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सब समझ आता है, पर बदलता कुछ नहीं || (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
11 min
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जब सब पता चलता है, सब दिखता भी है कि सब ठीक नहीं चल रहा उसके बावजूद भी कुछ बदलता क्यों नहीं है?

आचार्य प्रशांत: आप जो बात बोल रहे हैं न, वो जीवन के मूल सिद्धांत के ख़िलाफ़ है। जीवेषणा समझते हैं क्या होती है? और जीने की इच्छा। कोई भी जीव अपना विरोधी नहीं होता। हम पैदा ही नहीं हुए हैं कष्ट झेलने के लिए, हालाँकि कष्ट हम झेलते खूब हैं। हम पैदा इस तरह से हुए हैं कि कष्ट झेलना पड़ेगा, लेकिन हमारे भीतर कोई है जो कष्ट झेलने को राज़ी नहीं होता है। इसीलिए समझाने वालों ने कहा कि आपका स्वभाव दु:ख नहीं है, आनंद है। आपका यथार्थ दु:ख है लेकिन आपका स्वभाव आनंद है। जीते हम दु:ख में हैं, लेकिन स्वभाव आनंद का है। अगर स्वभाव आनंद का नहीं होता तो दु:ख हमें बुरा ही नहीं लगता। दु:ख किसी को अच्छा लगता है? दु:ख बुरा लगता है यही इस बात का सबूत है कि हमारा स्वभाव आनंद है, है न? इसका मतलब ये है कि दु:ख बुरा लगता है और आप प्रश्न क्या कर रही हैं? कि, “नहीं, दु:ख तो बहुत है पर करें क्या?” अरे भाई! अगर बुरा लग रहा है तो जो बताया जा रहा है वो करो न। या तो मेरी बात मान कर कुछ करो या अपने हिसाब से ही कोई तरकीब निकाल लो फिर कुछ करो, या किसी और की सुन लो और कुछ करो। पर कुछ तो करो क्योंकि दु:ख झेलना तुम्हारा स्वभाव नहीं है।

आप लोग बड़ी विचित्र बात बोल जाते हैं कि "नहीं, दु:ख तो है लेकिन कुछ करना नहीं चाहते उसके बारे में।" फिर छोड़िए, फिर इसका मतलब यह है कि दु:ख का अनुभव आपको हो ही नहीं रहा है, आप मुझे अपना दु:ख भर बता रहे हो, दु:ख के साथ-साथ आपने इतना बड़ा सुख पैदा कर रखा है, वह आप बड़ी होशियारी में छुपाए हुए हो। मिलते हैं न ऐसे लोग जहाँ तुम देखते हो कि व्यक्ति है, वो बड़ी दुर्दशा में है, हालत ख़राब है, रो भी रहा है, कलप भी रहा है, ज़िंदगी से पिट भी रहा है, लेकिन बदलने को राज़ी नहीं है। तो आपको ताज्जुब होता होगा कि, "बात क्या है? इस आदमी की हालत इतनी ख़राब है, यह बदलता क्यों नहीं, कुछ करता क्यों नहीं?"

आप धोखे में हो, आपको पूरी बात पता नहीं। आपको बस उस आदमी के दु:ख दिखाई दे रहे हैं, हक़ीक़त यह है कि उसने दु:ख में खूब सारा छुपा रखा है सुख। दु:ख वो प्रदर्शित कर देता है सार्वजनिक तौर पर, सुख वो चुपचाप रसास्वादन करता रहता है, एकांत में, मज़े लेता रहता है। इसलिए दु:ख नहीं छोड़ रहा क्योंकि दु:ख के साथ उसे खूब सारा सुख मिला हुआ है। आप कहोगे, "ये कौन सा सुख है साहब?" आपको पता ही नहीं फिर। मनहूसियत भरा जीवन बिताने में जो सुख है, किसी मनहूस से पूछो। बीमार बने रहने में जो सुख है, वह किसी बीमार से पूछो। ज़िंदगी के प्रति शिकायतों से भरे रहने में जो सुख है, वह किसी शिकायत करने वाले से पूछो। अपने-आपको दुर्बल और लाचार और शोषित बताने में जो सुख है, वह किसी शोषित से पूछो, किसी दुर्बल से पूछो।

और इन सब सुखों को हम सब ने चखा है, चखा है कि नहीं चखा है? बीमारी के मज़े कुछ होते हैं कि नहीं होते हैं? क्या मज़े होते हैं बीमारी के? बड़ी सहानुभूति मिलती है, कोई ज़िम्मेदारी नहीं बचती, छुट्टियाँ मिल जाती हैं। अब अगर कोई ऐसा हो जो सहानुभूति को बहुत बड़ा सुख मानना शुरू कर दे, तो फिर आश्चर्य क्या कि वह जीवन भर के लिए बीमारी को ही चुन ले क्योंकि बीमारी के साथ ही तो मिलेगी सहानुभूति।

