
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। आचार्य जी, जब वुमन की बात हो तो हम पाते हैं कि रिलीजन को वुमन ज़्यादा रिलिजस्ली फॉलो करती आई हैं। जितने भी रिलिजस फ़िगर्स हैं इंडिया में या वर्ल्डवाइड, वो वुमन को नीची नज़र से क्यों देखते हैं? और जब वुमन और रिलीजन की बात होती है तो मेन को हमेशा रिलीजन से गुडीज़ मिले हैं, लेकिन ऐसा क्यों है कि वुमन रिसीव द वर्स्ट पार्ट ऑफ़ इट?
आचार्य प्रशांत: आप ऑर्गेनाइज़्ड रिलीजन की बात कर रही हैं। आप उस रिलीजन की बात कर रही हैं जो इंसान के मन ने बनाया है, इंसान की धारणाओं के अनुसार और इंसान की सुविधा के लिए। ठीक है? और हम कह रहे हैं कि उसे इंसान ने बनाया है पर इंसानों में वही बनाएगा न जिसमें अपने बनाए नियमों को पूरे समूह पर थोपने की ताक़त होगी, वही तो बनाएगा न?
नियम-कायदे बनाने हैं कुछ, ठीक है? और इंसान जब भी बनाता है धर्म के नाम पर, तो कुछ नियम-कायदे बना देता है — कुछ सिद्धांत बना देगा, कुछ धारणाएँ, मान्यताएँ, क़िस्से-कहानी रख देगा। और फिर उसमें से कुछ कमांडमेंट्स, कुछ नियम बना देगा कि "ये-ये है, ये करो।" तो वो कौन-सा इंसान होगा जो बनाएगा? जिसमें ताक़त होगी, और ऐतिहासिक दृष्टि से ताक़त जो है वो पुरुष के पास रही है, और कारण जो है उसका वो शरीर है। जितनी तरीक़े की ताक़तें पुरुष के पास रही हैं, उनके आधार में पुरुष का शरीर है।
देखो, जब तक हम जंगल में थे तब तक तो कोई धर्म होता नहीं था, तो जिस धर्म-आधारित भेदभाव की तुम बात कर रहे हो वो तो जंगल से निकलने के बाद शुरू हुआ न। माने सभ्यता-संस्कृति जब आने लग गए तो उनके साथ में धर्म भी आने लग गया, धर्म की भी शुरुआत होती है। जब आप जंगल में थे तो कोई धर्म नहीं था, जब आपने खेती करनी शुरू करी है तो साथ में धर्म भी शुरू हुआ। ठीक है?
अब जब आप खेती करोगे, तो खेती करने के लिए आपको क्या चाहिए? ऊर्जा चाहिए। और ऊर्जा के लिए उस समय न कोयला था, न तेल था, न सौर ऊर्जा थी, किसी तरह की कोई ऊर्जा नहीं थी, न नाभिकीय ऊर्जा थी। कोई ऊर्जा थी? तो एक ही तरह की ऊर्जा थी — शारीरिक ऊर्जा, मस्क्युलर एनर्जी। अब वो शरीर इंसान का हो सकता था या जानवर का हो सकता था पर जानवर को भी पकड़ करके उससे शारीरिक श्रम करालो उसके लिए भी इंसान की शारीरिक मज़बूती चाहिए, वो मज़बूती पुरुष के पास थी महिला के पास नहीं थी।
अब ये माँ प्रकृति ने ही सब भेद शुरू में ही कर रखा है, तो इसका कोई क्या करे। वो थोड़ा क़द में भी छोटी होती है, स्त्री, कंधे भी उसके कम चौड़े होते हैं। उसके शरीर में जो मसल इज़ टु फ़ैट रेशियो होता है, वो पुरुष की अपेक्षा कम होता है। तो पहले तो उसका वज़न कम होगा पुरुष से,10–20 किलो कम होता है हमेशा, और उस कम वज़न में भी उसके पास मसल और कम होती है, वो रेशियो भी कम होता है उसका। तो वो क़द में भी छोटी है, और उसका जो मस्क्युलर प्रोपोर्शन है वो भी कम है तो वो ले-दे कर के, उसके बहुत जान होती नहीं है शरीर में पुरुष की तुलना में। ऐसी भी महिलाएँ हैं जो पुरुषों को उठा के पटक दें, उनकी बात नहीं कर रहे।
जिसके पास ताक़त थी उसकी चल निकली, जिसकी लाठी उसकी भैंस। तो एक तो महिला शरीर से कमज़ोर थी और एक और चीज़ आ गई थी उसके ऊपर, क्या? गर्भ, प्रेग्नेंसी। और जब वो प्रेग्नेंट हो जाए, तो वो 9 महीने भी गए और उसके बाद बच्चा आ गया तो उसके बाद कई और महीने भी गए, कई साल गए। और उस समय न तो किसी तरह का ज्ञान था, न कोई बहुत चेतना थी, तो किसी भी तरह का कॉन्ट्रासेप्शन(गर्भनिरोध) इसका तो कुछ पता ही नहीं था। तो महिला जो है, वो लगभग लगातार गर्भ से रहती थी और बच्चे भी थे, उन्हें बीमारियाँ होती थीं जल्दी-जल्दी मरते रहते थे। तो समझ लो कि 15 की उम्र से लेकर 45 की उम्र तक — ये 30 साल हैं — ये 30 साल में कोई बड़ी बात नहीं है, वो 15–20 बार गर्भवती हो जाती हो तो। और यही वो समय होता है — 15 से 45 — जब पुरुष सबसे मज़बूत और ज़बरदस्त होता है।
तो महिला एक तो ऐसे ही शरीर से थोड़ा कमज़ोर, और ऊपर से पुरुष जब सबसे ज़बरदस्त है उस समय पर महिला लगातार बैठी हुई है वो गर्भ लेकर के। गर्भ ही नहीं, वो कई सारे छोटे-छोटे बच्चे लेकर बैठी है, जिसमें से आधे हर समय बीमार रहते थे क्योंकि उस समय इतनी दवाइयाँ नहीं थीं, चिकित्सा-शास्त्र आगे नहीं बढ़ा था। तो वो जो बच्चे हैं, किसी को कुछ लगा हुआ है, किसी को कुछ लगा हुआ है, कोई जंगल की तरफ़ भाग गया है, ये सब भी तो है। ऐसा थोड़ी है कि उस समय बड़ी तकनीकी या सभ्यता में उन्नति हो गई थी। दो बच्चे खोए हुए हैं वो मिल ही नहीं रहे हैं, वो दिन भर उनको खोज रही है।
ये सब चलता रहता था।
तो सारी ताक़त ले-देकर किसके हाथ में आ गई? (पुरुष)। और हम बन गए थे खेतिहर, अब हम वो तो थे नहीं कि जंगल में हैं और कंदमूल इकट्ठा कर रहे हैं और उससे काम चल जाएगा। कंदमूल जब तक आप इकट्ठा करते थे, तब तक तो पुरुष और स्त्री में फिर भी एक समानता थी क्योंकि कंदमूल इकट्ठा करने में बहुत जान नहीं लगानी पड़ती, चलते जाओ, चलते जाओ, जो मिले उसको इकट्ठा कर लो अपना। स्त्री भी कर सकती है बल्कि अगर उसके बच्चे हैं, तो भी कर सकती है। पर जैसे ही मामला खेती का आया, खेती ने पूरा समीकरण बिगाड़ कर रख दिया, पुरुष का वर्चस्व एकदम बढ़ गया — एकदम बढ़ गया।
अब तो सारे नियम-कायदे कौन लिखेगा? पुरुष। और यही वो समय है जब धर्म की शुरुआत हो रही है। अब हम कहने को भले ही कह दें कि धर्म तो बिल्कुल आदिकालीन है, अनंत है, और सृष्टि के पहले क्षण से है। पर ऐतिहासिक दृष्टि से हमें पता है कि धर्म की भी कहीं शुरुआत होती है, और एक बिंदु था जिसके पहले मनुष्य किसी धर्म-वग़ैरह का पालन कुछ नहीं करता था।
धर्म की जो शुरुआत है वो भी मात्र कुछ हज़ार साल पहले ही हुई है। कोई व्यक्ति आकर बोलता है कि 8-10 हज़ार साल पहले भी कोई धार्मिक व्यवस्था होती थी, तो वो झूठ बोल रहा है या उसने इतिहास पढ़ा नहीं है। हमारे जितने भी दुनिया भर में धर्मग्रंथ मिलते हैं न प्रमुख, वो भी सब ज़्यादा से ज़्यादा समझ लो 4 हज़ार साल पुराने हैं। लगभग 4 हज़ार से ज़्यादा पुराना कोई धर्मग्रंथ हमें मिलता ही नहीं है।
और ये भी मैं जब कह रहा हूँ कि 8-10 हज़ार साल, धर्म को कह रहा हूँ कि 8-10 हज़ार साल ही हुए हैं शुरू हुए, तो मैं शायद वो भी अतिशयोक्ति कर रहा हूँ। हो सकता है 8-10 हज़ार भी न हुए हों, मामला बस लगभग 4 हज़ार साल का ही हो। ईसा से कुल 4 हज़ार साल पहले पृथ्वी ही बनाई गॉड ने, तो बताओ धर्म कितना पुराना हो सकता है?
