तुम पुरुष हो, प्रकृति से ख़ुद को अलग जानो || आचार्य प्रशांत, श्रीमद्भगवद्गीता पर (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं छः वर्ष का हूँ। आपसे पहला अध्याय पढ़ा था, मेरा सवाल दूसरे अध्याय से है। पहला – सांख्ययोग क्या है? दूसरा – उसमें ‘नपुंसकता’ शब्द का प्रयोग किया है।
आचार्य प्रशांत: किसका बेटा?
प्र: ‘नपुंसकता’ – वो क्या है?
आचार्य: किस श्लोक की बात कर रहे हैं? किनके साथ आए हैं?
प्र: अध्याय दो, श्लोक तीन।
आचार्य: ‘नपुंसकता’ नहीं कहा है बेटा, ‘दुर्बलता’ कहा है। दुर्बलता का मतलब होता है अपनी ताक़त का इस्तेमाल न करना। ताक़त न होने को दुर्बलता नहीं कहते, ठीक है?
अब जैसे तुमने ये माइक उठा रखा है न हाथ में, है न? तो तुम अगर ये फ़ैसला कर लो कि मैं उसको नहीं उठाऊँगा, तो ये दुर्बलता है। ‘दुर्बलता’ माने कमज़ोरी। कमज़ोरी माने ये नहीं कि कोई काम कर नहीं सकते, कमज़ोरी माने कि उस काम को करने का फ़ैसला नहीं कर रहे।
गीता में कृष्ण कहते हैं कि कोई अंतर नहीं पड़ता कि तुम काम उठाते हो तो उसको पूरा कर पाते हो या नहीं। तुमने कोई काम करने की ठानी, उसको तुम आगे तक कर पाए या नहीं, वो काम पूरा हुआ कि नहीं, तुम उसमें सफल हुए कि नहीं, इससे अंतर नहीं पड़ता। अंतर बस इस बात से पड़ता है कि तुमने सही काम करने का फ़ैसला किया या नहीं; उस काम में सफल हुए या नहीं, इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। लेकिन काम अगर सही है, फिर भी उसे करने का फ़ैसला ही नहीं कर रहे, तो इसका नाम है दुर्बलता।



