प्रश्नकर्ता: इस घाट पर, आचार्य जी, ये तीन मूर्तियाँ हैं, और इनको देख कर एक जिज्ञासा उठ रही है: जो देवी की मूर्ति है ये इतनी बड़ी है, और जब हम ऋषि की मूर्ति देखते हैं तो वो उनके सामने बड़ी छोटी मालूम होती है। देवी ऋषि से बड़ी हैं ये बात तो फिर भी एक बार को चलिए समझ में आ जाती है, अब जब इधर मुड़ेंगे तो देखेंगे कि देवी शिव जी की मूर्ति से भी तीन गुना बड़ी हैं। शिव जी तो देव-आदिदेव महादेव हैं, उनका कद तो सबसे ऊँचा है, देवी कैसे शिव से बड़ी हुईं?
आचार्य प्रशांत: तो इसमें तुम्हें अचरज क्या लग रहा है? एक मूर्ति का आकार बड़ा है, दो मूर्तियों का आकार छोटा है, इसमें अचरज क्यों लग रहा है, पहले इस पर गौर करो।
प्र: क्योंकि हमेशा से जब हम राम जी, लक्ष्मण जी, सीता जी और हनुमान जी वाली फोटो (तस्वीर) देखते हैं तो उसमें अपफ्रंट (अग्रिम) तो रामजी होते हैं, मेन (मुख्य), फिर सीता जी होती हैं, फिर लक्ष्मण जी होते हैं, फिर सेवक या उपासक।
आचार्य: क्यों! मध्य में तो सीता जी होती हैं कई बार।
प्र: जैसे शिव-पार्वती, तो ऐसा लगता है न कि जो देवियाँ हैं वो देवताओं से थोड़ा सेकंड हैं, पीछे हैं।
आचार्य: तुम्हें अचरज इसी धारणा के कारण लग रहा है न?




