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स्त्री-पुरुष के मध्य आकर्षण का कारण || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्न: आचार्य जी, प्रणाम।

प्रेम क्या है? हम किसी स्त्री से प्रेम क्यों करते हैं? स्त्री-पुरुष के मध्य जो आकर्षण होता है, उसका क्या कारण है? स्त्रियों के प्रति जो सकारात्मक या नकारात्मक विचार आते हैं, उनका कारण क्या है?

आचार्य प्रशांत जी: तुम करते हो, तो तुम बताओ न। कोई अज्ञात बात होती, तो मैं बताता। जो तुम कर रहे हो, वो तो तुम ही बताओगे न कि क्यों कर आए। मुझे क्या पता।

और ऐसा भी नहीं कह रहे तुम कि, एक बार ऐसा क्यों हो गया। तुम कह रहे हो, “हम ऐसा क्यों करते हैं?” इसका मतलब बारम्बार हो रहा है, होता ही जा रहा है। तो तुम बताओ कि ये हो क्या रहा है। मुझे क्या पता। जो कुछ होता है तुम्हारे साथ, उसकी ख़बर लेते हो कि – “ये क्या हो गया?” या फ़िर फिसल जाते हो बस कि – “बस हो गया।”

चलो हो गया। फ़िर? “अरे फ़िर से हो गया।” फ़िर? “अरे फ़िर से हो गया।” होता ही जा रहा है। जितनी देर में खड़े होते हो कि हाथ बढ़ाएँ कि न फिसलो अब, तुम फ़िर गिर गए। और हाथ यहाँ जा रहा है, तुम नीचे ज़मीन पर हो, फ़िर फिसल गए।

इतना भी अचानक नहीं हो जाता, सोचा-समझा निर्णय होता है। माना कि काम बेहोशी में होता है, पर पूरे बेहोश नहीं होते तुम।

सहमति तो तुम्हारी होती है, कि – “चीज़ मज़ेदार है, मौका कौन चूके।” या एकदम यकायक हो जाता है, कि – “हम क्या करें? हो गया”? बात सीधी है – मज़ा आता है। बात इतनी सीधी है कि इसमें मैं समझाऊँ भी क्या। नहीं है? सेब खाते हो, मज़ा आता है ज़ुबान को। कोई मालिश करे, मज़ा आता है पीठ को। वैसे जननांग होते हैं, उन्हें यौन सुख चाहिए। इसमें लोग जिज्ञासा करते क्यों हैं, मैं तो ये नहीं जान पाता।

पुरुष जननांग है, स्त्री जननांग है, दोनों एक-दूसरे की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी को तुम बोलते हो ‘आकर्षण’। और क्या है? इसमें छुपा हुआ क्या है। इसमें क्या ऐसा है जो ख़ुफ़िया है? कुछ नहीं। बात शारीरिक है पूरी, और रासायनिक है पूरी।

तुम्हारे शरीर के भीतर कुछ रसायन हैं, स्त्री के शरीर के भीतर कुछ दूसरे रसायन हैं, वो हैं ही इस तरीक़े के कि एक दूसरे की ओर खिचेंगे। इसमें क्या पूछते हो कि – “मैं स्त्री की ओर क्यों खिंचता हूँ?” क्योंकि हॉर्मोन (रसायन) है इसलिए। लेकिन याद रखना, हॉर्मोन मालिक नहीं होते, हॉर्मोन को भी इजाज़त तुम देते हो। और इजाज़त तो छोड़ दो, कई बार तो उन हॉर्मोन्स को भड़काते भी तुम हो।

हॉर्मोन बेचारा चुपचाप भी बैठा होगा, तो तुम उसे घिस-घिस कर उत्तेजित करोगे, कि – “उठ, जाग, दर्दे दिल जाग।”

इसमें कोई मिस्ट्री (रहस्य) नहीं है। कृपा करके इसको कोई रहस्यवादी आयाम मत दीजिए। स्त्री-पुरुष आकर्षण में कोई रहस्यवाद नहीं है, कोई मिस्टिसिस्म नहीं है। पूरी प्रकृति में यही चल रहा है – नर-मादा, नर -मादा, नर-मादा। इसमें क्या रहस्य है?