हम पहुँच गए हैं और अब सारे नियम-कायदे बनाए जा रहे हैं, क्योंकि जंगल में नियम-कायदे की बहुत ज़रूरत नहीं थी। पर खेती हो रही है तो बहुत सारे काम होंगे उसमें लोगों के अलग-अलग वर्ग बनेंगे, जो खेती से संबंधित अलग-अलग तल के काम कर रहे हैं, समाज का विभाजन होगा। है न? नए ख़तरे पैदा हो गए हैं, उनसे निपटने के लिए नई कुछ मर्यादाएँ, नए अनुशासन रखने पड़ेंगे। इतना ही नहीं अब संपत्ति आ गई है, जंगल में तो हाथ में फल है वो कोई संपत्ति नहीं है क्योंकि फल थोड़ी देर में सड़ जाएगा। ठीक है? लेकिन जब खेती शुरू होती है, तो अब व्यक्तिगत संपत्ति भी आ जाती है क्योंकि वो खेत अब तुम्हारा है। वो खेत तुम्हारा है, और उसमें से जो कुछ भी निकल रहा है — गेहूँ, ज्वार, बाजरा, धान, वो इतना जल्दी सड़ नहीं सकता, तो वो भी तुम्हारी संपत्ति है और वो संपत्ति साल दर साल बढ़ सकती है। तो पहले क्या शुरू होता है? बार्टर सिस्टम। और उसके बाद फिर क्या आ जाती है? मुद्राएँ भी आ जाती हैं।
अब ये सब चलने लग गया है तो अब नियम-कायदे बनेंगे, और नियम-कायदे बनाने वाला कौन है? पुरुष है, क्योंकि ताक़त उसके हाथ में है। तो यहाँ तक अभी हम पहुँचे हैं ऐतिहासिक, सामाजिक और समझ लो कि आर्थिक दृष्टि से। अब थोड़ा मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी देख लेते हैं कि क्या चल रहा है।
हम गाया करते हैं न, "जब काम भरा हो आँख में, तब सच नज़र नहीं आता है।" अब ठीक वैसे जैसे प्रकृति ने महिला को शरीर से थोड़ा कमज़ोर बनाया है पुरुष की अपेक्षा। वैसे ही प्रकृति ने पुरुष में, महिला की अपेक्षा ज़्यादा कामोत्तेजना भरी है। और उसका भी जो कारण है, वो कोई नैतिक-वैतिक नहीं है, उसका भी कारण बहुत सीधा है — पुरुष के लिए वासना कुछ पल का खिलवाड़ हो सकती है थोड़ी देर का मनोरंजन हो सकती है, लेकिन स्त्री को उसका परिणाम 9 महीने तक भुगतना होता है।
तो उसके भीतर यहाँ (दिमाग़ की तरफ़ इशारा करते हुए) समझ लो हार्ड वायरिंग हो जाती है कि वो सेक्स को बहुत कैज़ुअली नहीं ले सकती, क्योंकि उसको उसके नतीजे भुगतने पड़ने वाले हैं। पुरुष को कुछ नहीं है। पुरुष के लिए थोड़ी देर की उत्तेजना है थोड़ी देर की उसकी मौज हो गई, उसके बाद वो अपने रास्ते निकल सकता है। पर महिला उसमें फँस सकती है और यही नहीं कि 9 महीने फँस गई अब जो बच्चा पैदा होगा, वो भी महिला ही पालेगी। क्योंकि पुरुष तो सेक्स के बाद ग़ायब भी हो सकता है, लेकिन महिला और बच्चा तो इकट्ठा रहेंगे।
तो पुरुष जो है वो ज़्यादा कामी होता है महिला की अपेक्षा, या ऐसा कह लो कम से कम कि वो सेक्सुअली ज़्यादा इंपल्सिव होता है। महिला उतनी इंपल्सिव नहीं होती भले ही वो सेक्सुअली अराउज़्ड हो, सेक्सुअली ऐक्टिव हो ये सब हो सकता है, लेकिन वो इंपल्सिव नहीं होगी उतना, और पुरुष की आँख में काम लगातार ही फ़ॉरएवर अराउज़्ड। और हमने कहा, "जब काम भरा हो आँख में, तब सच नज़र नहीं आता है।"
पुरुष ने स्त्री को जब भी देखा तो वासना की आँख से ही देखा, तो उसको स्त्री समझ में ही नहीं आई कभी।
जिस किसी को इतनी कामना लेकर देखोगे उसको कभी समझ नहीं पाओगे। और जो चीज़ समझ में नहीं आती उससे बड़ा डर लगता है, होता है कि नहीं? जो समझ में नहीं आता उससे डरते हो न? तो ये बड़ा उल्टा फेर हो गया, एक ओर तो हम कह रहे हैं कि स्त्री शरीर से दुर्बल थी, ऊपर से नियम-कायदों से भी पुरुष ने उसको दबा रखा था। लेकिन फिर भी पुरुष लगातार स्त्री से डरता रहा, वो स्त्री उसके लिए एक अबूझ पहेली जैसी रही क्योंकि वो उसे समझ नहीं पाता था।
कुछ तो स्त्री के पास एक ताक़त थी — जो बहुत बड़ी ताक़त है, अब खेती में उस समय और तो कोई चीज़ थी नहीं तुम्हारे पास ऊर्जा के लिए ये चाहिए होते थे, क्या? भुजाएँ, और भुजाएँ पैदा सिर्फ़ स्त्री कर सकती थी। तो एक तरह से देखो तो स्त्री के पास अपना कोई मैकेनिकल पावर नहीं था, लेकिन पावर प्लांट वो ख़ुद थी। वो ख़ुद भले ही बहुत हल-वल न चला सकती हो पर हल चलाने वालों को पैदा सिर्फ़ वही कर सकती थी। तो पुरुष उससे घबराता भी था कि “ये क्या गड़बड़, कैसे पैदा कर देती है?” अब ये तो ताक़त है ही नहीं पैदा करने की पुरुष के पास, और वो जो उसमें से संतान पैदा करने की ताक़त है विशेषकर जो पुत्र पैदा करने की ताक़त है।
अब पुत्र भी समझ रहे हो न कि लोगों को क्यों चाहिए होते हैं, पुत्र की बात कहाँ से चल रही है? यहीं से चल रही है क्योंकि लड़की खेत नहीं जोत पाती। तो इसलिए तब से चला आ रहा है — "पुत्र, पुत्र, पुत्र" — अभी तक वो लोगों के खोपड़े में घुसा हुआ है, निकल ही नहीं रहा, भले ही अब कोई खेत न जोतता हो।
तो अब उस समय के इंसान की मानें, पुरुष की दृष्टि से देखो उसे स्त्री समझ में ही नहीं आती और हवस उसमें हर समय है, हवस उसमें लगातार है, प्रकृति ने ही ऐसा बनाया है। समझ में उसको आती नहीं है स्त्री, क्योंकि जहाँ पर कामना होगी, वहाँ बोध न्यून हो जाता है। वैसे ही जैसे आँखों में अगर कुछ पड़ा हो तो आँखों से साफ़ दिखाई नहीं देता, तो वो डरने लगा स्त्री से। और चूँकि स्त्री के पास एक बड़ी ज़बरदस्त ताक़त थी संतान पैदा करने की, तो उसके लिए और ज़रूरी हो गया कि इस पर क़ब्ज़ा करके रखो। न सिर्फ़ वो संतान पैदा करती है बल्कि वो संतान पैदा करती है वही मेरे सारे श्रम का वारिस बनता है, उत्तराधिकारी बनता है।
“अब ये रह तो मेरे साथ रही है चुपचाप जाकर संतान कहीं और पैदा कर आई, तो ज़िंदगी भर मैंने जो काम करा, वो सारा काम पता नहीं किसकी औलाद को चला जाएगा। मुझे तो पता ही नहीं चलेगा।” उस समय कोई डीएनए टेस्टिंग तो होती नहीं थी। तो और ज़रूरी हो गया कि महिला को बाँध के रखो, इसको बाँध कर रखो क्योंकि ये बड़ी अजीब चीज़ है। ये पावर प्लांट है, अभी जितना पावर आ रहा है, उसको पैदा करने वाली तो यही है, तो इसको क़ब्ज़े में लेकर रखो।
आ रही है बात समझ में?
यहाँ से रिश्ता शुरू होता है — धर्म का और स्त्री का। तो जिसको हम आयोजित धर्म कहते हैं, समझ लो, उसकी शुरुआत में ही स्त्री का शोषण शामिल है, शुरुआत से ही। ये जो मानव-कृत धर्म है, इसकी शुरुआत में ही महिला का शोषण शामिल है। ये क्या हो गया?
