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सब महापुरुष कभी तुम्हारी तरह साधारण ही थे || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: आचार्य जी, मुझे अपने बारे में बताना कि मैं कैसा हूँ। मुझे बहुत भय लगता है, खासकर के महापुरुषों, जैसे आपके सामने।

आचार्य प्रशांत: (हँसते हैं) महापुरुष किसको बोला? दोबारा मत बोलिएगा! (हँसते हुए) गाली दे रहे हैं?

ये अच्छा खेल है न? वही जिसकी चर्चा आज शुरू में करी थी। दूसरे को महापुरुष बना दो ताकि उससे कोई नाता रखना ही न पड़े। ठीक यही कहा है अभी, कि, “मुझे आपके सामने खुलना, आपको अपने दिल की बात बताना बड़ा मुश्किल लगता है क्योंकि आप तो साहब महापुरुष हैं।" बता ही नहीं पाएँगे। बिल्कुल नहीं बता पाएँगे। अगर मैं महामानव हो गया, और आप साधारण मानव, तो हमारा क्या रिश्ता हो सकता है? कुछ भी नहीं हो सकता। क्या रिश्ता है? कुछ नहीं।

और मुझे महामानव बना कर, आपने अपने आपको अधिकार दे दिया, लाइसेंस दे दिया, साधारण मानव बने रहने का। है न? और क्या कह रहे हैं आगे?

प्रश्नकर्ता (प्र): भय चला जाए, ऐसा कोई उपाय बताएँ।

आचार्य जी: वही कर रहा हूँ।

हम बदलना नहीं चाहते, इसके लिए हम तरीक़े-तरीक़े के उपाय करते हैं। एक उपाय ये है कि जो कोई हमसे आगे हो, उसको घोषित कर दो - ‘महापुरुष’, और फिर बोल दो, “वो तो महापुरुष हैं, मैं तो छोटा आदमी हूँ, तो मैं उनके जैसा जीवन थोड़े ही जी सकता हूँ।”

फिर पूछ रहा हूँ, महापुरुष बोला किसको? दोबारा मत बोलना!

जो ज़िंदगी आपने जी है, मूलभूत रूप से वही ज़िंदगी मैंने जी है। क्यों? क्योंकि मूलभूत रूप से जो शरीर आपके पास है, वही मेरे पास है भाई! जहाँ शरीर है वहाँ वृत्तियाँ हैं। जहाँ से आपने शुरुआत करी है, ठीक वहीं से मैंने शुरुआत करी है। आपको हो सकता है रास्ते में जो गाँव-शहर मिले हों, उनके नाम कुछ और हों, मुझे जो गाँव-शहर मिले, उनके नाम कुछ और हों, लेकिन रास्ते में गाँव-शहर आपको भी मिले हैं, मुझे भी मिले हैं। समझ रहे हैं बात को?

मुझे इतनी दूर का मत बना दीजिए कि आपको सहूलियत हो जाए वहीं बैठे रहने की जहाँ आप बैठे हैं, क्योंकि मैं उतनी दूर हूँ नहीं। आपके लिए बहुत आसान है उठकर के मुझ तक आना।

हम एक सुविधाजनक विभाजन करते हैं: साधारण लोग और असाधारण लोग। और जो साधारण है, उसका काम है साधारण ही रह जाना। और जो असाधारण है, "उसको तो भाई दैवीय भेंट मिली हुई थी। वो तो जन्म से ही अद्वितीय था। उसपर तो ईश्वरीय अनुकम्पा थी।” किसी पर कोई ईश्वरीय अनुकम्पा नहीं होती; सब अपना रास्ता चलते हैं, तय करते हैं। जैसे आप चल रहे हो, वैसे ही मैं भी चला हूँ, वैसे ही सब चल रहे हैं।

अभी गांधी जयंती थी, दो तारीख़ को। एक लेख लिखा था मैंने छोटा-सा, पढ़ा था आप लोगों ने? उसमें वही तो बताया था कि महात्मा गांधी बड़े अच्छे उदहारण हैं ये देखने के लिए कि मिट्टी से कोई उठकर कोई महात्मा कैसे बनता है। आप जितने तरीक़े के दोष सोच सकते हैं, सब महात्मा गांधी में थे। जिन-जिन बातों को आप कहते हैं कि, “अरे! ये तो मुझमें होनी नहीं चाहिए!”, वो सब उनमें मौजूद थी। और उन सब बातों के साथ आगे बढ़ते गए। गांधी जी आगे बढ़ गए, वो बातें पीछे छूट गईं। भय उनमें था, दूसरों से प्रभावित हो जाने की वृत्ति उनमें थी, अज्ञान उनमें था, कामवासना उनमें थी, और ये सब भी थोड़े बहुत नहीं, भरपूर मात्रा में। जितने आप में हैं उतने ही, बल्कि हो सकता है उससे ज़्यादा। इन सब दोषों को देखते गए, और उनसे मुक्त होते गए। साधना करी उन्होंने, लंबी।

