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सिर्फ़ एक कामना चाहिए || श्वेताश्वतर उपनिषद् (2021)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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युक्त्वाय मनसा देवान्सुवर्यतो धिया दिवम्। बृह्वज्ज्योतिः करिष्यतः सविता प्रसुवाति तान्॥

स्वर्ग तथा आकाश में गमन करने वाले, बृहद् प्रकाश संचरित करने वाले वे सविता देव हमारे मन तथा बुद्धि से (मन तथा इंद्रियों के अधिष्ठाता) देवों को संयुक्त करके उन्हें प्रकाश की ओर प्रेरित करें।

~ श्वेताश्वतर उपनिषद् (अध्याय २, श्लोक ३)

आचार्य प्रशांत: अब ये समझना होगा। बहुत सारे देव हैं, वैदिक साहित्य में अनगिनत देवों का उल्लेख मिलता है। ये बहुत सारे देव क्या हुए, बताइए? जो मूल सूत्र हैं उनका उपयोग करके बताइए ये बहुत सारे देव क्या हुए?

आत्मा, या ब्रह्म, या परमात्मा तो वो हुआ जो मूल अहम् वृत्ति के गल जाने के बाद शेष रहता है। ठीक? उससे निचले तल पर, ब्रह्म से निचले तल पर आती है अहम् वृत्ति। अहम् वृत्ति को संबोधित किया गया है प्रथम देवता, सविता देवता कहकर के, या देवों के देव कह कर के, सबसे बड़ा देवता कह कर के। तो सबसे बड़ा देवता कौन है? मूल अहम् वृत्ति। तो फिर जो ये हज़ारों और देवता हैं ये क्या होंगे? ये जो आपके खंडित अहम् के अलग-अलग आराध्य होते हैं, पूज्य होते हैं, वो होते हैं अन्य छोटे-मोटे देवी देवता।

एक क्षण है जब आप कह रहे हैं कि 'मैं व्यापारी', तो इस वक़्त आपका आराध्य कौन हुआ? लक्ष्मी।

एक क्षण है जब आप कह रहे हैं कि 'मैं छात्र या ध्येता', इस वक़्त आराध्य कौन हुआ आपका? सरस्वती।

तो तुमने अपनी जो भी पहचान बना रखी है वो पहचान एक कामना से संबंध रखती है न। उस कामना की पूर्ति करने वाले तत्व को या उस कामना की पूर्ति को ही किसी देवी या देवता का नाम दे दिया जाता है।

श्री कृष्ण कहते हैं बड़े रहस्यमय तरीके से गीता में, वो कहते हैं कि 'जो लोग तमाम देवी-देवताओं की उपासना करते हैं, वास्तव में वो उन देवी-देवताओं के माध्यम से मुझे ही पूज रहे होते हैं; क्योंकि मूल कामना तो तुम्हारी कृष्ण को ही पाने की है, बस तुम अपनी मूल कामना भूल गए हो, तो तुम अपनी छोटी कामना पूरी कर रहे हो। पर जब तुम अपनी छोटी कामना भी पूरी कर रहे हो, तो वास्तव में उस छोटी कामना से तुम पाना पूर्णता ही चाहते हो।'

यह अलग बात है कि छोटी कामना को पूरा करके पूर्णता कभी मिलेगी नहीं, लेकिन छोटी कामना के पीछे भी जाकर तुम्हें चाहिए पूर्णता। पूर्णता माने? कृष्ण।

तो माने छोटी कामना के पीछे भी तुम जा कृष्ण के लिए ही रहे हो, बस मिलेगा नहीं। हाँ, सुख मिल जाता है, मुक्ति नहीं मिलती, आनंद नहीं मिलता; सुख मिल जाता है थोड़ी देर को अगर तुम सकाम भाव से अपनी कामनाओं के पीछे भागो तो। तुम कहते हो 'चाहिए-चाहिए', तो ठीक है, मिल जाता है, कामना कई बार पूरी हो जाती है, उससे कुछ देर के लिए सुख मिल जाता है।

तो अब यहाँ पर श्लोक ने क्या कहा है? श्लोक ने कहा कि, "स्वर्ग और आकाश में गमन करने वाले, प्रकाश संचरित करने वाले सविता देव, हमारे मन तथा बुद्धि के और इंद्रियों के अधिष्ठाता, देवों को संयुक्त करके उन्हें प्रकाश की ओर प्रेरित करें।"

हमने कहा कि ये जो सब देवता हैं, ये तुम्हारी कामनाओं के ही नाम हैं। तुम्हें पैसा चाहिए तो तुम्हारे लिए लक्ष्मी देवी हो गईं। तुम्हें और जीवन में जो कुछ चाहिए, तुम अपनी कामना को किसी देवी या देवता का नाम देने लग जाओगे। वास्तव में जिस भी चीज़ को तुम पूजने लग गए, जिस भी चीज़ को तुमने बहुत महत्व देना शुरू कर दिया, वही तुम्हारे लिए देवी-देवता हो गई न। और हम हर समय किसी-न-किसी वस्तु को या लक्ष्य को बहुत महत्व दे ही रहे होते हैं। तो जिस चीज़ को तुम महत्व दे रहे हो, वही तुम्हारा देवी-देवता हो गया।