जो बिल्कुल पुराने ही वाले सिविलाइज़ेशन्स थे आप वहाँ चले जाओ, मेसोपोटामिया, इजिप्ट, वहाँ आपको पता चलता है कि सारी धार्मिक व्यवस्था एकदम पुरुष प्रधान है। जो उनके देवालय होते थे, टेंपल्स ही बोलते हैं उनको आज भी, उसमें कुछ भी हो जाए लेकिन महिला पुजारी नहीं बन सकती थी। और वो वहाँ कब जाएगी, ये सब भी नियम पुरुषों ने बना रखे थे। ऐसे-ऐसे जा सकते हो, ऐसे नहीं जा सकते, इन मार्गों से प्रवेश करोगे, इन दिनों पर तुम्हें जाना अनुमत है, इन दिनों पर तुम्हें जाना निषिद्ध है। ये सब पुरुषों ने नियम बना रखे हैं। ये हम बात कर रहे हैं, समझ लो, ईसा से भी हज़ार-डेढ़ हज़ार साल पहले की।
तो ये नहीं है कोई कि जिसको तुम आधुनिक धर्म के रूप में देखती हो, उसमें महिला के प्रति शोषण आ गया। नहीं, नहीं — धर्म ने जब पहली साँस ली उस साँस में ही महिला के प्रति भेदभाव था। क्योंकि वो धर्म "सत्य" से प्रकट नहीं हुआ है, वो धर्म प्रकट ही पुरुष के "मन" से हुआ है। वेरी वेरी मैस्क्युलिन रिलीजन। ये जो धर्म है, इट्स अ मैन'स रिलीजन, तो उसमें शुरुआत में ही ऐसा है। और अभी हम बात कर रहे हैं कि जो आज के प्रमुख धर्म हैं, जो दुनिया के तीन सबसे बड़े धर्म हैं उसमें से दो तो अब्राहमिक हैं। हम बात कर रहे हैं उन अब्राहमिक धर्मों के आने से हज़ार, डेढ़ हज़ार, दो हज़ार साल पहले की, तब से ही ये चल रहा है।
उसके बाद आप जाते हो तो जिनको आप बोलते हो एंटिक्विटी वाली फिलॉसफी, सभ्यताएँ, आपको वहाँ भी दिखाई देता है कि जो अलग-अलग फिलॉसॉफिकल कल्ट्स थे, उनका नेतृत्व करने की आज़ादी महिलाओं को नहीं दी गई। उसी समय पर वैदिक धर्म पुष्पित हो रहा था, तो वहाँ आप पाते हो कि हाँ, यहाँ ऐसा हमें दिखाई पड़ता है कि बहुत सारी ऋषिकाएँ हैं और ऋचाएँ भी उनके नाम पर हैं। आप सब नाम जानते ही हो — घोषा, पाला, गार्गी, मैत्रेयी। और भी ऐसे ही दो-चार-पाँच नाम आते हैं, वो भी पुरुष ऋषियों की तुलना में कम हैं नाम पर फिर भी काफ़ी नाम सुनने को मिलते हैं।
और जब वेद आते हैं, तो वेदों के उपरांत वेदांत आता है और वेदांत में तो शरीर को आपकी प्रमुख पहचान कहा ही नहीं गया है, तो वहाँ पर सारा भेदभाव समाप्त हो जाता है, लेकिन समाप्त हो कर भी नहीं होता है क्योंकि भारत में वेदों के ठीक बाद स्मृतियों का दौर शुरू हो जाता है। वेद माने — श्रुति, और वेदों के ठीक बाद स्मृतियों का दौर शुरू हो जाता है, और स्मृतियाँ तो बाप रे बाप! मनुस्मृति।
आप जितनी भी बुराइयाँ देखते हो महिलाओं के प्रति, आप खोजने जाओ कि अरे शुरुआत कहाँ से हुई, तो बड़ी संभावना है कि सब मनुस्मृति में मिल जाएगा — “महिला को कभी भी स्वतंत्र नहीं होना चाहिए पिता के आश्रित रहे, पति के आश्रित रहे, और पति भी मर जाए तो पुत्र के आश्रित रहे पर इसको स्वतंत्र मत छोड़ना। विधवा का विवाह न हो, महिला के यौनाचार पर हर तरीक़े का अंकुश लगाया जाए,” और ये सब अभी ईसा पूर्व चल रहा है, ईसा से पहले ये सारा मामला चल रहा है।
अच्छा, ईसा से पहले ही अभी बात कर रहे हैं तो बुद्ध भी आ गए। और बौद्ध मत में भी हम पाते हैं कि बुद्ध ने, स्त्रियों ने बहुत शोर मचाया है कि आपने संघ बनाया है, हमें क्यों नहीं आप लेते भीतर? पहले तो ले ही नहीं रहे थे, ले लिया, लेकिन जो वहाँ भिक्षु थे और भिक्षुणियाँ थीं, जो मंक्स और नन्स हैं उनके अधिकारों में अंतर था। नन्स के जो अधिकार थे, वो मंक्स माने पुरुष भिक्षुओं से कम थे। ईसा से ही पहले, अभी हम उधर आए ही नहीं हैं जहाँ पर हम अभी उन धर्मों की बात करें।
जो कन्फ़्यूसियस का मत है वो भी आता है और उसमें भी बिल्कुल मनुस्मृति जैसी बात, उन्होंने भी कहा कि "ये तीन हैं और ये बिल्कुल व्यवस्था करो कि स्त्री हमेशा आश्रित होकर के जिए।" तीन पुरुष, कौन से? वही — पिता, पति, पुत्र। जैनों में भी सब ईसा पूर्व का ही मामला चल रहा है अभी, तो कई ऐसे पंथ हैं विशेषकर दिगंबरों में जो कहते हैं, कि “स्त्री तो जब पुरुष बनकर पैदा होगी, तभी उसे मुक्ति मिलेगी।” ये अभी, ये धर्म का रिश्ता चल रहा है महिला के साथ, आपको देखना है कि धर्म से एक महिला होने के नाते आपको क्या संबंध रखना है।
फिर आती है बाइबल और बाइबल में तो शुरुआत में ही जो सारी ज़िम्मेदारी है जेनेसिस में वो फोड़ दी गई है महिला के ऊपर। किसके ऊपर? ईव के ऊपर। तो आदम और हव्वा, एडम और ईव इनको गॉड ने बना दिया और ये अपना उछल-कूद रहे थे। और गॉड ने बोला था कि जो भी करना उधर बगीचा है, सेब है, उधर मत जाना। तो साँप आता है नालायक, और उसने किसको बहला-फुसला लिया? ईव को। समझ रहे हो न?
तो महिला क्या बन गई शुरुआत में ही? करप्टेबल — “इसके दम नहीं है, ये आसानी से फिसल जाती है, देखो साँप आया और इसको बहला-फुसला गया। और इतना ही नहीं है फिर इसने जाकर के क्या करा? इसने जाकर के एडम को भी पट्टी पढ़ा दी, और दोनों फिर नंगे निकाल दिए गए कि निकलो यहाँ से। और दंड और मिला, कि अब तू जाकर के जो प्रसव पीड़ा का दर्द होता है, वो तू बर्दाश्त करेगी, जाओ वहाँ अब ज़मीन पर रहो। अभी यहाँ मस्त घूमते थे ऊपर, अब जाओ ज़मीन पर रहो और अब बच्चे पैदा करो। पूरी पृथ्वी को अपने बच्चों से भर दो, और तू जो है वो प्रजनन का दर्द भी बर्दाश्त करेगी।"
तो शुरुआत में ही दोषी कौन है?
और आज तक महिला, वो समझ लो जो ऐन्सेस्ट्रल गिल्ट है, वो ढोती चली आ रही है। समझ में आ रही है बात ये? ऐन्सेस्ट्रल गिल्ट वो कई तरीक़ों से ढोती है, ईव का हमने नाम ले लिया। ऐसे ही पैंडोरा है, पैंडोरा'ज़ बॉक्स सुना है तुमने? जानते हो पैंडोरा कौन है? जो गॉड्स थे, ग्रीक गॉड्स, पैंडोरा का मतलब होता है, जिसको बहुत सारे उपहार मिले हों, वेरी गिफ़्टेड। वो सब गॉड्स ने मिलकर के पैंडोरा का निर्माण करा।
पैंडोरा सबसे, समझ लो पहली और बहुत सुंदर महिला है ग्रीक मिथॉलॉजी में। और उसको इन गॉड्स ने एक बॉक्स या एक जार, एक मर्तबान दिया कि "ये तुमको दे रहे हैं, और बताए दे रहे हैं इसे खोल मत देना कभी।" तो वो चली गई, उसका भी कुछ प्रेम-प्रसंग है वो चली गई। और जाने के बाद उसने पृथ्वी पर क्या करा? वो खोल दिया जबकि उसको बोला गया था मत खोलना। पर उसके भीतर ऐसा संशय उठा, ऐसा उसको कौतूहल उठा कि उसने खोल दिया और उसमें से क्या निकला? उसमें से दुनिया भर की बीमारियाँ, दुख, दोष, दर्द सब निकल के पूरी पृथ्वी पर फैल गए। तो इस पूरी पृथ्वी पर जितना भी दुख-दर्द है, उसका ज़िम्मेदार कौन है? एक महिला।
तो ये ऐन्सेस्ट्रल गिल्ट है, जिसको आज भी महिला ढो रही है कि “जितना भी दुनिया में दर्द फैला हुआ है वो एक महिला की वजह से फैला है, ईव की वजह से फैला है, पैंडोरा की वजह से फैला है।" हर तरीक़े से अलग-अलग मिथकों में एक महिला को ही ज़िम्मेदार बनाया गया है। किसके लिए? दुनिया की…।
अब आपने दुनिया में दर्द फैलाया हो, आपने दुनिया के लोगों को तकलीफ़ दी हो, तो आपको ग्लानि होगी न। और फिर आपसे मुआवज़ा भी माँगा जाएगा कि "तू ही तो है, तू ही तो है जिसने दुनिया में इतनी गंदगी फैलाई है।" तो मुआवज़ा भी कैसे दोगे? चुप रह कर के, या "हमने तुम्हें दर्द दिया तो अब तुम हमें दर्द दोगे, तो हम बर्दाश्त कर लेंगे।” इस तरह से तुम कुछ फिर करोगे क्षतिपूर्ति, तो वही चल रहा है।
