मात्र एक धर्म है, जो सचमुच महिला का मित्र है, और वह है वेदांत धर्म। बाकी सब लोक-धार्मिक परंपराओं में महिलाओं के लिए बस अपमान और शोषण है। जैसे, विच-हंटिंग और सती प्रथा के नाम पर हज़ारों स्त्रियाँ जलाई गईं। लोकधर्म महिला की भावनाओं से खेलना जानता है; इसीलिए आज भी स्त्रियाँ ही ज़्यादा हैं जो बाबाओं की शरण में जाती हैं। यदि महिला को अपनी निजता को अभिव्यक्ति देनी है, तो उसे उपनिषदों की ओर आना ही होगा। वेदांत अकेला है, जहाँ आत्मा का कोई लिंग नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, जब वुमन की बात हो तो हम पाते हैं कि रिलीजन को वुमन ज़्यादा रिलिजस्ली फॉलो करती आई हैं। जितने भी रिलिजस फ़िगर्स हैं इंडिया में या वर्ल्डवाइड, वो वुमन को नीची नज़र से क्यों देखते हैं? और जब वुमन और रिलीजन की बात होती है तो मेन को हमेशा रिलीजन से गुडीज़ मिले हैं, लेकिन ऐसा क्यों है कि वुमन रिसीव द वर्स्ट पार्ट ऑफ़ इट?
आचार्य प्रशांत: आप ऑर्गेनाइज़्ड रिलीजन की बात कर रही हैं। आप उस रिलीजन की बात कर रही हैं जो इंसान के मन ने बनाया है, इंसान की धारणाओं के अनुसार और इंसान की सुविधा के लिए। ठीक है? और हम कह रहे हैं कि उसे इंसान ने बनाया है पर इंसानों में वही बनाएगा न जिसमें अपने बनाए नियमों को पूरे समूह पर थोपने की ताक़त होगी, वही तो बनाएगा न?
नियम-कायदे बनाने हैं कुछ, ठीक है? और इंसान जब भी बनाता है धर्म के नाम पर, तो कुछ नियम-कायदे बना देता है — कुछ सिद्धांत बना देगा, कुछ धारणाएँ, मान्यताएँ, क़िस्से-कहानी रख देगा। और फिर उसमें से कुछ




