहो कि ‘पता करेंगे।' हिन्दुस्तान को इस दृष्टिकोण की ख़ास ज़रूरत है — मानना नहीं है, पता करना है। विज्ञान में एक-से-एक कहानियाँ हैं, वो कहानियाँ आपको पता चलें, आप वैज्ञानिकों के मुरीद हो जाएँगे। आकाश-गंगा पार कर जाएगा ये देश, पर पहले यहाँ के बच्चों में विज्ञान के प्रति आदर तो पैदा करिए।
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आचार्य प्रशांत: विज्ञान में ऐसी-ऐसी प्रेरक कहानियाँ हैं कि पूछो मत। वो कहानियाँ आपको पता चलें, आप वैज्ञानिकों के मुरीद हो जाएँगे। आप पूजना शुरु कर देंगे उनको।
एक सज्जन अपने बेटे को लेकर मिलने आए मुझसे। वो आई.आई.टी. की परीक्षा की तैयारी कर रहा है। उसको कुछ तनाव इत्यादि था, तो बात करने आया। मैंने देखा कि इसको अपनी ही समस्याएँ इतनी बड़ी लग रही हैं, और जिन नामों से ये रोज़ मुख़ातिब होता है, उनके बारे में ये कुछ जानता नहीं। इसको पता चले कि उन्होंने कितनी बड़ी-बड़ी समस्याएँ झेलीं थीं, तो ये अपने आप को भूल जाएगा।
केपलर, बोल्ट्समैन, मैक्सवेल, मैक्स प्लैंक, एवोगैड्रो – पाँच नाम लिए, और इन पाँचों ने जीवन में बड़ी दुश्वारियाँ झेली थीं। और ये पाँचों आई.आई.टी.जे.ई.ई. के पाठ्यक्रम में शामिल हैं। लेकिन इनकी कहानियाँ हमें कभी बताई नहीं जातीं। अधिक-से-अधिक हमें पता रहता है कोपरनिकस के बारे में, उन्होंने हीलिओ-सेन्ट्रिक ऑर्बिट दे दिया, उसको बहुत मुश्किलें दी गईं। लेकिन हमें नहीं बताया जाता कि केपलर ने जब इलिप्टिकल ऑर्बिट की बात की, तो उनको भी बहुत तकलीफ़ें झेलनी पड़ीं थीं।
सच बोलने पर कोई सिर्फ़ धार्मिक लोगों का एकाधिकार थोड़े ही है। वैज्ञानिकों को भी सच बोलने की, दुनिया का सच बोलने की बहुत बड़ी कीमत देनी पड़ती है। ये हमारे बच्चों को पता ही नहीं। उनकी रुचि कभी इन चीज़ों में जागृत ही नहीं की जाती। इसीलिए ये देश इतने दिनों तक इतना पिछड़ा रहा, अभी भी पिछड़ा है।