हम अभी बाइबल की बात कर रहे थे, तो बाइबल में पहले तो ओल्ड टेस्टामेंट आता है, यहूदी मत आता है। तो ज्यूइश मिथॉलॉजी जो है उसमें एक बड़ा विचित्र उदाहरण मिलता है, लिलिथ नाम की महिला का। और लिलिथ ने जो उसका साथी था पुरुष, उससे कह दिया: आई विल नॉट कम अंडर यू। इसको जिस भी तरीक़े से अगर समझना चाहो, समझ लो, "मैं तुम्हारे नीचे नहीं आऊँगी। हम दोनों में बराबरी का रिश्ता होगा।" और जैसे ही उसने ये कह दिया, वैसे ही उसको ईश्वर ने सज़ा दे दी और उसको बहिष्कृत कर दिया, और इतना ही नहीं ये तय कर दिया कि वो सदा से मानी जाएगी छोटे बच्चों के दुख, दोष और मृत्यु का कारण। लिलिथ।
तुम समझ रहे हो? आने वाली सारी महिलाओं की सारी पुश्तों को क्या संदेश दिया गया, कि अगर तुम पुरुष से बराबरी की माँग करोगी तो भगवान भी तुम्हारा साथ नहीं देगा। पेट्रिआर्की इज़ गॉड इटसेल्फ। इफ यू रिफ़्यूज़ पेट्रिआर्की, यू आर रिफ़्यूज़िंग गॉड हिमसेल्फ। ईव, पैंडोरा, लिलिथ, अब होमर का नाम सुना होगा? जो ग्रीक एपिक्स हैं इलियड, ओडिसी है न, उन्होंने जो लिखे थे। जैसे हमारे यहाँ एपिक्स क्या माने जाते हैं, इंडियन एपिक्स क्या हैं? रामायण, महाभारत। तो वैसे ही ग्रीक एपिक्स हैं वो इलियड, ओडिसी।
तो ओडिसी में ओडिसियस है, वो हीरो है। वो मालूम है क्या करता है? वो जहाज़ पर है और एक द्वीप है पथरीला द्वीप, पथरीला द्वीप। और ख़बर फैली हुई है कि सारे जो जहाज़ हैं वो जाकर वहाँ पत्थर से टकराते हैं और टूट के मर जाते हैं उसमें जितने सेलर्स होते हैं, सबकी मौत हो जाती है। तो पता ये चलता है कि वहाँ सायरन्स रहती हैं। सायरन्स, जैसे आजकल बोलते हैं न सेक्सी सायरन, तो सायरन्स। और वो सायरन्स क्या हैं? वो गाती हैं। वो समझ लो जैसे मत्स्य कन्या होती है न इंडियन मिथॉलॉजी में।
श्रोता: मरमेड्स।
आचार्य प्रशांत: नहीं, वो आधी मछली भी उनको माना जाता है, वो आधी चिड़िया भी मानी जाती हैं। पर मतलब ये है कि वो कुछ मतलब गड़बड़-सी चीज़ हैं पर वो बहुत सुंदर हैं, बहुत आकर्षक हैं। और उनका जो गाना होता है वो ऐसा होता है कि पुरुष के कान में पड़ता है तो पुरुष पगला जाता है। तो वो क्या करा करती हैं? और वो ईविल हैं ख़तरनाक तरीक़े से। अब देख रहे हो क्या कर रहे हैं? सुंदरता का, गाने का और स्त्रीत्व का संबंध जोड़ दिया गया ईविल होने से।
और उसके पीछे पूरा मनोविज्ञान वही है कि आदमी को औरत कभी समझ में ही नहीं आई। क्योंकि आदमी ने औरत को ज़्यादातर हवस की नज़र से देखा तो वो उसके लिए एक ब्लैक बॉक्स थी। "बाप रे बाप! पता नहीं क्या है, इसको दबा के रखो। ईविल है, ईविल है पता नहीं कुछ भी कर जाएगी। बच्चा देखो पैदा कर देती है, पता नहीं कैसे, हम तो कुछ भी कर लें हमसे न पैदा हो। बच्चा पैदा हो जाता है, मेरे ही जैसा पैदा हो जाता है हूबहू मेरी शक्ल का मेरा बच्चा पैदा कर दिया बताओ।"
तो ये सायरन्स गाना-वाना गाती हैं, और इनको सुनकर जो सेलर्स होते हैं, नाविक, वो होश बिल्कुल खो देते हैं। वो जो होश खो देते हैं तो इनका जहाज़ जाता है और वहाँ टकरा-टकरा के टूट-टाट जाता है, और मर जाते हैं। और सायरन्स बहुत खुश होती हैं कि "मार दिए, और मार दिए।" तो ये जो ओडिसियस है, ये अपने आप को वो जो जहाज़ का मास्ट होता है न उससे बाँध देता है, खंबे से। और सारे जितने वहाँ पर नाविक होते हैं उनको बोलता है, "अपने-अपने कान में डाल लो मोम तो तुम्हें तो सुनाई नहीं देगा, मेरे कान में मोम मत डालो पर मुझे तो बाँध दो। मुझे बाँध दो मैं सुनूँगा तभी मुझे पता चलेगा आवाज़ कहाँ से आ रही है, मैं उधर को लेकर जाऊँगा जहाज़।"
तो बाकियों के कान में मोम डाल दिया जाता है ताकि वो बिल्कुल एकदम बावले न हो जाएँ सायरन्स का गाना सुनकर के। और ये अपने आप को बँधवा देता है और सबको आज्ञा देता है कि "मैं कुछ भी बोलूँ ये खंभे से जो मुझे बाँधा है खोल मत देना, क्योंकि खोल दिया तो सब मरोगे मेरे साथ में।" तो इसके गाना पड़ रहा है कान में ये बिल्कुल बावला हो रहा है ये वो कि "मैं भी जाऊँ और उनके आग़ोश में समा जाऊँ और ये और वो।" वही सेक्सुअल सारा। पर ये बचा रहता और फिर जाकर के ये सब सायरन्स को ख़त्म कर देता है। संदेश समझ रहे हो क्या दिया जा रहा है? "स्त्री को काबू में रखो, और तुमने उसे काबू में नहीं रखा, तुमने उसे ख़त्म नहीं किया तो तुम्हें ख़त्म कर देगी, तुमने ख़त्म नहीं किया तो तुम्हें ख़त्म कर देगी।"
अभी तुम एफ़ वन देख कर के आए थे उसमें हीरो कौन था?
श्रोता: ब्रैड पिट।
आचार्य प्रशांत: और उस समय ब्रैड पिट की एक और फ़िल्म की मैंने बात करी थी — ट्रॉय। हेलन ऑफ़ ट्रॉय कौन थी? अभी ये होमर के दूसरे एपिक में आती है, इलियड में। वो शादीशुदा औरत है, लेकिन एक प्रिंस है जिसका क्या नाम है? पेरिस। तो पेरिस जाता है उसके प्यार में पड़ जाता है, पेरिस उसके प्यार में पड़ जाता है और वो ये गुस्ताख़ी कर देती है कहती है कि "इससे मुझे भी प्यार हो गया, मैं इसके साथ जा रही हूँ।" अपना राज्य छोड़ के उसके साथ चली जाती है, जब वो चली जाती है तो क्या होता है? फिर वही सब वो ट्रोजन हॉर्स और वो सारा। तो एक 10 साल तक लड़ाई चलती है क्योंकि उसका पति बर्दाश्त नहीं करता कि ये मेरी पत्नी को लेकर के चला गया है। तो वो 1 हज़ार जहाज़ों के साथ आक्रमण करता है और 10 साल तक युद्ध चलता है। और हेलन को ज़िम्मेदार माना जाता है 10 साल की मौत और तबाही और बर्बादी का।
तो महिला क्या बन गई?
ये अभी मिथ चल रही है और ये जो मिथ है उसको आज की महिला भी ढो रही है, आज की महिला भी ढो रही है। हम देख रहे हैं कि इतना अजीबो-गरीब रिश्ता रहा है धर्म का और स्त्री का, उसके बाद भी स्त्रियाँ ही हैं ज़्यादा जो भगत नज़र आती हैं, जो ज़्यादा जाकर बाबाओं की शरण में बैठती हैं। वजह क्या है? क्योंकि उसको ये जता दिया गया है कि "तुम ही तो हो व्यभिचारिणी, तुम ही तो हो पापिणी, तुम्हारा शरीर ही पाप है। तो बाबाजी की शरण में जाओ, नहीं तो पापिन बनी रहेगी, नरक में मरेगी।" और ये तो हमने सब उदाहरण कहाँ से ले लिए? हमने पश्चिमी दिशा से ले लिए।
भारत में आओ — अहिल्या, रामायण। गौतम ऋषि की पत्नी हैं अहिल्या, बहुत आकर्षक है तो इन्द्र की वासना जग जाती है। इन्द्र आ जाते हैं, क्या बन कर के? गौतम ऋषि बन कर के आ जाते हैं, अहिल्या पहचान नहीं पा रही हैं। उनकी इतनी गलती है कि पहचान नहीं पाई कि ये पति नहीं हैं। तो इन्द्र आते हैं और अहिल्या के साथ संबंध बनाकर चले जाते हैं, गौतम ऋषि कहीं बाहर इधर-उधर बैठे हैं। ऋषि को पता चलता है कि ये तो पीछे से इन्द्र ने आकर गड़बड़ कर दी है, इन्द्र को कुछ नहीं किया जाता। किसको किया जाता है? अहिल्या को करा जाता है, और अहिल्या को बना देते हैं पत्थर। हवस किसकी? किसी और की, पुरुष की, और दंड किसको मिल रहा है?
और उसके बाद अहिल्या को तारा भी किसने जाकर के?
श्रोता: श्रीराम ने।
आचार्य प्रशांत: अवतार हैं, पर पुरुष हैं। श्रीराम के सम जाकर उन्होंने जब ऐसे स्पर्श किया तो फिर वो। माने पुरुष ही है जो विक्टिम है स्त्री का, “तू क्यों उसके भीतर कामोत्तेजना जगा देती है? तेरी गलती है कि वो बेचारा एक्साइट हो जाता है तो तू गड़बड़ है।" तो पुरुष विक्टिम भी है और पुरुष ही सेवियर भी है। नहीं नहीं पुरुष विक्टिम भी है, पुरुष ऑप्रेसर भी है, क्योंकि इन्द्र ने आकर धोखे से सेक्स करा है। तो पुरुष विक्टिम भी है, पुरुष ऑप्रेसर भी है और पुरुष ही सेवियर भी है माने तारणहार भी पुरुष ही है। समझ में आ रही है बात?