इस मामले में वो बहुत अच्छे उदहारण हैं, क्योंकि पास के हैं, उनका जीवन उपलब्ध है, सप्रमाण उपलब्ध है। जो पीछे वाले होते हैं न, दूर के, मान लो हज़ार साल पीछे के, उनके साथ हमको बड़ी सुविधा हो जाती है। हम क्या घोषित कर देते हैं? कि, “जब फलाने का जन्म होने वाला था तब उनकी माताजी के सपने में विष्णु भगवान आए, और उन्होंने कहा कि ये जो नक्षत्र है, ये अति-विरल है, ये दस हज़ार साल में एक बार आता है। और आज तुम्हारे यहाँ जिस बालक का जन्म होगा, देवी, वो मेरा ही अवतार है। और जब वो बालक पैदा हुआ तो उसके शरीर पर गदा, शंख, और पुष्प आदि निशान पहले से ही मौजूद थे। और बच्चा पैदा होकर रोया नहीं, बोला, ‘हरी ॐ!’”

फैला दो इस तरह की कहानियाँ। फैला दो कि वो तो पैदा ही विशेष हुए थे। गांधी जी के साथ कम-से-कम हम ये अन्याय नहीं कर सकते कि हम ये कहानी फैला दें कि वो पैदा ही विशेष हुए थे। तो इसलिए मैंने उनके जन्म-दिवस पर कुछ बात कही। पुराने लोगों के साथ बड़ी दिक़्क़त हो जाती है।

कबीर साहब से बड़ा प्रेम है मुझे, लेकिन उनके बारे में भी न जाने कितनी कहानियाँ फैला दीं! कहानियाँ क्या, अफवाहें हैं, बेकार की बातें! “कमल के पुष्प पर मिले थे।” हैं? इतना बड़ा कौन-सा कमल का पुष्प होता है कि उसपर बच्चा लेटा दो? और पता नहीं कितनी बातें! कोई बोल रहा है गोरखनाथ को हरा दिया, कोई बोल रहा है फ़रीद से मिले थे। गोरखनाथ चार-सौ साल पहले के, फ़रीद उनसे तीन-सौ साल पहले के, कहाँ से मिल लिए?

पुराने लोगों के साथ ये बड़ी समस्या है — हम उनको जीने ही नहीं देते। हम उनकी जीवनी में तमाम तरह के मिश्रण कर देते हैं, घपला कर देते हैं। और हम उनको क्या बना देते हैं? अति-मानव, सुपर ह्यूमन!

कोई नहीं होता सुपर ह्यूमन भाई! सब साधारण मिट्टी के ही बने होते हैं; सब ने एक-सा ही जन्म लिया है। और अगर सबने एक-सा ही जन्म लिया है तो जो ऊँचाई किसी कृष्ण, किसी बुद्ध को मिलती है, वो आपको भी मिलनी चाहिए। वो आपकी ज़िम्मेदारी है। आपको अगर नहीं मिली, तो ये कहकर अपना बचाव मत करिए कि, “कृष्ण तो ख़ास थे न! वो तो विष्णु के अवतार हैं। हम थोड़े ही विष्णु का अवतार हैं।” कोई नहीं होता विष्णु का अवतार! या ये कह लीजिए कि विष्णु के अवतार सब ही होते हैं।

पर भेद मत करिए। या तो ये कहिए कि कोई विशिष्ट व्यक्ति विष्णु का अवतार नहीं होता, या फिर ये मानिए कि एक-एक प्राणी विष्णु का अवतार ही है, और सबमें विष्णु का अंश मौजूद है। बाकी ये तो अपनी ज़िम्मेदारी है, और अपनी नियत, और अपना इरादा है कि हम अपने भीतर के विष्णुत्व को साकार करते हैं कि नहीं, प्रकट होने देते हैं कि नहीं। पर ये मत कहिए, कृपा करके, कि कोई जन्म से ही ख़ास है या कि कोई चोसेन वन है, सिलेक्टेड वन है, कि किसी का जन्म ही हुआ था मानवता को बचाने के लिए। ये मत करिए, ये बहुत ग़लत है।