अगर शिकायत करने में सुख मिलने लगे — क्या सुख? कि, "यह अच्छे आदमी हैं तभी तो इनके साथ बुरा हुआ। यह तो दुनिया का नियम है न देखो, सही लोगों के साथ ही ग़लत होता है। इनके साथ ग़लत हुआ है तो इससे क्या प्रमाणित होता है? यह सही हैं।" तो अब ये आदमी जीवन भर शिकायत ही तो करेगा न।

तो यह मत कहिए कि, "हमें दु:ख बहुत है आचार्य जी, लेकिन हम बदल नहीं पा रहे, हम क्या करें।" ईमानदारी के साथ मुझे बताइए सुख कहाँ-कहाँ पर है? सुख का रसगुल्ला तो छुपा रखा है, वह हमें कोई बताने ही नहीं आता। आचार्य जी किसलिए हैं? ज़िंदगी का जितना कचरा है, ले आकर इन पर डाल दो — आचार्य जी यह है। मेरी भैंस का पाँव टूटा हुआ है, बकरी भाग गई है, रसोई गंदी पड़ी है, पति दारु पीते हैं, लड़का खून पीता है — यह जितनी बातें आकर के सब आचार्य जी पर डाल दो और जो मज़े लूट रहे हो ज़िंदगी के, वह मत बताना।

मुझे कोई मिला ही नहीं जो आ करके मुझसे बाँटता हो, शेयर करता हो, “आचार्य जी, आज न बिलकुल गाड़ी छान कर आ रहा हूँ”, यह कोई नहीं बताएगा। जितने होंगे सब मनहूस शक्ल लेकर आएँगे, “आचार्य जी, अरे हम बर्बाद हो गए, अरे लुट गए।” क्या समझ रखा है हमें? कचरे का डब्बा हूँ? ज़िंदगी का सारा कचरा लाकर डाल देते हो। किसी ने अभी कहा था कि "आचार्य जी तो फिर भी बोलते वक़्त थोड़ा हँस देते हैं, मुस्कुरा देते हैं, ये लोग जो सवाल पूछते हैं, ये सीधे श्मशान से आए हैं क्या? कपड़े भी सफेद पहनते हैं, कुछ पक्का नहीं है ये सत्र होते कहाँ पर हैं।"

(श्रोतागण हँसते हैं)

तो इतने दुखी मत बनिए, इतने दुखियारी आप हैं नहीं। मज़े खूब लूट रहे हैं ज़िंदगी के, बस हमें नहीं बताते। और दु:ख अगर बुरे लगते हों तो यह जो गाड़ी छान रहे हो, जो मज़े लूट रहे हो, उन मज़ों से भी बाज आओ। जब तक वो मज़े चलेंगे, तब तक उनके साथ-साथ दु:ख भी चलेंगे। जब तक दु:ख मामूली लग रहे हैं और मज़े आकर्षक, तब तक जो चल रहा है वैसे ही चलेगा। जिस दिन दिख जाएगा कि उन मज़ों की, उन रसों की, उन खुशियों की कोई कीमत नहीं और उन खुशियों के कारण जो दु:ख झेलने पड़ रहे हैं, वो छाती पर पत्थर हैं, उस दिन सब दु:ख छोड़ दोगे। हमारे दु:ख बचे ही इसीलिए हुए हैं क्योंकि हम सुख के सौदागर हैं। तो कोई शिकायत करने ना आए कि जीवन में दु:ख बहुत है। दु:ख तो वो कीमत है जो हम अदा करते हैं सुख पाने के लिए। कीमत ज़्यादा लगने लगेगी, दु:ख अपने-आप छोड़ दोगे।

(शिविर के प्रबंधक को सम्बोधित करते हुए) अब से अगले शिविर से ये किया करो कि जितने लोग आएँ न, एक बगल में प्रोजेक्टर चला कर सब की फेसबुक प्रोफाइल खोल दिया करो। वहाँ पर तो सुख-ही-सुख नाच रहा होता है। वो वाले चेहरे भी तो दिखाई दें, जब यूँ (मुँह टेढ़ा) करके सेल्फी ली जाती है। यहाँ आधे लोगों की वैसी होगी, या आपकी नहीं होगी तो किसी और की होगी, उसने आपको टैग कर रखा होगा। उससे आपकी संगति का पता चलेगा कि ऐसे लोग तुम्हें टैग करते हैं, देखो। गुरु-घंटाल तक तो ठीक था, हमको चांडाल ही बना दिया जो श्मशान में घूमता है, यहाँ सब मुर्दे और भूत और प्रेत।

खुशियाँ बताइए खुशियाँ। ये देखो, ये देखो (हँसते हुए साधकों की ओर इशारा करते हुए)। मुझे खुशियों से आपकी कोई तकलीफ़ नहीं है, मैं बस यह बता रहा हूँ आपकी खुशियाँ बहुत महँगी हैं, वो लूट रही हैं आपको। आनंद मुफ़्त का होता है, खुशियाँ बहुत महँगी होती हैं। बोलो क्या चाहिए?