अब ये सब जो कहानियाँ हैं, दंतकथाएँ हैं, जनश्रुतियाँ हैं ये सब आज भी हमारे भीतर ज़बरदस्त तरीक़े से बैठी हुई हैं।
एक और बताता हूँ, मेडूसा की कहानी। ये तो पुजारिन थी एथना के मंदिर में और ये पुजारिन थी, और इसका बलात्कार हुआ मंदिर में ही। पुजारिन का बलात्कार हुआ मंदिर में ही और जिसका मंदिर है जहाँ वो पुजारिन थी उसने इसको श्राप दिया कि "तू ऐसी क्यों है कि तेरा बलात्कार हुआ? अगर तेरा रेप हुआ है तो उसमें तेरी ही ग़लती है।" और उसको सज़ा यह दी गई कि तेरे बाल हट जाएँगे, और एक-एक बाल की जगह एक-एक साँप लग जाएगा तेरे बालों में। एक-एक बाल की जगह एक-एक साँप होगा। ये ग्रीक मिथ है।
और ये जो जी रही है अभी भी, क्योंकि जो ग्रीक मिथ थी न ये सब जाकर क्रिश्चियन फ़ोक्लोर बन गई। जो पूरी क्रिश्चियन मोरालिटी थी उसमें ग्रीक कल्चर का बहुत बड़ा योगदान रहा है। “और तेरा चेहरा इतना भयानक हो जाएगा कि कोई पुरुष अगर तेरे चेहरे को देखेगा तो पत्थर बन जाएगा, तेरे बाल साँप बन जाएँगे, और तेरा चेहरा ऐसा हो जाएगा कि कोई पुरुष तेरे चेहरे को देखेगा तो पत्थर बन जाएगा।” और वो है क्या? वो पुजारिन है जिसका मंदिर में ही बलात्कार हुआ है, पुरुष ने बलात्कार किया है।
उसके बाद अब बेचारे पुरुष उसको देख-देख के डर जाते थे और पत्थर बन जाते थे। तो फिर एक पुरुष और आता है, वो बहुत भयानक थी, तो जब वो सो रही थी तो उसकी गर्दन काट देता है, “क्योंकि अगर ये जग रही है तो मैं भी पत्थर बन जाऊँगा। ये सो रही है अपना मुँह ऐसे करके, तो पीछे से जाकर उसकी गर्दन काट दूँ।” तो इस बात पर उस पुरुष की बहुत वाहवाही है कि वो सोती हुई उसकी गर्दन काट दिया।
अब समझ में आ रहा है?
ईसा के तुरंत बाद जिस ईसाइयत ने रूप लिया, उसमें महिलाओं का कुछ नेतृत्व शामिल था। लेकिन उसके बाद कुछ क्रिश्चियन काउंसिल्स हुईं, जिनमें महिलाओं को रिलिजस लीडरशिप से पूरी तरह से बेदख़ल कर दिया गया। इस हद तक बेदख़ल किया गया कि आप दुनिया का कोई प्रमुख धर्म ले लीजिए, आप कभी किसी मंदिर में गए हैं और आपको वहाँ पर जो जो ऑफिसर है, जो ऑफ़िशिएटिंग अथॉरिटी है, चाहे प्रीस्ट हो या मौलवी हो या रब्बी हो या पंडित हो, वो कभी आपको महिला मिली है क्या?
जैसे धर्म का उद्देश्य ही हो महिला को दबा के रखना। आयोजित धर्म, ऑर्गेनाइज़ धर्म, मानवकृत धर्म — उसका उद्देश्य यही हो कि महिला को दबाकर रखो, उन्हें पढ़ने भी मत दो। तो जो तुम्हारा स्मृति-साहित्य है वो कई बार बोलता है कि महिलाओं को और शूद्रों को धर्मग्रंथ पढ़ने की अनुमति नहीं है। यही हाल इस्लाम में, यही हाल ईसाइयत में। और ये तो छोड़ दो कि पढ़ने की अनुमति नहीं है, उनको कई बार तो वहाँ आने की भी अनुमति नहीं है, आ भी मत जाना, ये पवित्र जगह है यहाँ तुम कैसे आ गई? और विशेषकर यदि मेंस्ट्रुएशन है तब तो आ ही मत जाना, किसी हालत में।
बात भारत की नहीं है हर जगह ऐसा ही है। अगर अभी-अभी तुमने बच्चा जना है, तब भी मत आ जाना क्योंकि तुम अपवित्र हो। तो आज जो ये पवित्र–अपवित्र की बहुत बातें चलती हैं बाबा लोग करते हैं, इनमें बाबा की कोई ग़लती है ही नहीं। ये बातें सदियों पुरानी हैं।
ग़ुस्सा सा आ रहा है इस पर “ऐसा हुआ है हमारे साथ,” (श्रोता को देखते हुए बोलते हैं)।
धर्म ने ही तय करा कि उत्तराधिकार कैसे चलेगा? सामाजिक नियम–क़ायदे क्या होंगे? तो इस्लाम में जैसे एक औरत की गवाही की क़ीमत आधी मानी जाएगी पुरुष से, संपत्ति अगर बँटेगी बाप की, तो उसमें अगर लड़की को हिस्सा मिलेगा भी तो भाई से आधा मिलेगा। और भारत में तो यहाँ तक चला कि कोई हिस्सा नहीं मिलेगा, स्त्रीधन दे दो बस, जो कि एक तरह का दहेज है, कि वो दे दो, उसके अलावा कोई हिस्सा देने की कोई ज़रूरत नहीं है।
उसके लिए फिर बाद में, आज़ादी के बाद, नियम अलग से बनाना पड़ा, कि नहीं भाई बाप की संपत्ति पर लड़की का बराबर का हिस्सा है। ये नियम बनाना इसीलिए पड़ा क्योंकि भारत में यही चलता था, कि लड़की को कुछ नहीं मिलेगा, ये ऐसे ही है। "ये तो पापीनी है, इसको क्या देना? तू पापिन ही पैदा हुई है और पति की सेवा कर-करके अपने पाप धो। तेरा शरीर ही तेरा पाप है।"
तो मुझे बड़ा ताज्जुब होता है, जब जो पारंपरिक धर्म होता है मैं वहाँ महिलाओं को कतार बाँधे खड़ा देखता हूँ। मैं कहता हूँ, तुम्हें वहाँ क्या मिल रहा है? यू शुड बी द लास्ट पर्सन टू बी सीन देयर। पुरुषों के लिए बहुत कुछ है उस धर्म में, तुम्हारे लिए क्या है? तुम्हारे लिए तो शोषण ही है। और एक ही धारा है जिसमें महिलाओं के लिए कुछ नहीं बहुत कुछ है, वो है — वेदांत — क्योंकि मात्र वहीं पर आत्मा उद्भूत होती है। मात्र वहीं कहा जाता है कि देह प्रकृति की संयोगिक बात है, तुम चेतना हो।
लेकिन मैं नहीं देखता कि महिलाएँ वेदांत धर्म की ओर आकर्षित हो रही हैं। वो जिस धर्म की ओर जा रही हैं, वो वही धर्म है जिसने सदियों से उनका शोषण करा है पर फिर भी उधर ही जाकर के वो लाइन लगा रही हैं।
आप भक्तिकाल में वहाँ पर बात करते हो सूफ़ियों में राबिया की बात करते हो, है ना। आप इधर भक्ति संतों में मीराबाई की बात करते हो, ठीक है उन्हें सम्मान मिला। सम्मान मिला पर वो इंस्टिट्यूशनलाइज़्ड तो फिर भी नहीं हो पाईं ना, ऑफ़िशिएटिंग अथॉरिटी तो फिर भी कभी नहीं बनी। समझ रहे हो? नियम–क़ायदे बनाने वाला अधिकार तो उनको भी नहीं दिया गया कभी। ये है महिला और धर्म का पारंपरिक रिश्ता।
मात्र एक धर्म है जो सचमुच महिला का मित्र है और वो है वेदांत धर्म। उसके अलावा कोई नहीं, कोई नहीं, बिल्कुल नहीं, लोकधर्म तो एकदम ही नहीं। लोकधर्म माने, जितने ये पारंपरिक प्रचलित धर्म हैं, जिनको जनता ने और काल ने और स्वार्थों ने विकृत कर रखा है। इन लोकधर्मों में तो महिला के लिए बस शोषण ही शोषण है, लेकिन सब महिलाएँ इन्हीं लोकधर्मों के पीछे-पीछे-पीछे-पीछे चली जा रही हैं। इन्होंने महिला को बस शरीर की तरह देखा है, इसीलिए महिला के मासिक धर्म से इनको बहुत मतलब है, महिला के कपड़ों से बहुत मतलब है। कोई धर्म नहीं मिलेगा जो तय न कर रखा हो कि क्या पहनेंगी, क्या नहीं पहनेंगी।
वेदांत अकेला है जो कहता है, "तुम क्या पहन रहे, क्या नहीं पहन रहे, किधर को बैठ रहे, किधर नहीं बैठ रहे, कहाँ संबंध बना रहे, कहाँ जा रहे — मुझे कोई लेना-देना नहीं। मुझे तुमसे बस एक बात पूछनी है, अहंकार तुम्हारा कहीं फ़ालतू विषयों से आसक्त तो नहीं है?" बस एक प्रश्न है वेदांत के पास।
अब बाक़ी लोकधर्म के पास यही सारे मुद्दे हैं — कहाँ पर कोई रंग लगाया? ये पहना कि नहीं पहना? ये उतारा कि नहीं उतारा? बाल कितने लंबे रखे? विधवा हो गई हो तो बाल पूरे मुड़ा लिए कि नहीं मुड़ा लिए? तरह-तरह की हिंसा तक रिलीजन ने इंस्टिट्यूशनलाइज़ करी। विच हंटिंग। जानते हो ईसाइयत में विच हंटिंग के नाम पर कितनी महिलाओं को मारा गया? गिनोगे? कम से कम कहा जाता है, 50 हज़ार और हो सकता है 1 लाख तक (डेटा फ्रॉम द गार्जियन)। 1 लाख! इतनी महिलाओं को विच बोल के, माने डायन, चुड़ैल बोल के ज़िंदा जला दिया गया। ये मिला है धर्म से महिलाओं को।