सब एक-से हैं। अब ज़िम्मेदारी बढ़ी न आपकी, कि, "अगर राजकुमार सिद्धार्थ बुद्ध बन सकते हैं तो मैं बुद्ध क्यों नहीं बना?” और सिद्धार्थ गौतम ने भी बड़ा साधारण जीवन जिया था, बल्कि विलासिता से भरपूर, अय्याशी। तमाम तरह की सुख-सुविधाएँ उपलब्ध हैं। कहा जाता है कि उनके पिताजी पूरे राज्य भर की, छोटा-सा ही राज्य था, सुन्दर जितनी कन्याएँ होती थीं, उन सब को ले आते थे - “बेटा, डेटिंग करो!” फिर शादी भी हो गयी। और शादी भी जिससे हुई, वो भी बड़ी सुन्दर, मोहिनी स्त्री। फिर बच्चा भी कर लिया। ये सब साधारण जीवन के लक्षण हैं, या विलक्षण जीवन के? ये सब काम कौन करते हैं — साधारण आदमी या अद्भुत आदमी? साधारण आदमी ही न?

लेकिन हमने कहानियाँ जोड़ दी हैं। कहानियाँ क्या जोड़ी हैं? कि जब बुद्ध पैदा हुए तो हिमालय से एक बहुत बुड्ढा साधू उतर कर आया!” हैं भई? कौन-सा कम्युनिकेशन (संचार) हुआ था? कौन-सा नेटवर्क था कि वहाँ वो यही ख़राब लेता रहता था कि कहाँ कौन बच्चा पैदा हो रहा है?

और उसने आकर के बुद्ध के पिताजी से कहा, "तुम्हारे यहाँ ये जो बच्चा पैदा हुआ है, मैं इसके चरण स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि मुझे पता नहीं कि जब तक ये बड़ा होगा मैं बचूँगा कि नहीं, पर मैं इतना बताए देता हूँ कि ये जो बच्चा पैदा हुआ है, या तो ये चक्रवर्ती सम्राट निकलेगा, या फिर बहुत बड़ा संत, महात्मा।” तो हमने बना दी न कहानी कि बुद्ध तो पैदा ही ख़ास हुए थे, और उनकी ख़ासियत का पता चल गया था वहाँ दूर हिमालय पर बैठे किसी साधु को।

किसी को कुछ नहीं पता चलता, बेकार! ये सब हमारी साज़िश भरी कहानियाँ हैं, अपने ही ख़िलाफ़ साजिश करते हैं हम। हमने घोषित कर दिया कि बुद्ध तो विशेष हैं, जन्मजात विशेष हैं, और हम तो विशेष हैं नहीं, तो हमें छुट्टी मिल गई! तो जितने अच्छे-अच्छे काम करने हैं, वो बुद्ध करें, और जितने घटिया-घटिया काम करने हैं, वो हम करेंगे!

क्या खेल खेला है, गजब!

हद्द है!

वो भी ऐसे ही थे। ऐसे ही उन्होंने भी राज्य भोगा है, विलासिताएँ भोगी हैं। ऐसे ही उन्होंने भी सब लड़कियाँ भोगी हैं, उसके बाद ब्याह भी लाए हैं, उसके बाद बच्चा भी पैदा कर दिया है। उन्हें भी वही सब कुछ दिख रहा था जो आपको दिखता है। वैवाहिक जीवन में उनका भी दम घुटा होगा, जैसे सबका घुटता है, पर उन्होंने फिर एक निर्णय लिया जो सब लोग नहीं ले पाते। उन्होंने कहा, “सच्चाई, उसमें जीना है। ये जो पूरा खेल चल रहा है, मुझे अब समझ में आ रहा है कि ये फ़साऊँ खेल है। और इसमें मैं ही नहीं, पूरा जगत फँसा हुआ है। संसार का नाम ही दुःख है।” उन्होंने कहा, “दुःख से मुक्ति चाहिए। अपने ही लिए नहीं, सबके लिए चाहिए।”