‘प्रकृति’ का मतलब है – प्रजाति आगे बढ़नी चाहिए। नर-मादा आकर्षित होते रहते हैं, ताकि बच्चे पैदा हों, प्रजाति आगे बढ़े। प्रकृति का बन्दोबस्त है, इसीलिए उसने तुम्हारे शरीर में हॉर्मोन छोड़े हैं, ताकि प्रजाति आगे बढ़ती रहे। नहीं तो प्रजाति ही विलुप्त हो जाएगी।

ये प्रकृति का चाहना है – तुम कैसे भी रहो, प्रजाति आगे बढ़नी चाहिए। बल्कि जो जितना गया-गुज़रा होता है, वो उतना प्रजाति को आगे बढ़ाता है।

ख़रगोश देखा है कितने बच्चे पैदा करते हैं? और ख़रगोश इतने कामुक होते हैं, कि भाषा में मुहावरा आ गया है – “डोंट ब्रीड लाइक रैब्बिट्स (ख़रगोशों की तरह प्रजनन मत करो)।” क्योंकि वो दो -चार महीने का होता नहीं कि शुरु हो जाता है। और एक बार में मादा ख़रगोश कभी दो, कभी चार, कभी छः ख़रगोश पैदा करती है। बताओ क्यों?क्योंकि कमज़ोर है। जो जितना कमज़ोर होगा, वो उतने बच्चे पैदा करेगा। शेर कितने पैदा करता है एक बार में?

श्रोतागण: एक।

आचार्य प्रशांत जी: एक, नहीं तो दो।

और शेर का एक शावक पैदा होगा सालों में। और ख़रगोश छः महीने को होता नहीं, बाप-माँ सब बन जाता है, क्योंकि कमज़ोर है। कमज़ोर है तो बहुत बच्चे चाहिए। जो जितना मज़बूत होगा, उसे बच्चे की उतनी कम आकाँक्षा रहेगी – शारीरिक रूप से भी, मानसिक रूप से भी।

ख़रगोश को पता है कि बहुत सारे पैदा होंगे, तब कुछ बचेंगे, तो इतने सारे पैदा होने चाहिए। शेर कहता है, “हमारा कौन क्या बिगाड़ लेगा। एक बहुत है। जंगल को उत्तराधिकारी ही तो चाहिए।” राज्य को कितने युवराज चाहिए होते हैं? एक। बहुत है।

तो ये है स्त्री-पुरुष का खेल।

हमारे भीतर एक कमज़ोरी बैठी हुई है, वही हमसे ये सब काम कराती है। इसको ये मत कह देना कि – “ये नेचुरल (स्वाभाविक) है।” जो कहते हैं “ये नेचुरल है,” वो ‘नेचर(स्वभाव)’ का अर्थ नहीं समझते। वो प्रकृति को नेचर(स्वभाव) समझ रहे हैं। उन्हें आत्मा का कुछ पता नहीं।

जानवर के लिए प्रकृति नेचर (स्वभाव) है, मनुष्य के लिए प्रकृति नेचर (स्वभाव) नहीं है। जानवर के लिए नेचर (स्वभाव) है – प्रकृति। मनुष्य के लिए नेचर (स्वभाव) है – आत्मा।

तो मूढ़ता में इस तरह की बातें मत बोल दिया करो कि – “अरे स्त्रियों की तरफ़ आकर्षित होना तो नेचुरल है न।”

बल्कि और चले आते हैं सूरमा कि – “अरे! हम नपुंसक हैं क्या कि स्त्रियों की ओर आकर्षित नहीं होंगे। ये तो नेचुरल (स्वाभाविक) चीज़ है, ये तो होनी ही चाहिए। ये तो हमारे पौरुष का सबूत है।” पुरुष तुम होंगे, पर विक्षिप्त। पौरुष तो तुम्हारा पता नहीं, पागलपन तुम्हारा ज़रूर है जो तुम बता रहे हो कि स्त्रियों की ओर भागना नेचुरल चीज़ है। वो नेचुरल चीज़ नहीं है।

सांड, गाय की ओर भागे ये नेचुरल (स्वाभाविक) है, क्योंकि सांड का नेचर (स्वभाव) है प्रकृति। पर मनुष्य भागे अगर स्त्री की ओर, तो ये नेचुरल नहीं है। तुम्हारा स्वभाव आत्मा है, तुम्हें सांड और गाय की तरह व्यवहार नहीं करना है।

सांड के लिए ऊँचे-से-ऊँचा लक्ष्य यही है कि – खाओ, और बछड़े-बछिया पैदा करो। उसको दो ही चीज़ें चाहिए – बढ़िया घास, और बढ़िया गाय। तुम्हें भी क्या यही चाहिए? तुम सांड हो?