भारत में सती प्रथा रही, कितनी महिलाएँ उसमें जलीं, कुछ ठीक-ठीक आँकड़ा नहीं मिलता लेकिन हज़ारों से कम में तो बात नहीं है बिल्कुल। स्वयं राजा राममोहन राय के घर में एक महिला सती हुई उनकी आँखों के सामने, तब उनके भीतर आक्रोश जगा कि "ये तो मैं रोक कर रहूँगा।"
पुरुषों को तलाक़ देने का अधिकार इस्लाम में, पुरुषों को कई पत्नियाँ रखने का अधिकार इस्लाम में। महिला को? वो कई पति रख सकती है क्या? लेकिन फिर भी महिलाओं ने धर्म का झंडा बुलंद कर रखा है। और उनसे बात करो कि "आओ श्रुति की तरफ़ आओ, छोड़ दो — “अहं देहास्मि, समझो — “अहं ब्रह्मास्मि।” ब्रह्म हो तुम, सत्य मात्र हो तुम।" तो नहीं समझ में आता। क्यों? क्योंकि लोकधर्म महिला की भावनाओं के साथ खेलना खूब जानता है।
मदरहुड को इंस्टिट्यूशनलाइज़ कर देगा, इमोशनैलिटी को इंस्टिट्यूशनलाइज़ कर देगा और महिलाएँ आकर्षित हो जाती हैं। जितने भी पुराने धार्मिक क़िस्से–कहानियाँ हैं ज़रा पढ़ना ग़ौर से। ठीक है? दुनिया भर में जहाँ से भी आ रहे हों, जिस स्रोत से, भारतीय धर्मों से आ रहे हों, बाहरी धर्मों से आ रहे हों, चीन की तरफ़ से आ रहे हों एक बात हमेशा पाओगी —
सबने महिला को देह की तरह ही लिया है — देह पहले, बाद में कुछ और।
जैसे कि रिलीजन का पूरा क्षेत्र ही पुरुष द्वारा रचा गया है और पुरुष के लिए ही रचा गया है, महिला को तो मुक्ति के लायक भी नहीं समझा गया। “महिला क्या करेगी मुक्त हो कर के?” इट्स ऑल मैन ऐट द टेबल, गॉड ही मेल है और तो छोड़ दो।
वेदांत अकेला है जहाँ पर आत्मा का कोई लिंग नहीं है — ना माँ है ना बाप है, वरना तो गॉड इज़ मैस्क्युलिन। बात आ रही है समझ में? इस पर न जाने कितना और बोला जा सकता है। जिन दिशाओं से मैंने बोला है आप इन पर जाकर के पढ़िएगा, आपको बड़ा झटका लगेगा और बड़ा बुरा लगेगा।
मैं देखता हूँ कि आजकल कोई महिलाओं के विरुद्ध टिप्पणी कर देता है तो बड़ा बवाल मच जाता है सोशल मीडिया वग़ैरह पर। क्यों बवाल मचा रहे हो? ये धर्मगुरु लोग जो भी बोल रहे हैं महिलाओं के ख़िलाफ़ वो तो सदा से बोला जाता रहा है, ये कोई आज की नई बात नहीं है। तुम्हारी मान्यता लेकिन ये है कि धर्म तो, धर्म माने वही पारंपरिक, आयोजित लोकधर्म। लेकिन तुम्हारी मान्यता ये है कि लोकधर्म तो महिलाओं के बड़े हित की चीज़ है। तो तुम्हें झटका लग जाता है कि अरे! उस फलाने ने देखो, महिलाओं के विरुद्ध कुछ ऐसी अश्लील बात बोल दी या चुभती हुई गंदी बात बोल दी। क्यों बोल दी? तुम्हें झटका क्यों लग रहा है? धर्म ने महिला को ऐसे ही देखा है।
स्वर्ग में अप्सराओं का सुना होगा। सोचो, महिलाएँ जाती हैं, तो उनके लिए? पुरुषों के लिए तो अप्सराएँ हो गईं या उधर हूरें हो गईं। और जो महिलाएँ जाएँगी, उनके लिए जानते हो उनके लिए कुछ क्यों नहीं है? क्योंकि वो जा ही नहीं सकती — “स्वर्ग वर्जित है।” और ये सब बाबाजी लोग उसी पुरानी व्यवस्था के प्रतिनिधि हैं और उनके पास जाकर के तुमको वही मिलेगा जो धर्म ने महिलाओं को हमेशा से दिया है। और वो बेगुनाह हैं उनको कुछ मत बोलो, वो बेचारे तो वही बात बोल रहे हैं, जो बाबाओं की 100 पुश्तों ने हमेशा से बोली है।
महिला का कुल मूल्यांकन बस किस बात से होना है? देह से। और देह में भी उसके यौनांग से, पूरी देह से भी नहीं। उदाहरण के लिए, अगर महिला की पवित्रता नापनी है तो आप ये नहीं देखोगे हाथ, पाँव, मुँह कितना पवित्र है, या ये भीतर जो मस्तिष्क है वो भी तो देह है, उसको भी नहीं देखोगे — यौनांग, वर्जिनिटी, चैस्टिटी — वो तो बॉडी है, और बॉडी में भी वो अपने जेनिटल्स हैं बस। बाक़ी वो क्या है? मनुष्य की चेतना के इतने सारे विस्तार और ऐसे-ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं पर धर्म ने कभी उन क्षेत्रों का संज्ञान ही नहीं लिया। महिला की पूरी हस्ती समेट कर रख दी उसके यौनांग में, फिर वहाँ से ऑनर किलिंग होती है।
और जानते हो, इस्लाम से संबंधित न जाने कितने वर्ग हैं जहाँ पर ऑनर किलिंग लगभग एक रिलीजियस सेरेमनी जैसी चीज़ होती है (सोर्स: द जर्नल ऑफ़ जेनेरेटिव एंथ्रोपोलॉजी)। और इस्लाम में ही नहीं होती, हम तो भारत में भी देखते हैं इतनी ऑनर किलिंग होती है, हिंदुओं में भी होती है, सिखों में भी होती है। तो हमने कहा, सती, ज़िंदा जला देंगे, विच हंटिंग, ऑनर किलिंग, तरह-तरह के वायलेंस का इंस्टिट्यूशनलाइज़ेशन।
इंस्टिट्यूशनलाइज़ेशन माने क्या? कि माने उसको एक परंपरा बना दो, उसको संस्थागत कर दो कि ऐसा तो होता ही है। अब बताओ, क्या करना है? जैसे चल रहा है, वैसे ही चलते रहने देना है? पुरुषों की शतरंज का एक मोहरा ही बने रहना है, प्यादी? घोड़ी? हथिनी? हथिनी भी बड़ी चीज़ होती है, महिलाएँ तो पुरुषों की शतरंज में प्यादी रही हैं। वही रहना है या अपनी हस्ती, अपनी निजता को अभिव्यक्ति देनी है? अगर देनी है तो जाओ उपनिषदों की ओर, हटाओ सब तामझाम बाक़ी। उसमें महिला के लिए कोई गरिमा नहीं है, कोई सम्मान नहीं है।
जो ये पूरी लोक-धार्मिक परंपराएँ चली हैं, इनमें महिलाओं के लिए बस अपमान और शोषण है। और सम्मान मिल सकता है उसमें अगर तुम वही सब कुछ करो जो पुरुष तुमसे करवाना चाहते हैं। तो तुमको घर की देवी वग़ैरह घोषित करके तुम्हारे चरण स्पर्श कर लिए जाएँगे। तुम बहुत पढ़ी-लिखी हो तो तुम्हें सम्मान नहीं मिलेगा, तुम दो-तीन पुत्र पैदा कर दो तो कहा जाएगा, "ये देखो, ये माँ है इनके पाँव छुओ।" तुम पीएचडी करके आओ कोई नहीं तुम्हारे पाँव छूने वाला, तुम माँ बन जाओ तुम अचानक से सम्माननीय हो जाओगी।
यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिलना मुश्किल महिलाओं को, अभी मध्यकाल तक में, मैरी क्यूरी तक को दिक्कत हो गई थी। वो तो मध्यकाल की नहीं हैं अभी की हैं तब भी।
सबसे ख़तरनाक शोषण वो होता है, जब जिसका शोषण किया जा रहा हो, वो अपने पाँव चलकर आए "मेरा शोषण करो न!" और जो उसको शोषण से बचाने आए, उसको लात मारे, उसका हाथ काटे, उसको गाली दे।
अब क्या करना है?
प्रश्नकर्ता: इसमें दो चीज़ें हैं, आचार्य जी। अभी रिसेंट में ही फ्रांस में एक कॉनसर्ट हो रहा था, जिसमें एक महिला सिंगर उनके साथ कुछ हरासमेंट हुआ और प्रोटेस्ट में उन्होंने टॉपलेस होकर अपना परफ़ॉर्मेंस पूरा किया। मैं तो जब ये वीडियो देख रही थी, मैंने कमेंट सेक्शन में देखा कि बहुत बड़ा परसेंटेज कमेंट्स का वो था, जहाँ पर वो बोल रहे थे कि "इस वीडियो को ब्लर क्यों नहीं कर दिया?" या "पार्ट्स को ब्लर क्यों नहीं कर दिया गया?" तो उस चीज़ पर ऐसे क्वेश्चन आ रहे थे।
तो यहाँ दो चीज़ें हैं, क्या ये कल्चर का अंतर है इंडिया और फ्रांस में? कि वहाँ पर एक फीमेल सिंगर स्टेज पर खड़ी हो गई हैं प्रोटेस्ट करने के लिए टॉपलेस होकर। और यहाँ इंडिया में वो वीडियो तक नहीं देख पा रहे इस चीज़ का? या फिर ये फीमेल मतलब इंडिविजुअल लेवल पर है?