ये एक निर्णय था; ईश्वरीय अनुकम्पा नहीं थी, व्यक्ति का निर्णय था। समझिए बात को। एक इंसान ने निर्णय लिया कि — "जैसे जी रहा हूँ वैसे नहीं जीऊँगा।" वो निर्णय लेना सबकी ज़िम्मेदारी है। आपकी भी ज़िम्मेदारी है। आप क्यों नहीं ले रहे निर्णय? क्योंकि आपको एक छाँव, एक ढाल, एक बहाना मिल गया है। क्या? “बुद्ध तो महापुरुष थे, वो कोई भी निर्णय ले सकते हैं, मैं तो साधारण पुरुष हूँ।” बुद्ध का दिल भी काँपा होगा ये निर्णय लेने में। उन्होंने भी अकस्मात नहीं ले लिया होगा। कहानी तो कहती है कि वो जा रहे थे और फिर बस उन्होंने तीन बार, तीन चीज़ें देखीं, और उन्होंने कहा, “नहीं नहीं, मैं छोड़कर जा रहा हूँ।” ऐसा कैसे हो सकता है? उन्होंने कोई बुड्ढा आदमी नहीं देखा था पहले? उनके माँ-बाप नहीं बुढ़ाए थे? बताइए?

कहानी कहती है कि बुद्ध ने देखा एक बूढ़ा आदमी, एक बीमार आदमी और एक मृत आदमी, और ये सब देखकर उन्होंने कहा, “अरे! अगर जीवन ऐसा है तो जीवन तो दुःख से परिपूर्ण है, और मुझे कुछ करना होगा।” राजमहल में कोई बीमार नहीं पड़ता था क्या? और तो छोड़ दो, बुद्ध के माता-पिता बूढ़े नहीं हो गए थे? तो ऐसा कैसे हुआ कि उन्होंने पहले कोई वृद्ध देखा ही नहीं था? निश्चित रूप से देखा था। देखते आ रहे थे, भीतर आत्म-मंथन चल ही रहा था; अचानक, यकायक कुछ नहीं हो गया। देख रहे थे, सोच रहे थे, समझ रहे थे, विचार कर रहे थे, और फिर धीरे-धीरे निर्णय करते गए, आगे बढ़ते गए।

ये निर्णय करना, मैं कह रहा हूँ, हम सबका दारोमदार है। आप क्यों नहीं करते ऐसे निर्णय? आप अपना बुद्धत्व क्यों जगा नहीं रहे हैं? क्यों उसे सोए रहना देना चाहते हैं? बोलिए।

मुझे सख़्त ऐतराज़ है अगर मुझे ख़ास बोला जाए, या महापुरुष बोला जाए, या कुछ भी और बहुत आभूषित उपाधि दी जाए। बिल्कुल आपके जैसा हूँ। समझ में आ रही है बात? बिल्कुल आपके जैसा हूँ, और जो मैं ये आपसे बात भी बोल रहा हूँ, साहब, ये आपकी ही बात है। आपको पता नहीं क्या? ये जो मैं आपसे बात बोल रहा हूँ, ये बातें आपको मेरे बोलने से पहले नहीं पता थीं क्या? सब पता थीं। मैं आपकी ही बात को आप तक पहुँचा रहा हूँ। मैं आपकी ही उस बात को आप तक पहुँचा रहा हूँ, जो आमतौर पर आप अपने आप से करते नहीं।

ये जो बात मैं आपसे कह रहा हूँ, ये किताबी ज्ञान नहीं है, ये आत्मिक ज्ञान है। और आत्माएँ अलग-अलग तो होती नहीं हैं। तो जो बात मुझे पता है, वो बात आपको भी पता है। इसीलिए तो ये सारी बातें आप तत्काल समझ जाते हैं।

समझ जाते हैं कि नहीं?

भले ही बात सुनने में कितनी भी उलटी-पुलटी और अटपटी हो, पर आप कहते हैं, “ठीक, आ रही है बात समझ में।" कैसे समझ में आ रही है? क्योंकि वो बात आपको पहले ही समझी हुई है। वो अंतर-ज्ञान है। बस आप बड़े खिलाड़ी हैं, आप वो बात अपने आप से खुद नहीं बोलते, मेरे मुँह से कहलवाते रहते हैं - “तुम बोलो न!”

