प्रश्नकर्ता: आचार्य जी प्रणाम! अपने संबंधित व्यक्तियों से उम्मीदें रहती हैं। उम्मीदें पूरी न होने पर चुभता सा रहता है, ठगा सा महसूस करता हूँ। कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: नहीं, ठगे नहीं गए। व्यापार में घाटा हो गया। यह जो उम्मीद का कारोबार है, यह पारस्परिक होता है भाई। मैं तुमसे उम्मीद रखूँगा, तुम मुझसे उम्मीद रखो; मैं तुम्हारी उम्मीद पूरी करूँगा, तुम मेरी उम्मीद पूरी करो। यह होता है उम्मीद का कारोबार। और ना तुम्हारी उम्मीदें पूरी होने से तुम्हे कुछ मिल जाने वाला है, ना मेरी उम्मीदें पूरी होने से मुझे कुछ मिल जाने वाला है। पर हमारा आपस का रिश्ता यही रहेगा — मेरे कुछ अरमान तुम पूरे कर दो, तुम्हारे कुछ अरमान मैं पूरा कर दूँ। मिलना किसी को कुछ नहीं है इस पारस्परिक आदान प्रदान से। जब मिलना किसी को कुछ नहीं है तो दोनोंं ही पक्षों को क्या लगता है? ठगे गए।
ऐसा थोड़े ही है कि जो आपकी उम्मीदें पूरी नहीं कर पा रहे, उनको देख कर सिर्फ़ आपको ही लग रहा है आप ठगे गए। थोड़ा उनसे भी तो जाकर पूछ लीजिए। वह भी यही कहेंगे। हमारी उम्मीदें भी पूरी नहीं हुईं, हम भी ठगे गए। ठगा कोई नहीं गया है। बस दोनोंं को व्यापार में घाटा हो गया है। क्योंकि यह जो कारोबार है, यह है ही घाटे का। इसमें आजतक किसी को मुनाफ़ा हुआ नहीं। यह बात अजीब है।
आप सोचेंगे साहब! जब दो लोग आपस में कोई अनुबंध, कोई करार करते हैं, कुछ लेन-देन करते हैं उसमे से एक को अगर घाटा होता है तो निश्चित ही दूसरे को फायदा हो जाता है। बल्कि जितना एक को घाटा हो जाता है, ठीक उतना ही दूसरे को फायदा हो जाता है। ऐसे ही होता है ना? तो शायद आपको यह लग रहा है कि आपको नुकसान हुआ है और दूसरे व्यक्ति को फायदा। इस बात को सोच कर आप और भी ज़्यादा व्यथित हो जाते हैं कि मैं ही बेवकूफ़ बन गया और दूसरा वाला बाज़ी मार ले गया। नही ऐसा नहीं है।
यह लेन देन का कारोबार है ही ऐसा कि जो इसमें उतरेगा वह घाटा खायेगा। दो व्यापारी इसमें अगर कोई समझौता कर रहे हैं, कोई व्यापार कर रहे हैं, दोनोंं लूट जायेंगे। दोनोंं को लगेगा यही कि दूसरे ने लूट लिया। दूसरे ने नहीं लूटा। इस कारोबार की जो प्रकृति है उसने लूटा लिया।




