प्रश्नकर्ता: सर, हम कैसे चुनें कि क्या सही है और क्या ग़लत? क्या सही और ग़लत की कोई परिभाषा होती है या सिर्फ़ मन की स्थितियाँ होती हैं?
आचार्य प्रशांत: रजत (श्रोता को इंगित करते हुए) ने पूछा है कि “ये फैसला हम कैसे करें कि क्या सही है और क्या ग़लत?” रजत, ये फैसला तो हम दिन रात करते ही रहते हैं न? कोई नहीं है ऐसा जो ये निर्णय लेता नहीं और प्रतिपल लेता नहीं कि क्या उचित है और क्या अनुचित है। तुम्हें दाएँ चलना है कि बाएँ, तुम्हें ऊपर जाना है कि नीचे, तुम्हें बात करनी है कि नहीं करनी है, तुम्हें प्रश्न उठाना है कि नहीं उठाना है, ये सारे उचित-अनुचित के निर्णय हैं, जो तुम लगातार ले ही रहे हो। क्या पहनना है क्या नहीं पहनना है, क्या कह देना है, क्या छुपा जाना है, कर्म प्रतिपल हो रहा है, कभी विचार रूप में, कभी भौतिक रूप में, तो निर्णय भी तुम लगातार लिए ही जा रहे हो।तो सवाल फिर ये उठता है कि जो दुनिया हमारे चारों ओर है, वो किस प्रकार निर्धारित करती है कि क्या उचित है और क्या अनुचित है? पहले उस पर ग़ौर करते हैं क्योंकी जब लोग निर्धारित कर ही रहे हैं उचित-अनुचित का तो पहले ज़रा ये देख लिया जाए कि वो कैसे निर्धारित करते हैं। ये दुनिया कैसे तय करती है कि क्या ठीक है क्या ग़लत?
मन्दिर के सामने से जब हिन्दु निकलता है, तो सामान्यतया उसके लिये क्या ठीक है? तुम जा रहे हो पैदल और सड़क किनारे मन्दिर आ गया तो तुम्हारे लिये क्या ठीक होता है? सामान्यतया कि दो क्षण रुक कर प्रणाम कर लो और उसी मन्दिर के सामने से किसी और धर्म का कोई निकल जाए तो उसके लिए ये ठीक नहीं होता। समझ में आ रही है बात? व्यक्ति को निर्णय करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी कि क्या ठीक है और क्या ग़लत। तुम्हें एक पहचान दे दी गई है कि तुम एक धर्म विशेष से हो और निर्णय हो गया। तुमने कहाँ किया निर्णय?
दो देशों का युद्ध हो रहा होता है और तुम्हें तय करना है कि किसका समर्थन करें, तो तुम्हें तय करना ही नहीं पड़ता। जिस देश के तुम हो, तुम उसी का समर्थन करोगे, तय हो गया। तय करना कहाँ पड़ा? किसी और ने पहले ही तय कर रखा था और दुनिया ऐसे ही चल रही है न? "जो परंपरा आज विद्यमान है, वही कर डालो, वही उचित है!" और अगर वही उचित है तो तुम्हें तय करना कहाँ पड़ा? जो चल रहा है, जो प्रचलित है, तुमने भी कर डाला। क्या तय करना पड़ा तुम्हें? हाँ, पर अगर तुमसे कोई पूछेगा कि "ये कर क्यों रहे हो?" तो तुम कहोगे कि "यही सही है।' पर सही का निर्धारण तुमने किया कहाँ? तुम्हें तो मिल गया था रेडीमेड बना-बनाया। दुनिया ने तुम्हें बताया ऐसे करना है और तुमने कर डाला।