प्र: जब पढ़ते हैं, सुनते हैं या जब वीडियो देखते हैं तब तो हाँ यही लगने लगता है, मतलब ऐसा लगने लगता है कि ये सब मिथ्या चीज़ है, इसमें ज़्यादा नहीं उलझना है - पैसे में या घर में। लेकिन जब हम बाहर जाते हैं और दूसरे लोगों से बातें करते हैं और जब वो बताते हैं कि उन्होंने इतना बड़ा मकान ले लिया या ऐसा कुछ और, तो अंदर से एक इच्छा उठने लगती वहाँ पर कि हमारा भी ऐसा कुछ हो।

आचार्य: उसकी वज़ह है न, आप दंगल नहीं होने देतीं। एक है गामा पहलवान और एक है भीका पहलवान। आप जब गामा पहलवान के सामने होती हैं तो बस उसकी वर्जिश देखती हैं, उसकी ताक़त देखती हैं, वह अकेले खड़ा हुआ है और वह बता रहा है, "मैं ये, मैं वो" और आप कह रहीं हैं, "वाह! क्या धुरंधर है, क्या प्रबल है, क्या जोर है इसमें, क्या ताक़त है!" फिर गामा पहलवान को छोड़ करके थोड़ी देर में आप भीका के सामने चली गईं। और वहाँ भीका ने अपनी तंदुरुस्ती और अपनी ताक़त बतानी शुरू कर दी तो आप कह रही हैं, "वाह! भीका ही सही है। भीका कितना मस्त है, क्या बात है भीका की!" आप गामा के सामने भीका को और भीका के सामने गामा को कभी पड़ने ही नहीं देतीं। दंगल होने ही नहीं देतीं। दंगल हो तब पता चलेगा न कि ऊँट कौन है और पहाड़ कौन है।

यहाँ जब बैठती हैं तो यहाँ मेरी ही मेरी बात है। यहाँ उनको बिलकुल अलग, दूर कर देती हैं। क्यों दूर कर देती हैं? क्योंकि उनको यहाँ लाएँगी तो वो पिटेंगे। तो यहाँ उनका ज़िक्र ही नहीं करेंगे। गामा के सामने भीका को पड़ने ही मत दो। और फिर गामा अभी रवाना हो जाएगा, और आप चली जाएँगी भीका के क्षेत्र में, वहाँ उसी उसी की बातें हैं। वहाँ से गामा बिलकुल नदारद है, तो फिर वहाँ वही छा जाएगा आपके ऊपर। फैसला तो तब हो न जब या तो यहाँ आप उनकी बातें करें या उनके सामने मेरी बातें करें। दिल पर हाथ रख कर बताइए, आप दोनों में से कुछ भी होने देते हैं क्या? दंगल तो होने नहीं दे रहे। फिर कहेंगे, "हमें तो दोनों ही बातें ठीक लगती हैं, गामा भी भीका भी!"

जब आचार्य जी होते हैं तो आचार्य की बातें ठीक लगती हैं और जब टंडन ताऊ जी होते हैं तो उनकी बातें ठीक लगती हैं। अरे! टंडन ताऊ जी को यहाँ सामने तो लाओ। वो खुद ना आते हों तो उनका हाल बयान करो, तो फिर हम दें उन्हें कुछ पटकनी। या फिर हिम्मत करके उनके सामने हमारी बात करो। पर मुझे जितने लोग सुनने आते हैं, वह ये सावधानी पूरी बरतते हैं — मेरे सामने उनकी बात नहीं करेंगे, जो उनके ज़हन पर अन्यथा छाए रहते हैं। और जब वह अपने पारिवारिक, सामाजिक पुराने माहौल में वापस पहुँच जाएँगे तो वहाँ वह मेरा उल्लेख नहीं करेंगे। वहाँ कहेंगे, “नहीं, नहीं, वो तीन दिन ऐसे ही हम वो वहाँ मसूरी गए थे, मसूरी। नहीं, कोई ग़लत काम नहीं किया बिलकुल। शिविर इत्यादि कोई पाप नहीं किया हमने। मसूरी होकर आए हैं।” अरे! वहाँ मेरी बात छेड़ो तो, तब पता चले न दूध-का-दूध पानी-का-पानी कुछ। वहाँ करते नहीं, तो वही होगा फिर जो हो रहा है कि यह बात भी ठीक लगती है, और भैया वो बात भी ठीक लगती है। जैसे फुटबॉल के मैदान में दो टीमें आमने-सामने खड़ी हैं, कैमरा एक टीम पर जा रहा है और वहाँ वो बस वो दर्शकों को अभिवादन करते हुए खड़े हुए हैं और फिर कैमरा दूसरी टीम के सामने जा रहा है, वहाँ वो भी केवल अभिवादन कर रहे हैं। मैच होने ही नहीं दे रहे, तो फिर फैसला कैसे होगा?

अब वो तो यहाँ आएँगे नहीं, और उनकी बात भी आप यहाँ खुल्लम-खुल्ला करेंगे नहीं, क्योंकि शायद परिवेश ऐसा है कि आप हर बात उघाड़ना ना चाहें। तो ऐसा करिएगा, अगली बार जब आएँ ताऊजी तो घर में जो भी टीवी हो सबसे बड़ा, उस पर फुल वॉल्यूम में आचार्य जी को गरजने-बरसने दीजिएगा। फिर देखिए क्या होता है, बड़ा मजा आएगा!

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