प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मैं जब बहुत से लोगों, जैसे मजदूर, रिक्शेवालों इत्यादि से मिलता हूँ, देखता हूँ, तो लगता है मुझे ही चिंता रहती है, इन लोगों को मैंने कभी चिंतित होते हुए नहीं देखा। वो कहते हैं कि कल की कल देखेंगे। ऐसा लगता है कि वो तो बिना किसी प्रयास के ही वर्तमान में रह रहे हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं ऐसी बात नहीं है। ये तमसा है; ये सत्य नहीं है। तमसा का अर्थ होता है कि न सिर्फ़ आप एक गर्हित दशा में हैं अपितु आपको उस दशा से अब कोई शिकायत भी नहीं रह गई है। आप बदलना नहीं चाहते।
देखिए, दो स्थितियाँ हो सकती हैं जहाँ पर आप बदलाव ना चाहते हों। पहली यह कि बुद्धत्व घटित ही हो गया है, मंज़िल मिल गई है, अब कहाँ जाना है! तो अब बदलाव का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। और दूसरा ये कि नशा इतना गहरा है, और आलस इतना है, और अज्ञान इतना है कि आपको आपकी गई-गुज़री स्थिति पता ही नहीं लगती, और पता यदि लग भी जाती है तो परेशान नहीं करती। आप ग़लत जगह बैठ गए हो और जम कर बैठ गए हो, और अब आलस ने पकड़ लिया है आपको। "अब ठीक है, अब क्या करेंगे? यही है, चल रहा है। कल की कल देखेंगे।" तो उनको आप आदर्श मत बना लीजिएगा।
ऐसे बहुत होते हैं। एक आदमी है जिसे सोने से पहले कोई काम पूरा करके सोना है। वो अच्छे से जानता है कि काम पूरा नहीं करेगा तो परिणाम क्या होगा—नुक़सान भी होगा, अपमान भी होगा—पर वो सो जाता है। वो अच्छे से जानता है कि सोया तो नुक़सान भी है और अपमान भी है, पर वो सो जाता है। ऐसा थोड़े ही है कि उसे अब कर्मफल की चिंता नहीं रह गयी है। बात बस इतनी-सी है कि उसकी वरीयता में, उसके मूल्यों में अब सम्मान से भी ऊपर मूल्य आ गया है आलस का। वो कह रहा है, "अपमान भी सह लेंगे और नुकसान भी सह लेंगे, अभी तो तमसा हावी है, सो जाओ।" इसको आप ये थोड़े ही कहेंगे कि अब ये इंसान उस अर्थ में बेपरवाह हो गया है जिस अर्थ में नानक साहब ने 'बेपरवाही' शब्द का इस्तेमाल किया है। ऐसे देखे हैं न? काम पूरा करके सोना है, और आप जान रहे हो कि काम पूरा करके नहीं सोए तो नुक़सान भी है और अपमान भी है, पर आप कहते हो, "नुक़सान भी झेल लेंगे और अपमान भी झेल लेंगे।" ये संतत्व का सबूत नहीं है।