तुम्हारी ज़न्दगी के दूसरे लक्ष्य हैं। तुम्हें जीवन में बहुत ऊँचे काम करने हैं, और अंततः तुम्हें मोक्ष चाहिए, तुम्हें मुक्ति चाहिए। वो है तुम्हारा स्वभाव, वो है तुम्हारा नेचर – आत्मा। तुम्हें आत्मा चाहिए।

सांड को कोई परेशानी नहीं होगी अगर उसे मुक्ति नहीं मिलती, तुम जीवन भर बेचैन रहते हो अगर तुम्हें मुक्ति नहीं मिलती। तुममें और सांड में अंतर है। मत कह दिया करो कि – “ये सब तो स्वाभाविक चीज़ें हैं।” नहीं हैं स्वाभाविक।

बात कुछ समझ में आ रही है?

अपने आप को पशुओं के तल पर मत ले जाया करो, और अपने नाजायज़ कामों को जायज़ करने के लिए पशुओं से सम्बन्धित तर्क मत लिया करो। जानवर कोई काम करे, तो वो ठीक हो सकता है, क्योंकि वो बेचारा जानवर है। वही काम तुम करोगे तो वो ठीक नहीं होगा, क्योंकि तुम जानवर नहीं हो।

मैं समझाता हूँ – माँस मत खाओ, लोग कहते हैं, “जानवर भी तो माँस खाते हैं। शेर ने इतना माँस खाया, तो क्या शेर पापी हो गया?” तुम शेर हो? शेर तो दहाड़े तो जंगल थर्राता है, तुम ज़रा दहाड़कर दिखाना। तुम्हें और शेर को आमने -सामने खड़ा कर देते हैं, फ़िर पता चल जाएगा कि शेर कौन है।

जो बचे, वो शेर।

माँस खाने के लिए तर्क दिया जाता है कि – “शेर भी तो माँस खाता है। हम माँस नहीं खाएँगे तो शेर कैसे बनेंगे?” अच्छा अगर शेर बनना है, तो जंगल में छोड़ देते हैं, क्योंकि शेर तो आकर अपार्टमेंट में रहता नहीं, फ़िर सारे काम शेर जैसे करो। शेर तो यूनिवर्सिटी-कॉलेज जाता नहीं, टी.वी. देखता नहीं। ये सब काम बंद करते हैं क्योंकि तुम कह रहे हो कि – “शेर माँस खाता है, तो हम भी माँस खाएँगे।” सारे काम फ़िर शेर जैसे करो। उदाहरण लो तो फिर पूरा लो।

शेर को बहुत कुछ करने का हक़ है क्योंकि उस बेचारे की प्रज्ञा कभी जागृत ही नहीं हुई, उसका बोध कभी जगा ही नहीं। तो अब वो माँस खाए, या कुछ करे, उसे अब कोई पाप नहीं लगना। वो एक तरह की बेहोशी में जी रहा है। और बेहोश आदमी को कोई पाप नहीं लगता। न्यायालय भी नशे में किए अपराध को कम सज़ा देते हैं। माना जाता है कि तुमने जो किया, वो गैर-इरादतन था, क्योंकि तुम नशे में थे।

और तुम अगर पागल ही साबित हो जाओ, तो तुम्हें कोई सज़ा नहीं मिलेगी। तुमसे कोई अपराध हो गया, लेकिन अगर न्यायालय में ये साबित हो जाए कि तुम पागल हो इसीलिए तुमने ये अपराध किया, तो तुम्हें कोई सज़ा नहीं मिलती।

इसी तरह शेर कुछ भी करे, उसे कोई सज़ा नहीं मिलेगी क्योंकि उसके पास बुद्धि की, बोध की सम्भावना ही नहीं है। तो उसे कोई सज़ा नहीं मिलती। हाँ, तुम वही काम करोगे जो शेर कर रहा है, तो बहुत गहरी सज़ा मिलेगी, क्योंकि तुम मनुष्य हो, तुम बोधवान मनुष्य हो। तुम्हें बोध के अनुसार काम करना चाहिए था, प्रकृति के अनुसार नहीं।

ये दो अलग-अलग केंद्र होते हैं काम करने के। तुम प्रकृति के चलाए भी चल सकते हो, और बोध के चलाए भी चल सकते हो। प्रकृति के चलाए चलोगे तो महापाप होगा, उसकी सज़ा मिलती ही मिलती है। बोध के चलाए चलोगे तो मुक्ति पाओगे, जो जीवन का परम लक्ष्य है।

समझ में आ रही है बात?

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