आचार्य प्रशांत: देखो, किसी को अगर दबाकर रखना हो तो उसमें से एक तरीक़ा ये भी होता है कि उसको उसका शरीर ही घोषित कर दो और उससे कहो कि अपनी सारी ऊर्जा अपने शरीर पर ही लगाए रहो। समझ में आ रही है बात?
कोई क्या ज़िंदगी में आगे बढ़ेगा, कोई क्या वैज्ञानिक बनेगा, कलाकार बनेगा, खिलाड़ी बनेगा अगर उसके दिमाग़ में हर समय अपनी देह ही घूम रही है। कहीं मेरा दुपट्टा इधर-उधर नहीं हो गया! क्या कॉलेज में कोई पढ़ेगा, अगर उसको सारा ध्यान अपने दुपट्टे पे ही रखना पड़ रहा है तो। अब हम संस्कृति-संस्कृति की बात करते हैं। ब्रेस्ट (स्तन) शरीर का हिस्सा होते हैं, और उनमें कुछ ऐसा नहीं है कि दुनिया में आग लग जाए। दुनिया की आधी आबादी जो महिलाओं की है, महिला है तो स्तन होंगे।
वीनस विलियम्स का था या सेरेना विलियम्स का था, कुछ साल पहले की बात है। वो खेल रही हैं, टेनिस प्लेयर हैं, तो पसीना आया पसीना आया तो उनकी ड्रेस में से, जो उनका टॉप था वो दिखाई देने लग गया क्योंकि गीला हो गया तो दिखाई देने लग गया। तो किसी ने उस पर कमेंट करा कि “इतनी झीनी ड्रेस क्यों पहनी? और हम तो टेनिस देखने आए थे, ब्रेस्ट देखने थोड़ी आए थे!”
तो कुछ इस तरह से जवाब आया कि “यस, आय ऐम अ वुमन। ऐंड वुमन हैव निपल्स। यू हैव अ प्रॉब्लम विद दैट? तुम्हें इसमें समस्या है क्या कोई?” तुम बॉल की जगह अब अगर मेरी देह देख रहे हो, तो ये तुम्हारी समस्या है मेरी समस्या नहीं है। मेरा कोई उद्देश्य नहीं है तुमको लुभाने रिझाने का, तुम हो कौन?
अब मैं ये उनकी ओर से बोल रहा हूँ थोड़ा बढ़ा के, “मैं दुनिया की टॉप टेनिस प्लेयर हूँ और तुम्हारी कुल इतनी हैसियत है कि टिकट लेकर के मुझे खेलते देखने आए हो, ये तुम हो। तो तुमको रिझाने के लिए तो मैं अपने ब्रेस्ट्स डिस्प्ले नहीं ही कर रही होंगी। मैं खेल रही हूँ, खेलने की प्रक्रिया में अगर मेरी ड्रेस थोड़ी पारदर्शी हो गई, तो हो गई तो हो गई, इसमें कौन-सी बड़ी शर्म की या बवाल की बात हो गई?”
पर ये वहीं कहा जा सकता है जहाँ पर समाज सचमुच टेनिस में उत्सुक हो। जहाँ लोग महिला टेनिस प्लेयर को भी इसलिए देखने जाते हों कि छोटी स्कर्ट पहनकर टेनिस खेलेगी, टेनिस के बहाने इसकी जाँघ देखने को मिलेगी, वहाँ तो सारा मामला गड़बड़ा जाता है। नहीं तो, एक स्वस्थ समाज में महिला टॉपलेस है तो क्या हो गया? बहुत सारे इतिहासविदों का मानना है कि वैदिक काल में, और वैदिक काल के कई शताब्दियों बाद तक भी, भारत में महिलाएँ ऊपर बहुत पहनकर नहीं रखती थीं और इसकी एक सीधी-सी वजह है कि गर्म देश है।
ये तो बाद में हुआ, जब पश्चिम से आक्रमण होने लग गए और बंद मानसिकता व संकुचित बुद्धि के लोग आने लगे तो फिर यहाँ ये होने लग गया कि महिलाएँ अपने आपको पूरा ढककर रखेंगी। वरना घूँघट-पर्दा तो छोड़ दो, बहुत सारे बड़े इतिहासकार मानते हैं कि महिलाएँ ऊपर कुछ नहीं पहन कर रखती थीं, जैसे पुरुष भी नहीं पहनते थे। और पहनना हो तो थोड़ा बहुत पहन लिया और कुछ ऐसा भी नहीं था कि नहीं ही डालना है। डालना है तो डाल लो, नहीं डालना है तो मत डालो, कोई बड़ी बात नहीं हो गई।
और वो एक स्वस्थ समाज की निशानी भी होती है। नहीं तो, सेक्सुअलाइज़ तो आप किसी भी अंग को कर सकते हो, गर्दन को भी कर दो। अरब देशों में अजीब-सा माना जाता है साड़ी को। अरब देशों में बहुत सारे भारतीय वहाँ काम करते हैं, वहाँ महिलाएँ साड़ी पहनती हैं, तो कई बार वहाँ दिक्कत हो जाती है। वो कहते हैं, “पेट दिखा रहे हो, ये तो ऑब्सीनिटी है पेट दिखाना।” आप कहते हो, “पेट ही तो दिखा रहे हैं।” वो पेट भी सेक्सुअलाइज़्ड है, कुछ भी सेक्सुअलाइज़ कर दो। नहीं तो, एक साधारण-सा शरीर का हिस्सा है उसमें इतना शोर क्यों मचा रहे हो? क्यों बवाल मचा रहे हो?
यूरोप का कौन-सा देश था, मुझे याद नहीं आ रहा है, आज मुझसे बात हो रही थी मैंने इटली कहा, पर हुआ कि इटली में नहीं तो किसी और देश में होगा। तो वहाँ पर ये नियम लाया गया था कि महिलाएँ पब्लिक में टॉपलेस नहीं रह सकतीं। तो किसी एक महिला पार्लियामेंटेरियन ने या फिर पार्लियामेंट में जितनी महिलाएँ थीं, सबने पार्लियामेंट में ही टॉपलेस हो गई और एक प्लेकार्ड था और उसमें जो लिखा हुआ था वो मैं नहीं भूल सकता। मतलब आज से ये 90 के दशक की बात है ये, तो उसमें लिखा हुआ था जिस भी देश का नाम था, मान लो वो इटली है या फ्रांस है जो भी देश था। देश का नाम मान लो एक्स है:
"वाइ इज़ एक्स अफ़्रेड ऑफ़ माइ बूब्स?"
और ये पार्लियामेंट में हुआ था। और वहाँ पर उनके जो मेल काउंटरपार्ट्स थे वो बैठे हुए थे, कोई हवसी नहीं हो गया। इस बात को लेकर कोई बहुत बड़ी इंडिग्निटी की तरह नहीं लिया गया, इसमें कोई आउटरेज नहीं हो गया। इसको एक इंटेलेक्चुअल क्वेश्चन माना गया, कि ये एक बौद्धिक-सैद्धांतिक प्रश्न है जो हमारी महिलाएँ हमसे कर रही हैं और हमें इस सवाल का जवाब देना होगा।
मैं यहाँ पर टॉपलेस रहने की वकालत नहीं कर रहा हूँ, मैं बस यह जो मेल गेज़ होती है ना, सेक्सुअली ऑब्सेस्ड मैं उसकी बात कर रहा हूँ। और इन सारी बातों की जो जड़ है, वो वहीं है — परंपरागत धर्म। वास्तविक धर्म नहीं, वास्तविक धर्म तो मुक्तिप्रद होता है। पर ये जो किस्से-कहानी वाला धर्म होता है ना, "ऐसा हुआ, वैसा हुआ, फिर फलानी अप्सरा ने ऐसा किया, फिर एंजेल ने जाकर के जो गॉडेस थी उसको ऐसे-ऐसे श्राप दे दिया, तो उसके जो बाल थे वो साँप जैसे हो गए।" ये सब जो होता है, ये तो देखो इंसान ने ही बनाया है।
जो ये वाला धर्म है ना इस तरीक़े का किस्से-कहानियों वाला धर्म, ये तो इंसान ने ही बनाया है, और इंसान में किसने बनाया है? पुरुषों ने बनाया है। और पुरुषों ने अगर बनाया है, तो अपने स्वार्थ के लिए बनाया है। महिलाएँ क्यों इस धर्म का पालन कर रही हैं, राम जाने।
ऊँचे धर्मग्रंथ की एक निशानी बता देता हूँ, आपके सामने कोई किताब आए और कहा जाए कि रिलिज़ियस स्क्रिप्चर है, तो बस ये देख लो कि उसमें क्या स्त्री और पुरुष के लिए अलग-अलग बातें हैं? अगर हैं तो फिर वो धर्मग्रंथ नहीं है, वो पुरुषों द्वारा रची गई किस्से-कहानियों की मनोरंजक किताब है। जहाँ कहीं पर भी लिंग भेद हो, देह भाव हो, वो धर्म नहीं है, और यही जो देह भाव है उसी से लिंग भेद भी होता है और जातिभेद भी होता है।
अब मैं एक उदाहरण — अक्का महादेवी हैं, हमारी स्मृति में डाल दिया गया है कि वो तो सिर्फ़ भक्त थीं। ये बात एकदम छुपा दी गई है कि उन्होंने लिंग भेद और जातिभेद के ख़िलाफ़ कितनी बातें करी हैं, क्योंकि वो बात अगर बोलोगे तो पुरुष-प्रधान व्यवस्था हिलती है।