हैं भई? मैं आपका माउथ-पीस (मुखपत्र) हूँ बस। मैं क्या हूँ आपका? माउथ-पीस; आपका प्रतिनिधि, रिप्रेज़ेन्टेटिव। गुरु इत्यादि मत बोल दीजिएगा। क्या हूँ? प्रतिनिधि। मैं आपसे आपकी ही बात कर रहा हूँ। ऐसे समझ लीजिए कि कोई जैसे ख़ास आईना हो, जिसके सामने आप गंदी शक्ल लेकर भी खड़े हो जाएँ तो वो आपको आपकी गंदी शक्ल के पीछे की साफ़ शक्ल दिखा दे। ऐसा कोई आईना हो सकता है न? जैसे एक्स-रे मशीन होती है भाई, उसके सामने तुम माँस भी लेकर खड़े हो जाते हो तो वो माँस के नीचे की हड्डी दिखा देती है न? तो वैसे ही कोई आईना भी हो सकता है जिसके सामने तुम चेहरे पर कुछ भी चुपड़कर खड़े हो जाओ, पर वो दिखा देगा असली शक्ल। हो सकता है कि नहीं? तो मैं वैसा आईना भर हूँ। मैं कुछ नया नहीं दिखा रहा आपको। मैं आपको आपकी ही वो साफ़-सुथरी शक्ल दिखा रहा हूँ जिसको आपने गंदगी के पीछे छुपा रखा है। अब उस नाते मुझे गुरु बोलना बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है।

गुरु क्या होता है? गुरु बोलकर तो दूरी बना लेते हो। फिर वही महापुरुष वाली बात कर दी! मार्गदर्शक बोल लो, प्रतिनिधि बोल लो, बस एक वक्ता बोल लो। यहाँ उद्देश्य ये थोड़े ही है कि बोलो, “जय गुरुदेव!” उद्देश्य दूसरा है।

ये बात आ रही है समझ में? नहीं आ रही?

जिसे साधारण, सामान्य जीवन बोलते हैं, कॉर्पोरेट-लाइफ़, हाउस-होल्डर्स लाइफ़, उससे हट करके थोड़ा-सा जो ये मैंने जीवन चुना है, वो इसलिए चुना है क्योंकि मुझे कुछ बदलाव देखने हैं। वो बदलाव आ पाएँ, तो ही मेरा काम सार्थक हो रहा है, तो ही मुझे किसी तरह का आनंद भी है; नहीं तो जो मेरा पूरा प्रोजेक्ट है, अभियान, वो विफल ही हो गया न? तो आपसे भी मुझे क्या चाहिए? महापुरुष की उपाधि नहीं चाहिए अपने लिए, मुझे आपसे वो बदलाव चाहिए जो मैं देखना चाहता हूँ। 'मैं देखना चाहता हूँ' - इसका मतलब ये नहीं कि वो बदलाव ‘मैं’ ही देखना चाहता हूँ। वो बदलाव भी वही है जो आप भी देखना चाहते हैं। कहा न - आपका प्रतिनिधि हूँ।

तो जब मैं कहूँ कि — "मैं कोई बदलाव देखना चाहता हूँ," तो वो वही बदलाव है जो वास्तव में आप भी अपने जीवन में देखना चाहते हैं, पर न जाने क्यों उस बदलाव को लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। उस बदलाव को लाने की प्रेरणा नहीं इकट्ठा कर पा रहे। तो मैं आपसे आपकी ही बात कर रहा हूँ। मेरे पास कहने के लिए कुछ नया या बाहरी नहीं है। इसका मतलब ये है कि मैं आपके ऊपर बहुत सारी ज़िम्मेदारी रख रहा हूँ। मैं अपने ऊपर नहीं ले रहा हूँ ज़िम्मेदारी। आईना क्या ज़िम्मेदारी लेगा? आईना तो बस ये बता सकता है कि, “देखो, जो तुमने अपनी गंदी शक्ल बना रखी है, उसके पीछे तुम्हारी एक बहुत साफ़-सुथरी शक्ल भी है।“ आईने ने दिखा दिया, अब गंदगी साफ़ करने की ज़िम्मेदारी किसकी है?

किसकी है?

प्र: हमारी।

आचार्य जी: यही बदलाव देखना है मुझे!

और मैं अपने आप को क्यों बीच में लाऊँ, आपको भी तो यही बदलाव देखना है न?

(श्रोतागण 'हाँ' में सिर हिलाते हैं)

हाँ!

तो जो आप करना चाहते हैं वास्तव में, उसे करिए, और कोई बात नहीं।

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