प्रार्थना करी जा रही है कि ये जितने हमारे देवी-देवता हैं, उनको संयुक्त करके प्रकाश की ओर प्रेरित करें। मतलब समझ रहे हो? हमारे सब ये जो लक्ष्य हैं, जो ये हमारे देव हैं, ये जो हमारी कामनाएँ हैं, ये अंधकारपूर्ण हैं। तो प्रार्थना की जा रही है कि 'हे सविता देव! हमारे सब देवताओं को प्रकाश की ओर ले चलो। क्योंकि प्रकाश के स्रोत तो तुम ही हो न, हे सूर्य! हमारी कामनाएँ अंधी हैं और अंधेरे में रहती हैं, हमारी कामनाओं को थोड़ा उज्जवल करो, प्रकाश दो।'

'आप स्वयं तो मुक्त गगन में विचरण करते हो और हमारी कामनाएँ अंधी कोठरियों में रहती हैं। हमारी कामनाओं को भी थोड़ा खुला आकाश दो, प्रकाश दो। और ये जो हमारी कामनाएँ हैं ये एक दूसरे के विपरीत हैं। हमारी सब कामनाएँ एक दूसरे से भिड़ी हुई हैं, बेमेल हैं।'

तो श्लोक कहता है कि देवों को संयुक्त करो, देव माने कामना, तो माने कामनाओं को संयुक्त करो। नहीं तो हमारा जीवन बड़ा नरक जैसा है, हम एक चीज़ चाहते हैं, साथ-ही-साथ हम दूसरी चीज़ चाहते हैं जो पहली चीज़ के साथ संभव है ही नहीं। ये जो कामनाएँ हैं हमारी, ये विभक्त हैं। प्रार्थना की जा रही है कि इन्हें संयुक्त कर दो।

हमारे जीवन का दुःख ही यही है न कि इतनी पहचाने हैं हमारी और इतनी इच्छाएँ हैं हमारी कि हमें हमेशा दुखी ही रह जाना है। इसलिए नहीं कि वो इतनी सारी इच्छाएँ बहुत ज़्यादा हो गई हैं, वो इसलिए क्योंकि वो इच्छाएँ एक दूसरे की काट हैं। तुम्हें यह इच्छा भी है कि दाईं तरफ़ जाकर के जो शहर मिलता है वहाँ तुम बाज़ार के मज़े ले लो, और तुम्हें ये इच्छा भी है कि बाईं तरफ़ जाकर के जो जंगल मिलता है उसमें तुम एकांत का सुख भी ले लो। तुम हमेशा दुःख में ही रहोगे न, कहो क्यों? क्योंकि ये दोनों इच्छाएँ एक दूसरे की काट में खड़ी हैं।

तो प्रार्थना की जा रही है, "हे! सविता देव, ये जितने हमारे देव हैं पृथक-पृथक, इन सब को संयुक्त कर दो।" पहली बात संयुक्त कर दो, दूसरी बात इन्हें प्रकाशित कर दो; क्योंकि ये सब अंधेरे में हैं, ये अहम् के अंधेरे में हैं, हमारी कामनाएँ सब अंधी हैं। और किधर ले चलो इनको? "प्रकाश की ओर ले चलो, अपनी ओर ले चलो।"

तो हमारी ये जो अलग-अलग इच्छाएँ हैं, जो कोई हमें इधर खींचती है, कोई उधर खींचती है, कोई उधर खींचती है, उन सबको इकट्ठा करके ले चलो मूल इच्छा की ओर, अहम् वृत्ति की ओर। जो एक अंदरूनी और गहरी प्यास है वो कामना बचे बस, बाकी सब कामनाएँ उस एक कामना की भेंट चढ़ जाएँ। उसी एक कामना को कहा गया है मुक्ति की कामना या मुमुक्षा।

तो ये नहीं कहा जा रहा है कि 'मेरी सारी कामनाएँ मार दो', कहा जा रहा है, 'एक कामना बचे बस'। 'ये जो मेरा पूरा समय, मेरी ज़िंदगी की पूरी ताक़त बँट जा रही है, विभक्त हो जा रही है पचास कामनाओं में, उसको बस एक तरफ़ जाने दो। मेरी पूरी जीवन ऊर्जा को एकाग्र हो जाने दो', ये प्रार्थना है। 'एक इच्छा बचे बस, एक लक्ष्य रहे बस, और उसको मेरा पूरा जीवन समर्पित रहे, बाकी चीज़ें मेरे विचार में आए ही ना ज़रा भी', यही प्रार्थना है।

'मेरे सब देवी देवताओं को विदा कर दो ताकि बस एक देवता की उपासना कर सकूँ मैं। मैं जिन-जिन को पूजता हूँ, महत्व देता हूँ, आदर देता हूँ, उन सबको मेरे स्मृति पटल से विलुप्त कर दो, पोंछ दो बिलकुल, ताकि बस एक महान छवि बचे मेरे भीतर, मात्र उसी की उपासना करूँ।'

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