आप महिला हो आप कभी सोचा करो, इतने सारे सब हैं, अवतार, पैग़म्बर, ये वो सब दुनिया भर में। मैं सबको पूरे सम्मान के साथ कह रहा हूँ पर एक तथ्य सामने रख रहा हूँ: अवतार हैं, पैग़म्बर हैं, तीर्थंकर हैं, उनमें महिलाएँ कितनी हैं? गुरुओं की, आचार्यों की पूरी श्रृंखला है, उनमें महिलाएँ कितनी हैं? तो ये किस प्रकार के धर्म हैं जो महिलाओं के लिए हैं पर जिनकी व्यवस्था में, जिनके संचालन में महिलाओं की कोई हिस्सेदारी नहीं है? महिला इसीलिए पितृप्रधान सत्ता के ख़िलाफ़ विद्रोह नहीं कर पाती क्योंकि उसको बोल दिया गया है कि पैट्रिआर्की के ख़िलाफ़ जाना भगवान के ख़िलाफ़ जाने जैसा है। क्योंकि भगवान ने ही पैट्रिआर्की बनाई है, ये समझो। और,
वेदांत घोषणा करता है, कि किसी ने तुम्हें कुछ बनाकर नहीं दिया है, तुम ही हो। जो उच्चतम है वो तुम हो — तत्त्वमसि। किसी ने कुछ बनाकर नहीं दिया है, ख़ुद जानो, ख़ुद समझो।
अपनी ज़िंदगी, अपनी दृष्टि, अपने विवेक, अपने प्रकाश से बनाओ। जहाँ कहीं भी महिलाओं को थोड़ा स्थान मिला भी है पारंपरिक धर्म में, देखो कि स्थान किस तरीक़े का मिला है। यूज़ुअली एज़ अ सेकंड फिडल टू द मैन। अब आप ईसाइयों के पास जाएँगे तो वो होली मैरी को सम्मान देते हैं पर किस तरीक़े से? एक अच्छी माँ, बस। सन ऑफ़ गॉड ठीक है, डॉटर ऑफ़ गॉड? कुछ पता ही नहीं। और अच्छी माँ होना भी काफ़ी नहीं है, वर्जिन मैरी। नतीजा मालूम है क्या निकल रहा है? दुनिया में इस वक़्त सबसे ज़्यादा लोग जिन्होंने खुले आम घोषणा कर दी है कि वो एथिस्ट हैं या एग्नॉस्टिक हैं, वो कौन हैं? वो ईसाई हैं (रिपोर्ट ऑफ़ प्यू रिसर्च सेंटर)।
बड़ी होड़ लगी रहती है गिनने की लोगों में कि अभी सबसे आगे तो देखो चल रहे हैं ईसाई, वो ढाई अरब के आस-पास हैं। और फिर मुसलमान हैं, वो दो अरब पार कर रहे हैं। और फिर हिन्दू हैं, वो एक अरब से थोड़ा ज़्यादा होंगे। एक अरब बीस करोड़ क़रीब होंगे, सवा अरब मान लो। तो ऐसे गिना जाता है, होड़ लगी है।
इन पगलों को समझ में नहीं आ रहा है कि तुम्हारी होड़ एक-दूसरे से नहीं है, तुम्हारी होड़ एथिज़्म से है। तुम एक-दूसरे से होड़ कर रहे हो, लेकिन तुमने धर्म के नाम पर जो गंदगी मचा रखी है, नई पीढ़ियाँ खुले आम एथिस्ट होती जा रही हैं। ईसाई होड़ करते रहे इस्लाम से, इस्लाम उनसे आगे निकले कि नहीं निकले, ईसाई ख़ुद ही होते जा रहे हैं "हम नहीं मानते ईसाइयत को।" अब किससे होड़ करोगे? और यही हाल सब धर्मों का होना है, और जो धर्म महिलाओं को जितना दबाकर रखेगा कम से कम महिलाएँ उसमें उतनी तेज़ी से एथिस्ट होती जाएँगी।
आप आपस में ही होड़ करते रह जाओगे कि इस्लाम आगे है कि ईसाई आगे है कि हिन्दू कितना पीछे रह गए। तो समझ ही नहीं रहे कि एक-दूसरे से होड़ बाद में करना, तुम्हारी संख्याएँ सबसे ज़्यादा कम होने वाली हैं। किससे? कि "हम धर्म को मानते ही नहीं।" क्योंकि ये धर्म शोषणकारी हैं, ये धर्म किस्से- कहानियों वाला धर्म है, ये गिनती कोई कर ही नहीं रहा है सब आपस में जूझे हुए हैं।
आप जब कहते हो न कि भारत में इतनी महिलाएँ ग़ायब हैं, अभी होगी जनगणना, तो देखना कम से कम 3 करोड़ और, हो सकता है 5 करोड़ तक महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा कम निकले देश की आबादी में, देखना। तो उसको कल्चरल बात मत बोलो, वो रिलिज़ियस बात है। जहाँ जो धर्मशास्त्र हैं, मनुस्मृति वग़ैरह वो महिलाओं के प्रति वैसा ही रवैया रखते हों जैसा है, वहाँ कोई क्यों चाहेगा कि घर में बच्ची पैदा हो? क्यों चाहेगा?
प्रश्नकर्ता: जब शुरुआत में बात हुई थी, तो आपने बताया था खेती की शुरुआत हुई और धर्म की शुरुआत हुई। तो खेती को हम बोलते हैं, प्रकृति का शोषण, धरती का शोषण। तो एक चीज़ जो मुझे उस समय क्लिक हुई कि अगर पुरुष ने महिला का शोषण किया है, फीमेल्स का शोषण किया है, तो क्लाइमेट चेंज भी उसी से जुड़ी हुई है।
आचार्य प्रशांत: हाँ, वो सब, बिल्कुल! बिल्कुल एक ही है, एकदम ही।
प्रश्नकर्ता: वॉर्स वाली जो चीज़।
आचार्य प्रशांत: हाँ, हाँ। मूलवृत्ति तो वही है न, भोग लो। सामने वाले को बिल्कुल बर्बाद कर लो, बस अपने थोड़े से मज़े के लिए। वही बात है, चाहे प्रकृति को बर्बाद करना हो, चाहे स्त्री को बर्बाद करना हो, वृत्ति वही है। और वो वृत्ति ऐसा नहीं कि बस पुरुषों में ही पाई जाती है, वो वृत्ति हर मनुष्य में पाई जाती है, वो वृत्ति स्त्री में भी पाई जाती है। पर ऐतिहासिक दृष्टि से स्त्री को अपनी भोगवृत्ति को अभिव्यक्त करने का उतना मौक़ा ही नहीं मिला है।
हाँ, अब अगर आगे स्त्री का सशक्तिकरण होता है तो ये बात देखने लायक होगी कि स्त्री अपनी शक्ति का, अपनी ताक़त का कैसे इस्तेमाल करती है। आज तक तो सब कुछ रहा है पुरुषों के हाथ में और पुरुषों के हाथ में रहा है, तो एक के बाद एक लड़ाइयाँ, वर्ल्ड वॉर, वर्ल्ड वॉर और ये पूरी क्लाइमेट क्राइसिस, क्लाइमेट कैटस्ट्रॉफ़ी, पुरुषों के हाथ में शक्ति रही है तो ये करा है पुरुषों ने।
अब महिलाओं के हाथ में आ रही है धीरे-धीरे, देखना बाक़ी है कि महिलाएँ क्या करती हैं इस ताक़त का। पर पता नहीं, कुछ करने के लिए कितना समय बचा है, कम से कम क्लाइमेट की दिशा में तो समय बाक़ी है नहीं। कुछ करने के लिए जो समय था वो बीत गया, अब तो "भागते भूत की लंगोटी भली" थोड़ा बहुत कुछ बचा सकते हो, तो बचा लो। वो भी अगले चार-पाँच साल में जो बचा सकते हो, बचा लो, उसके बाद वो भी नहीं बचा पाओगे।
प्रश्नकर्ता: जो दो उदाहरण हमने देखे, जहाँ पर फीमेल्स ने अपनी ब्रेस्ट या बॉडी पार्ट्स को लेकर जो बात हुई, उसके ख़िलाफ़ वो खड़ी हुईं या उन्होंने लड़ा उसके लिए। प्लस ताक़त की बात हुई, तो बाहरी ताक़त भीतरी ताक़त से आती है, ऐसा वेदांत से सीखा है। सो विच् मींस कि महिलाएँ, जो अब भी देखा जाता है कि पुरुषों के साथ-साथ महिलाएँ भी महिलाओं की दुश्मन हैं, तो सबसे पहला जो बदलाव आएगा, वो आंतरिक होगा।
आचार्य प्रशांत: उसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता। आंतरिक बदलाव ही सब कुछ होता है, आंतरिक बदलाव के बिना तो तुम उसी पुरानी व्यवस्था में अगर महिला को रानी भी बना दोगे, तो क्या हो जाएगा? बीच-बीच में बनती रही हैं रानियाँ भी बनती रही हैं।
वहाँ जब दिल्ली पर बीच में रज़िया सुल्तान भी आ गई थी, तो क्या हो गया? कुछ दिनों के लिए आई थी, हो गया। कुछ बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ जाना है। बाहरी ताक़त किसी को दे देना, जब वो भीतर से ग़ुलाम ही है, उससे कोई लाभ नहीं होता। वो बाहरी ताक़त को भी अपनी ग़ुलामी के पोषण में ही इस्तेमाल कर लेगा।
महिलाओं को भीतर से ही जगना होगा। उनको पूछना होगा अपने आप से, “क्या मैं सचमुच देह हूँ? क्या मुझे सचमुच बस यही करना है कि देह को सजाओ, सँवारो, बच्चे पैदा करो, पति की शयन-संगिनी बनो, यही है मेरा काम या मैं भी पहले बोध हूँ, समझदारी हूँ, चेतना हूँ, जान सकती हूँ, समझ सकती हूँ, जानवर थोड़ी हूँ?”
प्रश्नकर्ता: थैंक यू आचार्य जी।